छत्तीसगढ़ी विशेष: छत्तीसगढ़िया के जाड़ भगाय अउ सुरक्षा के जुन्ना उदीम अंगेठा आगी

छत्तीसगढ़ मा आदिवासी क्षेत्र मा घर मन अउ गांव मन घलो दुरिहा दुरिहा अउ जंगल भीतरी मा रुखराई के बीच मा रहिथे.

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  • Last Updated: October 22, 2020, 12:41 AM IST
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त्तीसगढ़ मा 45 प्रतिशत आगर जगा हा जंगल, पहाड़ी, नरवा, ढोड़गा, पर्वत पहाड हावय, जिहाँ बड़े बड़े रुखराई हावे. रुख राई चातर राज मा घलो कमती नइ हे. छ्त्तीसगढ़ मा 36 ठन गढ़ रहिस जिहाँ राजा महराजा जमींदार मन राज करत रहिस. इँखर सब भुँइया, राजमहल हा घलो जंगल मा रहिस. बस्तर ले सरगुजा, चौंकी ले नवागढ़ तक आदिवासी राजा मनके गढ़ रहिस. आजादी के पाछू विकास होय हे फेर एकर ले पहिली छत्तीसगढ़ के रहाइया मन जंगल मा जादा रहय.

छत्तीसगढ़ मा आदिवासी क्षेत्र मा घर मन अउ गांव मन घलो दुरिहा दुरिहा अउ जंगल भीतरी मा रुखराई के बीच मा रहिथे. घर मन घलो छेल्ला छेल्ला बने रहिथे. जंगल गाँव मा रहइया मनके घर कुरिया चारो मुड़ा ले बंद अउ बीच मा अंगना रहिथे. घर कुरिया हा जादा लकड़ी के जिनिस के बने रहिथे. रुँधना बँधना हा घलो लकड़ी के बने होथे. राँधे खाय, सूते बइठे, रेहे बसे के कुरिया अउ खेती बारी कमाय के जिनिस मन  ला घलो लकड़ी के बउरथे. जब ये जिनीस सरे घुनाय लग जाथे तब एला आगी बारे जाथे. आगी बारे बर दू किसम ले बउरथे. एक तो चूल्हा मा जेवन राँधेबर नइते अंगेठा बारे बर.

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छत्तीसगढ़ के जंगल डहर के अउ आदिवासी गाँव मा अंगेठा के परंपरा पुरखौती ले चले आवत हे. पहिली माचिस नइ रहिस तभो 24 घंटा घर मा आगी रहय.एला राखे बर किसम किसम के उदीम करे जावे. परंपरा ले गोरसी मा आगी राखे के परंपरा घलो हावय. गोरसी मा छेना के आधा कुटका ला टोरके भीतर के आगी संग मिंझार देवय. कुटका मा आगी सिपच जाय अउ ओला उपर ले राख मा ढाँक के राखे जेमा लघियाँत झन खपय. धान के भूँसा ला घलो गोरसी भरे. फेर आगी ला 24 घंटा राखे के सबले जुन्ना उदीम आय अंगेठा आगी.
अंगेठा लगड़ी के अपने अपन सिपचत मोट्ठा लकड़ी ला कहे जाथे जेमा लकड़ी के एक मुड़ी मा आगी सिपचे रहिथे. आदिवासी क्षेत्र मा अंगेठा बारे के कोनों दिन तिथि नइ रहय. लकड़ी के इहाँ का कमती ? इहाँ रात दिन 24 घंटा लकड़ी के आगी अँगेठा हा अपने अपन बरत सिपचत रहिथे. लकड़ी के सइघो गोला ला एक घाँव अँगेठा मा सिपचा दे जाथे तहन हफ्ता पन्द्रही तक देखे बर नइ लगय. जाड़ दिन मा गाँव मा दू ठन मोटहा लम्बा रुख के पेड़ोरा असन  लकड़ी के मुँहू ला जोड़ के आगी सिपचा देय जाथे. जब ये लकड़ी मन सिराथे ता फेर दूसर दू ठन अइसने गोला ला जोड़ दे जाथे.

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आदिकाल मा मनखे हा आगी ला पाय के पाछू घलो जंगल मा रहत रहिस. जंगल मा किसम किसम के जीव जन्तु, कीरा मकोरा, साँप डेढू रहिथे. आगी ले जंगल के सबो जीव जन्तु मन डर्राथे. ता मनखे हा इही ला उँखर ले अपन सुरक्षा के हथियार बनाइस. जाड़ के दिन मा गरमी पाय के उदीम घलो ओहा अंगेठा ला बनाइस.

छत्तीसगढ़ के पहाड़ी जंगल भीतरी के गाँव मा आज घलो आदिकाल के इही परंपरा चले आवत हे. इही अंगेठा के आगी मा बिहनिया ले चहा बना लेथे. जंगल गाँव मा जाड़ थोकिन अक्तिहाच लागथे. जाड़ के दिन मा महतारी मन जेवन घलो इही मा बना लेथे. मनखे मन अंगेठा के तीर बइठ के जेवन कर लेथे अउ ओढ़े जठाय के कमती रथे ता सियान मन कुनकुनहा लागत हे किहिके अंगेठा के तीर मा जागे जागे सुत घलो जाथे. फेर आज सब जंगल ला काट के गाँव अउ शहर मा  बेचे जावत हे.घर मन पक्की बनत हे उहाँ लकड़ी बारे मा धुँगिया जही कहिके अंगेठा नइ बारे. घर ला गरम रखे के अउ जेवन पानी के किसम किसम के जिनिस आ गे हवय. ओढ़े जठाय पहिरे के गरम कपड़ा आय पाछू ले अंगेठा ला बिसरावत हें.
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