छत्तीसगढ़ी विशेष: कतेक दिन ले अतियाचार ला सहिबो

अपने दुनिया मा मगन रहइया जब बाहिर के दुनिया ला देखिस तब समझिस अउ जानिस के ए दुनिया चलत कइसे हे. रंग-रंग के बोली भाखा, रंग-रंग के पहिनावा-ओढ़ावा अउ खान-पान, रहन- सहन कतका ला कहिबे अनगिनती हे मानव मन के संसार.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 16, 2020, 10:31 AM IST
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कोन करही नियाव-नीत अउ अनीत के बात कहत-कहत कतको जगा सुने मा आथे के पांचों अंगरी एक बरोबर नइ होवंय. फेर कोनो मेर जाबे ते सुने मा आथे-दसों अंगरी. घिव मा. मुअखरा बात चलत-चलत आजो हमन गोठिया परथन. चार झन सकलाइन तहां जान दे कहाथे. सब्बो झन अपन-अपन हांकत हें. पढ़ई-लिखई कोनो मेर राहय इहां जिनगी के अनुभो बोलथे. अइसे-अइसे बिसकुटक हे के जुवाब देवइया घलोक थर्रा जाथे.


सोंचबे त कतका सुघ्घर हे घर संसार. फेर अतियाचार करइया कहां ले बिलोरे बर आ जथें समझ मा नइ आवय. सनातन धरम के पालन करत-करत, पाप अउ पुण्य मा भेद परगे आखिर काकर सेती. कतको झन बेंझाने वाला विघ्न विनाशक करइया तीर तार मा बसे रथे. जानबा नइ होय के कारण धोखा हो जथे. हमर देश मा अइसे मंत्र हे के तें कोनो मेर जाके रेहे सकत हस, धंधा-पानी, रोजी-रोजगार कर सकत हस.


बने बात ए जगा ले ओ जगा अवई-जवई मा आंखी घलोक उघरथे. अपने दुनिया मा मगन रहइया जब बाहिर के दुनिया ला देखिस तब समझिस अउ जानिस के ए दुनिया चलत कइसे हे. रंग-रंग के बोली भाखा, रंग-रंग के पहिनावा-ओढ़ावा अउ खान-पान, रहन-सहन कतका ला कहिबे अनगिनती हे मानव मन के संसार. तभो ले भुलवारे असन गोठियावत-गोठियावत कब तोर गत ला मार दिही हवा नइ चलय.


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चंचल मन के का लेबे ठग-फुसारी करइया गली-गली गिंजरत हें. घर-परिवार समाज मा घलोक कतको हांवय. तोपाए हे ततका दिन ले तोपाए हे फेर कोनो उघार दिन तब पता चलथे सच्चाई के. अपन ह होके कोनो अपन पय ला नइ बतावंय. जानत - जानत कोनो जान डारही तब का होही तेला कोन चेंधियावय. सब्बो दिन के गड़ी एक दिन अलगिया जथे. मन के मईल ला मार के एक दिन अइसे अलहन ला नेवता देथे के देखई बक्कखा जथे. सोचे मा नइ सोच सकस मन मा विसवास नइ होवय. फेर होनी एक दिन होके रही.


समे कइसे रिहिस कइसे होगे. पूरा दुनिया एके परिवार बरोबर होगे हे कहिके संदेशा देवइया मन कहां हाबो बतावव. पानी मुड़ ले ऊप्पर झन होवय, अभी घलोक समे हावय सुराजी मन फेर उम्हियावय, बने अउ गिनहा का होथे बतावव अउ चेतावव. हमर देश हमर भारत देश जिहां सब्बो धरम के मन अपन-अपन धरम ला माने बर सुतंत्र हें. खानपान मा सुतंत्र हें. चारों मुड़ा (उत्ती, बुड़ती, रक्सहूं अउ भंडार) मा किंदर-किंदर के देख. कोनो मेर भेद भाव नइ दिखय. अपन-अपन काम मा सब मगन हें.




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देश ला अपन समृद्धि देवइया मिहनत करइया मन अपन खून-पसीना ला बोहावत हें. अउ ऊंखरे ऊपर कहूं बिपत परगे त देख डरे हस का होथे. सब तिड़िबिड़ि हो जथे. दू मुठा चांउर घलोक नसीब नइ होवय. बांटा मा भगवान हा काला का देके भेजे हे जाने का. तोला दुनिया मा भेजे के पहिली तोर बेवस्था करथे भगवान ते माने का तोला तो दू ले चार , चार ले आठ के चक्कर हा पेरत हे. छोटे - बड़े के खाई बाढ़त हे अउ बाढ़तेज जाही तइसे लागथे. सेहे हाड़ ए दुख ला सहि डारही. फेर अतियाचार ला कइसे सही गुनव.

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