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छत्तीसगढी विशेष - मया दुरिहयावय झन,दू-टप्पा गोठियाए मा काहीं नइ सिरावय

देखले पतियाले नइते पाछू पछताबे.

देखले पतियाले नइते पाछू पछताबे.

हर समे अपन वाला सीख ला धरे धरे कतका दिन ले चलाबे. सहिंच बात के पुछंता होबे ते फेर तोर केहे के ढंग ला बदले ला परही. अउ सूरदास अइसे कहिदेबे ततके मा दिव्यांग के मन मा तोर सो एक नवा बिचार के आवक बाढ़ जाही. सोचबे त विधाता हा कतका जोड़ तोड़ करके ये मानुस तन ला सिरजे हे.

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कोनो कहितिन ते पतियातेन नहीं अपन आंखी में देखथन. कोजानी काली कोनो पतियाही के नहीं. नेवताए सगा ला मान सम्मान मिलही के नहीं इही बिचार हा घेरी-बेरी घोरियावत रइथे. मन ला कतको मनालव फेर ओखर पल्ला भगई ला कोनो नइ रोके सकंय. का जमाना आगे थोकिन घुंच के रेगें ला परही अइसे कहना तो ठीक हे फेर आपस मा गोठियाना बतियाना घलो त चाही कतका दिन ले मुक्का रेंगत रहिबे नमस्ते, पयलगी,जय-जोहार अतकेच मा कतका मया समाए हे तेला कोनो बताएं नइ जाने पाए हें तभे तो भगवान हमर परछो लेवत हे. सबो जनम के सेती इही जनम मा अपन मन के पाप ला हर लेवव अइसे हमर गुनवान संत मन केहे हावंय.समे परिस त कतको गियानिक आगू आईन अउ रीत नीत के रद्दा बताइन.

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आदिमयुग लेके आजतक हमन कतको संत समाज ला देखे सुने हावन, उनकर मन मा एके बात राहय मानव सेवा. सिधवा जान के कइसे मरखरी मड़ाए जाथे एहा देखा देखी नोहय सबो सदादिन ले होवत आवत हे जंगल जंगल जप तप करइया ले लेके आज के ज्ञानी विज्ञानी कतको सबो के रद्दा एके हरय जानले. बिदेशी मन के आंखी मा हमर सुख समृद्धि देखे नइ गिस.कतको झन अपन देस ला छोड़ के हमर इहां आइन हमन जाने नइ पाएन पहुना असन मानेन ओमन घरजियां असन होगिन. अन धन सबो रिहिस हमर इहां, भरपूर भंडार रिहिस तभे तो अनदेखना मन के आंखी मा गड़े लागिस. मईल ला मारके हमला झुको दिन.हमन भल ला भल जानेन अउ ठगा गेन. अपने घर मा पहुना असन जनाए लागिस अइसनहे अनुभो ले हमन सीखते आए हावन अउ आजो सिखोना जरूरी होगे हे.

भटकव झन जी पहिचान बनावव
नवा काल मा हमर जवनहा लइकामन थोकिन रद्दा भटके लागिन हे. भटकउल काखर सेती होवत हे तेमा विचार होना चाही होत बिहिनिया जागरण काल आगे तभो ले कतको झन भुलाए हावंय एही भुलाव हा भटकाव के कारन बनथे.ओदिन के सुरता मा सबो दिन ला मिंझार लेबे तभो नइ मिंझारे सकन काबर के अबड़ खबडब करइया मन उम्हियाए ला धर ले हें. उम्हियावत रेंगत कतका दिन ले चलही एला चर दिनिया बुखार जान.

थोरिच किनके सेती बइरी होगे
हर्रसले कहिदेबे तेने हा तोर बर काल हो जही काल अइसे मायने मा के ओला तोर सेती कभू बिसवास नइ रइही. हर समे अपन वाला सीख ला धरे धरे कतका दिन ले चलाबे. सहिंच बात के पुछंता होबे ते फेर तोर केहे के ढंग ला बदले ला परही. अउ सूरदास अइसे कहिदेबे ततके मा दिव्यांग के मन मा तोर सो एक नवा बिचार के आवक बाढ़ जाही. सोचबे त विधाता हा कतका जोड़ तोड़ करके ये मानुस तन ला सिरजे हे. सब्बो जोड़ घटाना के सेती सरीर अपन बयपार मा लागे रइथे. टूट फूट के अपने अपन मरम्मत होवत रइथे पतत नइ चलय. एकरे सेती व्यवहार मा घलो चेत बिचेत होवई ठीक बात नोहे. अपनेच सेती आवय अइसे जानके केहे सेहे ला परही तभे सबो बात मा राजी खुशी दिखही. रोसलगहा कहूं दिन अलहन ला बला डारबे ते दिन खुदे जान डारबे अइसे सियान के सिखोवन मा झलकथे त आज ले हमला परन करना हे के बोल चाल मा सुन्दराई ल लानना हे.

सबो के जिनगी सबो के सेती
एक दूसर ला देखबे ततके मा कतका विचार मन मा आए ला धर लेथे. पहिली सोंचबे एहर कोने, काहां ले आए होही अउ अइसनहे कतको बात.थोकिन परिचय होइस अउ कहूं मन मिलगिस ते जानले जादा दिन नइ लागय भेंट पायलागी चले लागही. तीज तिहार हांसी खुशी के दिन मा एक दूसर संग संगति मा उठे बइठे के मन हो जथे इही हरय अपन मानवता के परिचय. काम तो लगे रइथे फेर सही चिन्हा चिन्हारी घलो रहना चाही. बखत परे मा इही चिन्हारी रद्दा मंजिल कोती लेगे के सगुन लानथे.बां टे बिराजे भाई बरोबर ए चिन्हारी नोहय एमा तोला जादा माया अउ मया मिलही.

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