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छत्तीसगढ़ी विशेष : उदुकहा जाय बर परगे चेताए नइ पाएंव तभे सुरेखत हे

गांव, गुड़ी, गोठ बात सबो जमाना ले चले आवत हे.
गांव, गुड़ी, गोठ बात सबो जमाना ले चले आवत हे.

हमन टुकना तोपऊ जिनगी जीयत देखे हावन. बने गोठियात, बतियात गंगा जल पीइस अउ परलोक गमन होगे अइसे घलो होथे. एही मेरन एक ठन बिचार आइस अउ चल दिहिस तें सकेले नइ पाये अउ बिचार उड़ियागे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 14, 2021, 3:07 PM IST
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अब का करना हे तेला बता काबर के अभिच्चे मन होईस अउ तोर आगू मा आके खड़े होंगेंव. कतकोझन उदुक ले कोनो कोती नइ जावंव. जाए धरे के पहिली तियारी होना जरूरी हे. सटले उठ रेंग देबे त समाज मा घलो फरक परथे. कांही केहे के जगा नइ मिलय तभो ले सुनत गुनत अपन पारी के अगोरा होना चाही. का भइगे अभिन मौका नइ मिलिस ते आने पईत देखे जाही. ओदिन के बात हरय फलाना हा अपनेच अपन चीहुर पारे असन गोठियाइस, सभा समाज हलाहल होगे. का भईच तोर मनके नइ निभिस ते थोकिन सोंच बिचार के बोले बर चाही. सबो के इज्जत के खियाल होना चाही. इही चिंतन हा मोला ओलंग लेग डरिस.

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चरकोनिया होतिस ते बने होतिस
देखे मा पता नइ चलय, फेर गोठ बात होइस त सबो झन जान डारिन. चारो कोती हमर चिन्हारी के सेती मान मर्यादा के खियाल राखे ला परथे. कोनो दूसर के बिचार अउ तोर अपन हिसाब लगाके बइठे रइथें. कोन काय काहत हे तेला सुनत सुनत मने मन मा जवाब देहे के गुण आवत रइथे. अइसे जगा देखके अपन जवाब देना चाही जेन जगा मा जरूरत हाबे नइते बात मा नइ राहय.
कलजुगिहा हरय कहिके सबो झन कहिथें फेर अपनो हा ओही जुग मा हावय तेला जानना चाही. गांव, गुड़ी, गोठ बात सबो जमाना ले चले आवत हे. एदे नियाव अनियाव ला कोन नइ जानय, नइ जानतिन त निभतिस कइसे निभाव होवत हावय तेकरे सेती चरकोनिया असन संसारी मन ठीहा ला बनाए सजाए राखे हावंय.



दतकेच मा का हो जाही कइथे
मनसा पाप ला का कहिबे दतकेच मा का हो जाही कहिके कतको झन भटकउल रद्दा ला रेंगाए ला धर लिन. अमरत, ठमरत गोठ बात होना चाही अइसे सियान मन सिखोती गोठियाथें. उम्मर के सिराती आगे हे कहिके कोनो नइ जानय. हमन टुकना तोपऊ जिनगी जीयत देखे हावन. बने गोठियात, बतियात गंगा जल पीइस अउ परलोक गमन होगे अइसे घलो होथे. एही मेरन एक ठन बिचार आइस अउ चल दिहिस तें सकेले नइ पाये अउ बिचार उड़ियागे.

बिचार उड़ियाए के बाद तें कतको मुड़ ला खजुवा फेर ओ बिचार हा वापस आए ला नइ धरय. ठरकाए तहां ले पाछू पछतावा होना जरूरी हे. सबो मनखे के जीवन मा पछतावा के जगा बाढ़त जावत हे ए बने बात नोहे, तभे तो केहे जाथे कोनो कखरो बिगाड़ झन करंय सबो के सेती एक्को झन ला दुख पीरा झन मिलय. थोरको अन्टेरहा कहूं होवत दिखिस ततके मा काखर बिगाड़ हो जाही कोनो नइ जानय. सोंचे अउ गुने एक्के बात ए, हल्का सल्का कहूं होइस त नकसान के डर अमाहिच. बस अतके हमर कहना राहय के कोनो ल कमती झन आकन.

सरेख लेते त का हो जतिस
जुवाबी कहुं मिलगे तहां ले तें जान डार अब तोला अपने बीच मा रहिके ए बात ला सिद्ध करना परही. गांव गंवतरिहा मनखे अपन जिनगी भर सादा सर्वदा जीथे अउ जागत सूतत ओखर रक्षा घलो करथे. पढ़ई लिखई अपन जगा ठीक हे फेर भासा के उदगम ला खोजे मा पाबे के सोंचई अउ बोलई दूनो अपन जगा मा वजनदार लागथें. इही हरय पंचइती के निरमान. पंचइती होवत आवत हे अउ ओ मेरन लिखा पढ़ी के काम नइ हा नवा बात लागथे काबर के पहिली लिखा पढ़ी काए हमर पुरखामन सीखे नइ रिहिन हे. आपस मा गोठ बात करई अउ दूध ला दूध, पानी ला पानी बताके निरनय करिन इही हरय सार बात. फेर आजकाल आबादी बाढ़ गेहे, आना-जाना, देखना सुनना, पढ़ना लिखना अउ विज्ञान के तरक्की ला जानना समझना घलो बड़े बुता होगे हे तेकरे सेती ऊदुक ले चमत्कार होवतहे तइसे लागे ला धर लेहे. ( लेखक साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
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