छत्तीसगढ़ी में पढ़ें -बजार म पाँच सौ रूपिया के नोट परेवा कस उड़ागे तहाँ ले नाड़ी जुड़ागे

कोरोनाकाल म सौ रूपिया सिकुड़ के दस रूपिया बरोबर होगे हे
कोरोनाकाल म सौ रूपिया सिकुड़ के दस रूपिया बरोबर होगे हे

‘गोबरदास किहिस-‘तें ह जानत हस न मेंहा अपन हरूना धान ल कोचिया तीर बेच देंव .तुरत फुरत पइसा के जरूवत रिहिस . सरकारी खरीद(एक दिसम्बर 200) के रद्दा ल देखतेंव त लइका मन मुहूँ चुचवात रही जतिस . घाटा होइस ते होइस देवारी तिहार म लइका मन त नइ लुलवाइंन .

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  • Last Updated: November 17, 2020, 12:58 PM IST
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गोबरदास अपन घर म रउनिया तापत अपन चिंता म बूड़े-बूड़े बुदबुदावत रिहिस ‘आमदनी अठन्नी अउ खरचा रुपैय्या’ का करवं का नइ करवं भैय्या? कोरोनाकाल म सौ रूपिया सिकुड़ के दस रूपिया बरोबर होगे हे. पांच सौ के नोट बड़ पावर वाले जनाथे फेर बजार म एला धर के जाबे तहाँ ले एखरो पोल खुल जथे. थोरकुन लेन देन करे तहाँ ले रूपिया परेवा कस फुर्र ले उड़ा जथे. नाड़ी ल जुड़ कर देथे. हर जीनिस माहंगा हे. दु–चार अक्कड़ (एकड़) खेती म का कर लेबे? पापी पेट म चाउरेच ल झुक्खा कतेक ओइरबे?

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किसान के आँसू



दुआर खटखटाय के आवाज अइस. गोबरदास दउड़ के कपाट खोलिस. देखिस त खबरीलाल दोना म जलेबी धरे खड़े हे. गोबरदास ओखर सुआगत करिस अउ ओला मचोली म बइठारिस. राम –रमउआ होइस. उन जलेबी खावत-खावत गोठियइन. खबरीलाल लवछरहा गोबरदास के बुदबुदाहट ल सुन ले रिहिस. खबरीलाल किहिस –‘चल ‘देवारी तिहार निपटगे. गोबर भाई तें हर कइसे चिंता म डूबकत अउ बुड़त दिखथस? ‘गोबरदास किहिस-‘तें ह जानत हस न मेंहा अपन हरूना धान ल कोचिया तीर बेच देंव. तुरत फुरत पइसा के जरूवत रिहिस. सरकारी खरीद(एक दिसम्बर 200) के रद्दा ल देखतेंव त लइका मन मुहूँ चुचवात रही जतिस. घाटा होइस ते होइस देवारी तिहार म लइका मन त नइ लुलवाइंन. फेर का करबे महंगाई ह लिलों–लिलों करत हे. सरकार के नींद परे हे. विकास दिखत नइ हे फेर ढोल बाजत हे तेंन सुनावत हे. कतको झन नकली खुशी म नाचत हें.’
अपने ओसाथें ,अपने फुनथें
खबरीलाल किहिस –‘का करबे कम–जादा सबे के वुही हाल हे. नेता मन के का हे गा, रंग–रंग के गोठियावत हें. बजार म आगी लगे हे. आलू कथे मोला खा के देखो. गोंदली (पियाज) कथे मोला घर लान के देखो.’ के बखत लाहू, ला के देखो. तभे फेर कपाट बाजिस. अरे ! आ गा ,लालबुझक्कड़ तहूँ बने बेरा म आय हस ,बइठ.बजार के बतरस म लगे हन. हमर कोन सुनही ? चुनाव के चांव-चांव तहाँ ले उन अपने ओसाथें, अपने फूनथें. ’नवम्बर महीना बितगे तभो ले महंगई तिलिंग म चढ़ के बांसुरी बजावत हे .’

राजनीतिक पत्ता खोले के कला
लालबुझक्कड़ किहिस –‘गाँव के कतको झन किसान मन अपन धान ल कोचिया मन तिर कम दाम म बेच डरिन. सरकारी खरीद के गोठ जनौला बरोबर लगत हे .’ खबरीलाल किहिस-‘धान बोनस के तीसर किश्त के खूब शोरगुल होइस. छोटे किसान ल बोनस के कतका रू कम से कम मिलिस? एला फरिहा के कोनो अभी तक नइ गोठियाय हें . एक अक्कड़ ले पांच अक्कड़ के किसान ल कतका रकम मिलिस एला कोनो नइ बतांय .’ ‘गोबरदास किहिस-‘हमर नेताजी मन बड़ गियानिक हवें . जतका पत्ता खोलना चाही वोतके पत्ता खोलथें . कोरोनाकाल म झट उन अपन तनखा अउ भत्ता ल सीधा दुगुना (डबल) कर डरिंन . बंफर बहुमत के बाद घलो अतेक जादा हड़बड़ी काबर ? कोनो मंत्रीजी, विधायक जी चिंव चावं नइ करिन . अइसन चमत्कार हमर छ्त्तीसगढ़ म मौसम–बेमौसम होते रहिथे.’

साग के भाव म आगी लग गे
अभी–अभी शेखचिल्ली घलो अइस . ओखरो महंगाई प्रवचन शुरू होइस . शेखचिल्ली किहिस –‘आलू ,गोद्ली अपन शतक यात्रा म निकले हें ,पताल ,करेला ,मूनगा ,तोरई ,भिन्डी ,सेमी ,कुंदरू ,जीमीकंदा ,डोड़का ,कुम्हड़ा ,चुकन्दर ,कोचई ,लउकी ,तुमा ,मिरी (मिर्चा ),बरबट्टी ,गाँठ गोभी ,ढेंस ,मुरई ,मूनगा ,गोभी ,चुरचुटिया ,गाजर , टिंडा ,केरा ,ये सब साग अर्द्ध-शतक रू.ले काफी आघू चलत हें .कोनो साठ रू.कोनो सत्तर रू.त कोनो अस्सी,नब्बे रूपिया प्रति किलो के गौरव हासिल कर खरीददार मन के हालत पतली कर दे हें .’

भाजी के घलो बड़े चुनौती
गोबरदास किहिस-‘भाजी मन घलो महंगाई बढाय म राजी हे . लाल भाजी ,गोंदली भाजी ,कांदा भाजी ,गुमी भाजी, पालक भाजी,बर्रे भाजी,चेंच भाजी,मुरई भाजी,गोभी भाजी,चौलाई भाजी,पथर्रा भाजी,कोंहडा भाजी आदि के जोर अस्सी /साठ/पचास रू. किलो म बिकत हे . इहु मन अपन–अपन अर्द्ध-शतक रू के स्कोर ले तेजी से बढ़े के कोशिश म हें . फल के भाव घलो बढत बनाय आम -आदमी ल आउट करत चलत हें . ये गेम बाउंड्री के बिना चलत हे . बाढ़े कीमत म राहर दार देखावत हे मझधार .’ राशन ,किराना सामान सब मनमौजी हें चढ़त जादा हें, उतरत कम हें . सब कोरोना किरपा वाले हें .जनता के क्रय –शक्ति के परीच्छा लेवत हें .’

बस के उदासी, दु-पहिया सांय –सांय
शेखचिल्ली किहिस –‘ कोनो –कोनो जगा ल छोड़ के बस बंद हे . रेल दुक्का –तिक्का चलत हे . लोकल रेल टोटल बंद हे . अइसना म दु–चक्का वाले वाहन हवा म खूब सनसनावत हें . नवा–नेवरिया लइका मन अपन नवा दु–पहिया वाहन ले सड़क ल दउड़ावत हें . अइसे लागथे के उनकर दु–पहिया वाहन के पाछू-पाछू सड़क सांस रोक के पल्ला भागत हे . उन हवा ले बात नइ करत हें ,हवा उनकर ले बात करत हें . कोरोनाकाल म बस सवारी खोजत हें . बस म सवारी करना हिम्मत के बात हे . बस मालिक उदास हें . कब तक ये कोरोना-अंधेर चलही भगवान जाने . सावधान कोरोना सब जगा हे ये आवाज कान-कान म घनघनावत हे .

ध्वनि–परदूसन के मार : यक्ष प्रश्न कस
हवा म प्रदूसन बाढ़ीस हे . ध्वनि-प्रदूसन सरकार ल नइ जनाय . माननीय सुप्रीम कोर्ट ,माननीय हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार के कान खड़े नइ होय . यहू लोकतंत्र हे . जनता –जनार्दन ल बात –बात म हलुआ अउ तस्मइ खवइयानेता नेता जी मन के कान म ध्वनि-प्रदूसन सुनाबे नइ करे . ये बात हर गन्धर्वराज के यक्ष प्रश्न कस होगे हे . येखर उत्तर कते करा गंवागे हे वोला खोजे बर युधिष्ठर –चित्त चाही . नहीं त यहू प्रश्न अनुत्तरित रहि जहि .’

अपन घर हो –अपन बारी /बंद होही साग के मारामारी
गोबरदास किहिस-‘धान के कीमत उपर सरकार भांजी मार दिस . एक दिसम्बर बहुत दुरिहा हे . का करबोन भाग अपन–अपन . बड़े किसान के बड़े मान अउ बड़े मया हे . हाँ भई ,गोबर बचे ले चार पइसा हाथ म आय के खुशी होथे जरूर जोंन बजार म जाके गंवा जथे . अब अपन बारी ल संवारे बर लगही .’
लालबुझक्कड़ किहिस-‘एसो कोरोनाकाल के देवारी म सरकारी करमचारी, पेंशनर नाखुश दिखिन . सरकार उनकर मांग ल कब मानही? समे बताही . नान–नान धंधा करइया मन कोरोना के सेती शहर –गाँव क्लोज (लाक-डाउन ) अउ ओपन (अनलॉक) ले बहुत दुखी रिहिन . कतको झन के धंधा अइसे बइठिस के उन खड़े नइ हो पावत हें . आजकल अर्थ बिन सब कोरा बकवास हे . मीठ –मीठ बोले ले भस्मासुर भूख नइ मरे .’
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