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छत्तीसगढ़ी विशेष - 'दुरमत मतइया के झेल ला कोनो नइ सहंय'

गांव समाज मा जाबे त रंग - रंग के गोठ सुने बर परथे.

गांव समाज मा जाबे त रंग - रंग के गोठ सुने बर परथे.

गांव समाज मा जाबे त रंग - रंग के गोठ सुने बर परथे. पचार - पचार के पुछइया मन असकटावय घलो नहीं. घर भितरी कतका दिन ले खुसर ...अधिक पढ़ें

तका दिन होगे, गनत – गनत गनती घलोक सिरा जाही तइसे लागथे. कोनो दिन अइसे नइ आइस जेन दिन ला खुशी – खुशी बिताए होबोन. ओ दिन ला सुरता करथंव जेन दिन संग – संगवारी बने रेहेन. अउ आज के दिन संवहत खड़े हे, गवाही देय बर. नशा, नास के जर ए केहे गेहे ओही नशा हा पहली दिन ले पेरत – पेरत कहां लान डरे हे. बरजत ले घर भर के सियान मन बरजिन, तें कोनो ला नइ पतियाए. नइ पतियाए तभे हिस्सा बंटवारा बर लाखा डरगे . अउ अपन अलगियाए के दुख ला भोगे लगेन. ए पार के सबो दुःख ला अकेल्ला झेलइया के जिनगी का ठिकाना कांही बुता ला करत रा कल नइ परय पेले ढकेले असन कमावत – कमावत जांगर घलोक खिया जाही तइसे लागथे. बने ताकत लगाके काम बुता ला सकेले ला धरबे ते पेट विकाली के सेती सिहरे असन लागथे. परिवार बाढ़गे तभो तो चेतते अइसे कहिके सबो दिन ले कहत आवत हंव. गांव बस्ती मा बनी, भुती करइया ला तियार – तियार के दरोगा मुंशी मन लेगथें.

गांव समाज मा जाबे त रंग – रंग के गोठ सुने बर परथे. पचार – पचार के पुछइया मन असकटावय घलो नहीं. घर भितरी कतका दिन ले खुसरे रहिबे कांही कुछु तो करेच ला परही. चलना कोनो कोती निकल जातेन. इहां तोला कांही नइ सुहावत होही त चल चली. अइसे कहिके हिम्मत के नागर ला चलाएंव. सबो कती देखबे सुनबे त समझ मा आथे. एके जगा अपने गांव के पूर्ति होके नह जीना चाही. दुनिया कतका बड़ हे. हरर- हरर मोटर गाड़ी. पाछू भागत रद्दा चिन्हारी का कर लेबे तइसे लागथे. चाल समझ के चले मा कभू – कभू परता घलोक पर जाथे. पहली – पहली डेरा डंडा गांव ले उठे रिहिस. थोकिन चेत ला जगाए के भरोसा रिहिस अउ जागिस घलोक. जांगर के टूटत ले खंती , गोदी गांव मा कोड़े बर जान. खंती – गोदी काए ठेका बरोबर हो जाथे. पइसा कोन डहर रेंगय तेखर गम नइ मिलत रिहिस नवा जगा मा सवा नवा – नवा होथे अउ नवा नेवरिया के बाते अलग होथे. कोनो – कोनो मेरन ले आये रिहिन होही. परोसी बने – बने मिले ते घर – परवार के चिंता सताए ला धर लेथे. दिखासिखी भले होइस फेर काम बुता ला रोजी के हिसाब मा चलाए के मन होगे. चलत काम ओहू बारो महिना. गांव मा काहे खेती किसानी सिराइस तहां ले ठलहा बुता जादा हो जथे. ठलहा के कन्हिया ला का कहिबे कमजोरहा हो जथे. हकन के कमाए ल परथे ते हकर जथे . हकरत ले कमाए हंव कहिके फेर ओही कोती के रद्दा. फेर दुरमत मचाए के उदिम. चेथी ला खजुवावत दुवारी तीर ठाढ़े – ठाढ़े मंगइया बरोबर खड़े राहय. का करबे अपन दुख ला कतका रोवंव.

कभू – कभू दिन घलोक फिरथे अइसे सुने रेहेंव फेर आज जान डारेंव. साल के साल अपन गांव घर के बढ़ती के चिंता होए लागिस. काठा दू काठा के धनहा मिलय त बिसालेवन. बंटवारा के घर ला दुवारी फोर के फेर समिलहा रेहे के दिन आगे. अपन कमाए खाए बर चार महीना निकल जा फेर चौमास के काम ला निपटा. रबी फसल के आवत ले परिवार के बीच आना-जाना चलते रइथे. गांव ले जादा दुरिया नइ जावन. साइकिल चलावत चलदे अउ टिफिन डब्बा धरले. दिन बुड़िस तहां ले अपन घर के घर. अपन घर अपनेच होथे.
एदे अइसे सुंवरथे घर परिवार. सबो के कमई मा चार पइसा बांच थे घलोक अउ लइकामन के पढ़ई – लिखई घलोक सरलग चलत रइथे. आने वाला समय के सपना घलोक देखते रहना चाही . सबो दिन अइसने थोरे चलही. गाड़ी के दुनो चक्का बने रेंगत राहय . एही जीवन के सार हे. जनम – जनम के जांवर – जोड़ी . आज हावन काली का होही कोनो नइ जाने पाइन तेही पाए के धरम के काम मा घलोक सकलाना चाही. मंदिर देवाला , पूजा पाठ करत अपन मन के शांति बर घलोक संग मा चलना चाही. कतका किसम के साल भर हमर इहां तिहार मनाथन. रोटी पीठा, तेलहा – फुलहा सबो घर ले ममहाती दिया बाती के अंजोर कतक सुघ्घर लागथे. साल के साल जतन करइया अपन घर दुवार ल चिक्कन चाक्कन राखे बर एके संघरा लग जाथें. माइपिल्ला कमाथे ते बुता जल्दी सकला जाथे . समिलहा रहन सहन मा मजा हे. एकता मा ताकत हे.

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