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छत्तीसगढ़ी विशेष - जिनगी के नवा मोड़

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अपन बेटा के गोठ ल सुन के दाई ओखर उपर भड़कगे जोर से अपन बेटा ल किहिस-अरे ! रामशरण तोरे म ठिकाना नइ हे. अपन लोग लइका मन ल दबा के रखतेस त ये दिन देखे बर नइ परतिस. चार लइका के बाप हो के अब तहूँ जवाब देय के लइक होगे हस. अपन महतारी ल जवाब दे बर सीखगे

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 27, 2021, 6:14 PM IST
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राजकुमारी दाई के फेर लाल आँखी दिखिस. घर म सन्नाटा छागे. कोन जनी का होगे दाई आज फेर बरसे बिना नइ राहय. घर के लइका मन कलेचुप होगे. बाबूजी चुपे-चुप लइका मन ल बला-बला के पूछत राहय कइसे रे बबलू का होगे? नोनीं ल धीर लगा के पूछिस का होगे ओ. बड़े बहुरिया, छोटे बहुरिया कोनो त बतातिन फेर कखरो मुहूँ नइ खुलिस. दाई बिजली बरोबर जोरदरहा चमकिस. अपन पोता-पोती ल पूछिस-करसी ल कोन फोरिस हे रे? पूरा परछी चिखला-चिखला होगे. बजार ले नवा करसी लाने रेहेंव तेंन ह फूटगे. दु झन बहू कोनो काम के नइ हें. सब अपन-अपन आँखी ल तोप के रेंगथें. बड़े बहुरिया रानी के कहनी-किस्साच अलग हे.

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बड़े घर के आय फेर आय-जाय कुछु नहिं. भात रांधथे त चिबरी हो जथे. आधा चाउंर चूरथे आधा अधचुरा रही जथे. कखरो सुने-गुने नहीं, मनमौजी हे. दिमाग हे त पथरा-ढेला बरोबर रटट-फटट कोनो ल कुछु गुनबे नइ करे. अउ खुदे रोय बर बइठ जथे. दाई बुदबुदइस का करंव सूरज के बाबू तुमन रहितेव त देखतेव तुहंर जाय के बाद इहाँ रोजे कोहराम माते रहिथे. दाई के अगियाय-बगियाय रूप ल देख के नोंनी के ददा रामशरण ले चुप नइ रेहे गिस अउ अपन महतारी ल किहिस-दाई, तेंहा कहाँ के बात ल कहाँ लान के पटकत हस. कोनो लइका पानी हेरत रिहिस होही त लोटा-गिलास हाथ ले छूट के गिर परिस होही. एक ठन करसी के नाव ले के पोथी-पुरान धर के बइठगे’.



अपन बेटा के गोठ ल सुन के दाई ओखर उपर भड़कगे जोर से अपन बेटा ल किहिस-अरे! रामशरण तोरे म ठिकाना नइ हे. अपन लोग लइका मन ल दबा के रखतेस त ये दिन देखे बर नइ परतिस. चार लइका के बाप हो के अब तहूँ जवाब देय के लइक होगे हस. अपन महतारी ल जवाब दे बर सीखगे! अइसे कहिके खुदे दाई कलप-कलप के रोय लगिस. बाबू रामशरण के मन दाई के रोय ले दुखी होगे. किहिस- नहीं दाई, मेंहा तोर पांव परत हों. मोर गलती ल माफ कर दाई तोर चरन म हमर सरग हे. अइसे कहि के रामशरण अपन महतारी के गोड़ म अपन मुड़ ल मड़ा दिस. करसी ह लइका मन ले फूट-फाट गिस होही. नानकुन बात ल जादा झन लमा काहत हों दाई. महतारी महतारीच होथे न.
बेटा के बात ल सुन के दाई राजकुमारी नरम परिस. तभे दस बरस के ओखर पोती हर आके दाई के पाँव परिस. अउ हाथ जोर के किहिस-दाई, करसी हर मोर हाथ ले फूटिस हे. स्कूल ले आएंव त जोरदार पियास लागिस. लोटा म मरकी के पानी ल निकाले के कोशिश करत रेहेंव तभे पीतल के लोटा ह हाथ ले छूटगे, करसी ह फूटगे अउ पानी बोहागे. दीदी हर मोला जोरदार चमकइस त मेंहा माई कुरिया म रोवत सुते रेहेंव. अउ इहाँ महाभारत होवत हे.’ अतका कहि के नोंनी धनेसरी फेर सुसकना शुरू करिस त दाई राजकुमारी के मया छछागे. धनेसरी उप्पर दाई के खूब मया राहय. ओला अपन गोदी म बइठार के ओखर आंसू खुदे अपन लुगरा के अंचरा म पोछ्न लगिस. रामशरण बाबू ओखर मया ल देख के राहत महसूस करिस. मन म सोचिस चल दाई चुप त होइस.

रामशरण बाबू ल बचपन के सुरता आगे जब दाई कठिन से कठिन परिस्थिति म घलो अपन लोग लइका मन ल कमती आमदनी म पालिस-पोसिस अउ सबके जरूरत ल पूरा करिस. फेर लइका मन ल कखरो घर मांगे-जांचे बर नइ जान दिस. घोर गरीबी म दाई के खुद्दारी मुरझइस नहीं. दाई अपन बात के पक्का राहय. दाई के छोटे बेटा रामदयाल चार साल के रिहिस तभे ददा चल बसिस. ददा के मरे के बाद दाई हर दु झन बहिनी अउ छोटे भाई रामदरस के बर-बिहाव करिस. दाई जब ए घर म बहू बन के आय रिहिस तब गहना गूठा ले लदाय रिहिस.

बड़हर घर के बेटी रिहिस. मइके के घमंड कभू करबे नइ करिस. दू-तीन अक्कड़ खेत के भरोसा जीना बहुत कठिन रिहिस. धान-पान कभू होय कभू आख़िरी पानी के रद्दा देखत खड़े फसल सुखा जाय. फेर बनी-भूती सहारा राहय. कभू काम मिले, कभू नई मिले. हमर गाँव म स्कूल खुलिस त गाँव भर के मनखे तिहार मनइंन. अतराब के चार-छह गाँव के लइका मन घलो रेंगत–रेंगत पढ़े बर आंय. दाई बपरी अक्षर गियान ले शून्य हे. फेर अपन लइका मन ल पढ़ाय-लिखाय बर कछोरा भिर के खड़े राहय. अपन लइका ल पढ़े के ओला बड़ संउख राहय. गाँव के स्कूल म मास्टर-मास्टरिंन मन घर के तीरे म किराया के मकान म राहंय. उनकर किरपा होइस त सब भाई-बहिनी बने पढ़-लिख के तियार होगेंन .मैं खुद सरकारी दफ्तर म बाबू होगेंव, छोटे भाई स्कूल मास्टर होगे. गरीबी के दिन बीतिस. दाई के दु बहू, तीन पोता-तीन पोती हे.एक बेटा रामदयाल कुंआरा हे.बिहाव के लइक होवत हे. फेर दाई ओला सब ले जादा पढाना चाहथे. ओहा तीन –पांच ले अलग अपने पढ़ई म बूड़े रहिथे.

रामशरण अउ रामदरस दुनो भाई के संयुक्त परिवार हे. राजकुमारी दाई के बड़े बहू खटपटही हे. बोले बताय म अव्वल अउ काम करे बर करमचोट्टी. आरामपसंद हे. बात म बतंगड़. छोटे बहू मेट्रिक तक पढ़े लिखे हे. ओला अपन पढ़ई के घमंड हे. नवा हे. फेर सास के बात सुनथे. सास के खाय-पिए अउ ओखर स्वास्थ्य के चिंता-फ़िकर करथे. घर के जादा बुता छोटकीच ह करथे. कुछ दिन से राजकुमारी दाई घर म बड़े बहू के लपर-झपर ल देख के भड़क जथे. जइसे-तइसे समे बितत गिस. अब एक चुलहा हर दु ठन होगे. आए दिन घर म कोनो न कोनो बात ल लेके लड़ई झगरा होते राहय. दाई राजकुमारी ह बड़े बहू के रंग ढग ल देख के भाई बंटवारा करा दिस. खिसिया के किहिस अलग खाव तब झख मार के बुता करे बर लागही. बाबू रामशरण नइ चाहत रिहिस के चुलहा अलग हो. दाई अपन बहू के भला करे बर ओला अलगा दिस. बड़े बहुरिया खुश होइस. चार दिन बाबू रामचरण अपन डौकी संग अनबोलना बांधे रिहिस. बहुत नराज राहय, बने खाय न पिए.चारे दिन म दुब्रागे राहय. फेर दाई के सीख काम अइस.करू दवई खाय ले जब तबियत ठीक हो सकत हे तो खा लेना चाही.

बंटवारा होय के एक साल, दु साल, तीन साल बितगे. एक दिन अचानक बड़े बहू चक्कर खा के गिरगे. ओखर सेती घर म रोना-गाना मचगे. तुरत एम्बुलेंस म ओला अस्पताल लेगे गिस. डॉ.किहिस बहुरिया के हालत गंभीर हे. डॉ.ईलाज शुरू करिस. खूब दवा-दारू चलिस. हार्ट-अटेक रिहिस .फेर राजकुमारी दाई के हिम्मत अउ सूझबूझ समे म काम अइस तुरंत सरकारी एम्बुलेंस म अपन बहू ल ले के वोला भर्ती करवाय रिहिस. समे म इलाज होगे. डॉ.किहिस के थोरकुन अउ देरी हो जतिस त बहुरिया ल बचा पाना मुश्किल होतिस. धीरे धीरे बहुरिया के तबियत ठीक होइस ओखर अस्पताल ले छुट्टी होगे. जब वोला पता चलिस के ओखर परान सास राजकुमारी दाई के सेती बाचिस हे त ओहा अपन सास के पाँव ल धर लिस. भावुक हो के किहिस माताजी मोला क्षमा करो. मोर सेती तुमन बहुत दुःख उठाय हो. ओ घटना के बाद से बड़े बहू एकदम बदलगे. ओ किहिस के हम ल सब मिलके चलना चाही. परिवार के सुख-दुःख म सब संगे-संग राहन इही ठीक रही. अउ फेर दुनो परिवार एक हो गे. घर के काम-बुता सब मिलजुल के करें.सास रामकुमारी दाई के सब खूब मान करें. परिवार म तोर-मोर के भेदभाव खतम होगे. अब बाबू रामशरण के जिनगी म एक नवा मोड़ आगे. (डिसक्लेमर- लेखक साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
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