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छत्तीसगढ़ी विशेष - लहटाए ला परथे अतलंग के सेती,जाने सुने राहव

समाज मा कतको डाकू मन मुख्य धारा मा आके बड़े बड़े काम कर करे हें अउ ऊंखर नाम घलो चलथे.

समाज मा कतको डाकू मन मुख्य धारा मा आके बड़े बड़े काम कर करे हें अउ ऊंखर नाम घलो चलथे.

तरक्की के संग ला धरना परही अइसे जान के लहटाए ला परथे. लहटत लहटत ओला एकठन शिक्षा जरूर मिलही के ए रद्दा मा रेंगे रेंगे तोला जिहां जाना हे जा सकत हावस. इही रद्दा मा जिनगी के सार मिलही.

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जगा ला देख डरे कतका नकसान होवत हे. कोनो होवय सहत भर ले सहथे तभे निभाव होथे. कोनो कोनो मेरन सेती मेती घलो चलाए असन लागथे फेर के दिन चलही. कतको झन गुसियाए असन करथे त उपरसंस्सु चले ला धर लेथे. अपन देह मा अइसन भाव आना जेमा सांस फूले ला धर लेथे बने नोहय तेखर सेती लहटाए ला परथे.

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कहां के बात कहां घटाए
अतलंगहा मन समाज विरोधी काम के अगुवा होथे. ऊंखर बर सबो दिन एके बरोबर रइथे. काम बुता कांही करे निही अउ सिद्धो मा सबो जिनिस के सुख साधन चाही. सोज रद्दा रेंगइया घलो सोंचथे के अइसन आदमी सो भेंट झन होवय. पोसे बेंदरा असन दांत ला खिरोरत हे तभो समझे जाथे के हांसत हे. ये बात ला सबो जान डारही त का होही तेखर चिंता कोन करही. समझदारी अतके मा हे के थोरकुन ओखरो मन के सोंच ला बहुराए के मौका समझना चाही. घर परवार, पारा मोहल्ला मा जाबे ततके मा कारन समझ मा आए ला धर लेथे उही मेरन सबो कारन ला घटाए ला परही तभे नवा रद्दा के चिन्हारी होही. समाज मा कतको डाकू मन मुख्य धारा मा आके बड़े बड़े काम कर करे हें अउ ऊंखर नाम घलो चलथे. जाने सुने के उम्मर मा काम बुता तियारना चाही. बुता तियारे म मनखे जात के मान सम्मान घलो जुरे रथे. मान सम्मान के खियाल घलो जरूरी हे. अपन सक भर काम करने वाला ला छांटना घलो बहुत महत्तम राखथे तभे समाज के मुख्य धारा मा आके ओहा अपन नाम ला जगाही.

कई ठन बात इसारा करे मा बन जाथे
केहे अउ सुने के घलो अपन नाम हे. बात आथे अउ बात जाथे एला सबो जागत होही अइसे कहना ए संसार के नियम बने हे. बोले सुने के गुण सबो जीव मा होथे. जीव जगत हा अपन सुभाव ला जान डारथे अउ देख सुन के व्यवहार मा उतारना शुरू करथे. कतको जगा समझदारी के औसत निकालबे त जानबा होही के कइसे हमर तिस्तार मा होवत जावत हाबे अउ निभत आवत हबे. अब आथे के एक दूसर ले दुरिहा रहिके घलो अपन बिचार ला बिना कहे सुने कइसे पहुंचाए जाए. ऐखर बर आदिकाल के कल्पना करले ततके मा सबो बात स्पष्ट हो जाही. कइसे होइस होही अपन के बढ़वार अउ बढ़वार होवत होवत मन मस्तिष्क मा नवा नवा बात घुमरत रिहिस होही. हर्रस ले कांही नवा बिचार आइस होही अउ उही हा व्यवहार मा परिवर्तन लानिस होही.एकरे सेती लिखइया पोंछइया मन कहिथें के दुनिया मा सबले बड़े भासा इसारा के भासा होथे. हजारों हजार भासा के बोलइया मन घलो एक दूसर के इसारा ला जान डारथें. चलना जाना ए हरय जीव जगत के सार हलचल नइ करबे ते नइ बनय. अपने अपन गोड़ उठे ला धर लेथे. गोड़ उठत देरी हे फेर जागृत होए मा देरी नइ लागय. गोठियाए बतियाए मा समय लागथे फेर इसारा करे मा का हे. समय घलो सोंच मा परगे अउ अपन काम होगे.

एके रकम के होतिन त का होतिस
पालनहार भेजिस अउ दुनिया मा अपन अपन जगा ला चतवारे बर उदिम करना हे कहिके चेताइस घलो.जेन चेतलगहा अपन बुता मा लागगे तेन अगुवा बनके रिहिस अउ अगुवा बने के सेती ओखर काम बाढ़गे. अकेल्ला होतिस ते काबर फेर समूह ला देख के जोंगिस.काम बुता जोंगइया ला रंग रंग काम बुता चाही अउ इसी जोंगे जांगे के सेती काम हा एके रकम के नइ होय सकय. जोरलगहा काम हावस त जोरलगहा सकेल. धिरलगहा काम हावय त धिरलगहा सकेल.अइसे करत करत नवा जमाना आगे अउ देखबे त हम कहां रेहेन अउ कहां आगेन.

इकरे सेती कीथंव लहराले बने
तरक्की के संग ला धरना परही अइसे जान के लहटाए ला परथे. लहटत लहटत ओला एकठन शिक्षा जरूर मिलही के ए रद्दा मा रेंगे रेंगे तोला जिहां जाना हे जा सकत हावस. इही रद्दा मा जिनगी के सार मिलही. जिहां जिनगी के सार मिलगे तिहां ते जान डारबे तोला आजे आज मा जीना घलो मोहनी डारे असन लागही.

( लेखक साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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