छत्तीसगढ़ी विशेष - बरपेल्ली गोठियाएंव तभो चिटपोट नइ करिस

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अपने अपन कोनो गुन समा जथे अइसे नइ होवय एमा अनुभव अउ देस काल परिस्थिति के बड़ा महत्तम होथे. एक ले सेक इहां विद्वान होईन अउ आने वाला समय मा होही घलो. एक जगा ले दूसर जगा मा आना जाना सबो दिन ले होवत आवत हे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 29, 2021, 4:10 PM IST
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कोनो किहीं तभे पतियाबे अइसे अनभरोसी गोठ बात बने नोहय. अपन मन मा जेन आइस तेन कहिइया ला कोनो सुनथे के नइ सुनय तेला जनवाना जरूरी हावय. थोरकिन ऊपर नीचे कहुं होगे ततके मा सुनइया रिसिया जथे. ओखर रिसई घलो वाजिब माने गेहे. बिलोर के मजा लेवइया असन कतको झन ला हमू मन जान डरे हन तभो ले निभाव तो करनच परही न तेकरे सेती थोकिन देरी बाद फेर सामने वाला के मन ला टमरे बर बरपेल्ली गोठियाना चाही.

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मन के भीतरी मा काए चलत हे तेला कोन जानही

रेंगे धरे अउ बांधे छादें के बेरा कतको होशियारी करइया इहां हाबे. चलन के सेती जानसुन के कलेचुप रेहे ला परथे. फेर कलेचुप रहइया ला कतका पीरा बियापत होही तेला वोही जानय. चार झन के झेल ला जेन कभू नइ सेहे राहय तेला कतको समझा ले तुरते तोला परिणाम नइ मिलय. अपने अपन सुनगुन सुनगुन करइया ला अपन तीर तार के लोगन ला समझना जरूरी हे नइते एकसरुवा मनखे जिनगी भर दुख पावत रइही अउ कोनो ला जानबा घलो नइ हो पाही. मन घलो अपने अपन चुरत चुरत गढ़ा जावत होही तभे तो हिजगा पारी के मारे कतको झन अपन शरीर रा चुरोवत रइथें. सबो के सेती अभी अउ तभी ला तियागे बिना मन ला मिलौना बनाना जरूरी हाबे अइसे बिचार के पनपना जरूरी हे तभे हमर सुरता घलो सुख के छइहां मा जुड़ावत मिलही.
एक दूसर के आसरा मा जीवन

हमर कोनो नइये अइसे कहिके कतको झन निरास होएला धर लेथें, ये बने बात नोहे. समाज मा आजो हमन जानथन सुख अउ दुख मा कइसे एक दूसर के समझदारी अपने आप पनप जथे. आंखी मा झलकत मया ला कोनो डोहरतिन तो कतका अच्छा हो जतिस. नजर भर देख लिस ततके मा आत्मा जुड़ा जथे. सगा बरोबर कोनो ला मान देवई हमर संस्कार मा बचपन ले समोये जाथे. धीरे धीरे सामाजिक आदमी अपनेच सेती अपन पहिचान बनाथे. कभू कभू अउ कहूं कहूं मनखे मन मा निराशा के भाव झलके लागथे ओतके बेरा ओला स्वयं प्रयास करके देखना चाही के ओकर पूछ परख करई कतको झन हें. जनवाए ला नइ परय तभो सबो जान डारथें. कलछहूं जिनगी भर अपन बेवहार ले लोगन के मन जीतना चाही. भगवान अइसे बेवस्था बना के छोड़ दे हाबे के सबो जनम बर तोर हिसाब मा का रइही तेला कोनो नइ जाने पावंय. अपन भीतरी मा तोला खुदे आभास होवत रइही अउ ते जान डरे होबे तभो ले थोरकुन सुख ला खोजे के सेती रद्दा ला छोड़ना नइ चाही. एक दूसर के बिना संसार नइ चलय. सबो झन सबो बुता ला नइ करे संकय. तभो ले जानत भर ले मदद करतेच रहना चाही.

मांग हाबे तभे तो समिलहा रहना हे



कहां रेहेन अउ आज कहां पहुंचगे हावन. आगू के रद्दा घलो हमन ला दिनमान सोचना हे. सोंचे ततके मा बिचार दउड़े लागथे. काम के परिनाम ला जानके हमन ला आगू के रद्दा ला नापना हे. एक दूसर मा कतको फरक दिखय वो अपन जगा हे. ओला फरक समझ के अपने अपने अपन मा झन राहन देवव. गुण के खान मा सबो के हिस्सा हावय. अपने अपन कोनो गुन समा जथे अइसे नइ होवय एमा अनुभव अउ देस काल परिस्थिति के बड़ा महत्तम होथे. एक ले सेक इहां विद्वान होईन अउ आने वाला समय मा होही घलो. एक जगा ले दूसर जगा मा आना जाना सबो दिन ले होवत आवत हे. कतको जुलमी घलो आइन. आज जुलमी के नाम लेवइया नइये. जेन सत के रद्दा चिनहारी कराइन तेन आज सुरता मा हावंय .

मनभेद झन होवय एमा नकसान जादा होथे

चारझन के सेती नियाव हा नियाव धरे असन जनाथे. पुरत भर ले सबो जिनिस ला मिल बांट के बउरना हमर पुरखा सिखोवत आइन. आज हमरो जिम्मेदारी बाढ़ गेहे हमूमन मिल बांट के राहन. चल दिही ततके मा का होजही. चलना थोकिन हमी एक कदम पाछू होजन अइसे सोंच बनाना चाही. अतका बड़ पृथ्वी तेमा अतका देश अउ देश मा रहइया जीव. देखबे सोंचबे ते भारी अचंभा लागथे. सबो अपन अपन सेती जीयत खावत चलत हें. सबले जादा मनखे मा भेद झन होवय. सबो मिल के अपन योग्यता ला सिध करके चलंय अउ चलावंय. इही आज के मांग हे. (लेखक साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
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