छत्तीसगढ़ी -खमसरहा झन होवय कहिके चिंता करथे किसान काबर के खेती जिनगी के आधार हरे

कमाबे तभे बने सकेले के बेरा पाबे

पृथ्वी माता सबो के सेवा जतन करत आवत हे. पांचो तत्व के निर्माण इही पृथ्वी माता मा साक्षात् दिखथे. जीव धरे ततके मा तोर लेखा जोखा रखना चालू हो जाथे. जानसुन के अनसुनहा कतका झन होही तेला आज तेंहा नइ जाने सकस.

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खमसरहा कइसे होगे हमर खेत के फसल अइसे चिंता ला धरके किसान सोंचे लागथे. इही भाव ला लेके सबो जीवधारी एती ओती सोंचे बिचारे लागथे. बने होगे ते कोई बात नइ फेर बिगड़े मा फसल के पैदावार फरक खाथे. कांही फसल होवय के खरपतवार होवय पानी पाना जरूरी हे. ढकेलत पानी गलगलले बोहाती होगे तहां ले का पूछबे पनिया अकाल के संसो बियाषे ला धर लेथे.एकरे सेती केहे गेहे अति घलो बने नोहे. अपने आंखी मा आंसू आथे तभे दुख पीरा हा जनाथे.

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पृथ्वी लोक घलो अपन दुःख ला रोवत हे
बांटे बिराजे,बने राखे रहिबे.अपन हिस्सा मा हिसाब लगाके कमा.कमाबे तभे बने सकेले के बेरा पाबे. अइसे कहना हरे अइसे झन समझो. सच्चाई ला कहनी किस्सा झन मानव. देखके घलो कई झन आंखी ला मुंदे असन करे रइथें ए बात हा बने नोहय. अपन सुवारथ के सेती मनखे अपनेमन के रेंगे ला धर लेहे. कतको झन ला चेताबे तभो नइ चेतंय. पृथ्वी माता सबो के सेवा जतन करत आवत हे. पांचो तत्व के निर्माण इही पृथ्वी माता मा साक्षात् दिखथे. जीव धरे ततके मा तोर लेखा जोखा रखना चालू हो जाथे. जानसुन के अनसुनहा कतका झन होही तेला आज तेंहा नइ जाने सकस. रपोटे धरे के सुवारथ मा कतकोझन चल घलो गिन. लेकिन कुछु नहीं फेर सोसन के रद्दा ला बतावत बतावत सुन गिन. अइसने कहूं चलत रिही त का होही तेखर असर ला देखे जा सकत हे. आए दिन कांही न कांही अलहन हमर आगू मा बीतत जावत हे अउ हमन घेपत नइ हन.

हमला का करना हे कहिके टरकावव झन
घरउदिहा जान के माने गउने अउ जेन थोरकुन दुरिहा जनाइस तेला सेठे नहीं एहू हा बात होइस. आज अउ काल नइतो परोदिन सबो झन ला एके जगा जाना हे. दिन पुरगे तभे तो दुःख ला दुःखी होए बर परगे, अउ तोर समाज मा का स्थिति होइस तेला जाने. सुख होवय चाहे दुःख होवय परछो लेवत तोर आगू,पाछू के हिसाब ला तिहीं जान सकत हस. हाबे कोनो अइसे जानबा होना जरूरी हे. कोनो तो हावय जेन दुनिया ला चलावत हावय. सोंचे के सेती बिचारे मा समय लगाना चाही.बिचार करे मा समय लागथे फेर ओही समय हा निरनय लेहे मा मदद घलो करथे. टरकावत टरकावत आपो के मन असकटा जाही काबर के भीतरी मा जेन तोर चालन अउ पालनहार हे तेन सबो निरनय ला जानत रहिथे अउ तोला भूलवारे बर खेल रचावत रहिथे.कांही झन होवय कहिके परिवार मा घेरी बेरी सुख शांति बनाए बर नइ परय एक घांव नियम ना चले तहां ओही आगू पाछू चलतेच रहना चाही. रहना बसना सरी दिन हावय.आज ते रहिबे ते काली कोनो अउ रइंही अइसे सोंच बनावत चलना आज के जमाना मा जरूरी हे.

आवत जावत रहिबे तभे बनथे
समाज मा होवय चाहे. खेत,खलिहान,जंगल,पहाड़ होवय तोला चेतलगा आए जाए ला परही नइते एके जगा मा रहिके पछताबे. पछतावा झन होवय तभे तो ऋषि मुनि ज्ञानी ध्यानी मन धुनी रमाईन अउ रद्दा घलो रेंगिन.रद्दा रेंगइया कतको झन के आसरा मा पूरा संसार चलत अउ बाजत हे. बाजत हे केहे मा एक्के बात हावय के रंग- रंग के फेसन होगे हावय के दुनिया नानेचकुन हावय तइसे लागथे तभे तो पृथ्वी माता ला छोड़के आने ग्रह मा जाए के तियारी होवत हावय.

कइसे होही नियाव चलना गांव कोती
नान नान घर कुरिया तेमा सुखी संसार हे नींद भर सोवइया अउ ससन भर बुता करइया के तें कतको बड़ाई करले कमतिच लागही.दिन भरहा निकलगे कमइया अउ कमइलिन घर दुवारी करके रांधिस गढ़हिस अउ लोग लइका ला खवा पिया के हरहिंछा होगिस तहां निकलगे.अपन कमिया बर पेज पसिया लेके. दिन भरहा कमइला के पेट पसिया पानी पागे ततके मा नवा जीवन मिलगे तइसे लागत होही तभे तो दिन बुड़ती अपन घर पहुंच के सुरताथे. नियाव अनियाव अतके हावय के पउनी पसारी अउ खेत खार,तरिया पार सबो अपन जगा बेवस्था चाक चौबंद होना चाही. झगरा झांसी काए एला गांव वाला मन जानय नहीं.ससन भर कमा अउ पलथिया के खा. सुख दुख मा गांव बस्ती के संग मा संग मिलाके चल बस अतकेच हावय इहां के नियाव. अभी घलो बारो महिना इहां काम हावय.काम करने वाला होना चाही. चकाचक अंगना परछी अउ बारी बरछा खार के सेती कोनो दुख नइ पांवय. फल फलहरी साग भाजी दार दरहन सबो जिनिस उपजावत बारो महिना के तिहार ला मनावत, जागत इहां के संसार ए.सबो किसम के सुख ला सकेले के जगा हरय हमर गांव.

(लेखक छत्तीसगढी के सुपरिचित साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)