छत्तीसगढ़ी में पढ़ें - कातिक अगहन महीना के महिमा

धन-धान्य अउ संस्कृति ले भरपुर हे हमर छत्तीसगढ़.
धन-धान्य अउ संस्कृति ले भरपुर हे हमर छत्तीसगढ़.

अभी कातिक के महीना चलत हे. बेटी बहिनी मन फजर (सुबह) ले उठ के तरिया नदिया अस्नान करे बर जाथे. सुरुज देवता उगे के पहिली महादेव के मंदीर मं जाके पूजा पाठ करथे अउ कुंआरी बेटी बहिनी मन मन्नत मांगथे.

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  • Last Updated: November 9, 2020, 4:17 PM IST
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कातिक अगहन के महीना के गजबे महिमा हे. वइसे छत्तीसगढ़ मं अतेक तिहार, परब माने जाथे तेकर कोनो गिनती नइहे. ये दोनों महीना ला लछमी देवी के महीना माने जाथे तेकर सेती पूजा पाठ अउ अराधना मं बेटी बहिनी मं लगे रहिथे. खास कर कुंआरी बेटी बहिनी मन महादेव के पूजा घलो करथे. एक दिन पहिली संझाकुन ओमन फूल टोरथे अउ झपली मं चाउर, बंदन अउ फूल ला रख देथे. बड़े फजर (बिहनिया) उठ जथे अउ घर-घर जाके अपन संगी सहेली मन ला आवाज देके उठाथें. कहिथे, चल बहिनी हो कातिक नहाय ले जाबों-




कातिक आय धरम के महीना
कातिक आय धरम के महीना,
अन-धन के पहचान.
महादेव के भोग सुमरनी,


नोनी मन करथे बिहान.
संझौती फेर सुआ नाच-संग,
देथे सन्देश घरो-घर.
गौरा इसरदेव के जोड़ी कस,
तब उहू मन पाथे वर.
-सुशील भोले



छत्तीसगढ़ धरम-धाम हे. जइसे बद्रीनाथ धाम, ब्रिन्दावन धाम, केदारनाथ धाम, ओती दक्छिन मं चले जा तब बालाजी तिरुपति धाम, रामेश्वर धाम हवय. लगथे जिहां-जिहां भगवान् के चरन परे हे उहां-उहां धाम बन गे हे. बड़े-बड़े मंदीर, देवाला अउ तीरथ धाम होगे हे. एक परकार ले पूरा भारत देव भूमि के रूप मं जाने जाथे. धन हे अइसन देश जिहां सुख, शन्ति, परेम, आनंद अउ सद्भाव के पुरवाही चारो मुड़ा हरर-हरर चलत रहिथे, आनंद मगन होके जनता हंसी-खुसी जीवन गुजरत रहिथे. जउन देश मं गंगा भगवान शंकर के जटा ले निकल के परयाग राज होवत ब्रम्ह्पुत्रा मेर जाके समा जाथे, वइसने गीता के गियान महाभारत के समर भूमि मं भगवान् किसन कनहइया भले ओ बखत अर्जुन ला सुनाइस, ओकर मन के मइल ला मेट के लड़े बर तइयार करिस. ओ गीता के गियान कोनो अलवा-जलवा गियान नोहय ओहर अमरित बानी हे जेला सुने अउ पढ़े ले मनखे अमर हो जथे, मूर्छित होय रहिथे तउन मन जाग जाथे, चेतलग हो जथे. वइसन गीता के गियान अउ गंगा के जल दुनिया मं आज खोजे नइ मिलय, दुरलभ हे चाहे कोनो लाख जतन कर लय.


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अइसन हे हमर महान देश भारत तेकर बेटी हे छत्तीसगढ़. कहिथे नही-जइसन जेकर दाई ददा तेकर तइसन ओकर लरिका. भारत माँ के अनमोल रतन हे छत्तीसगढ़. सप्त ऋषि मन के गढ़, महानदी के कोरा मं पंचकोशी महादेव बिराजे हे. राजिम मं राजिव लोचन भगवान्, चंपारन में बल्लभाचार्य के पावन धाम हे. सिरपुर, तूरतुरिया, रतनपुर मं महामाया के धाम, आरंग नगरी जिहां राजा मोरद्ध्वज जइसे महादानी अपन बेटा ताम्रध्व्ज ला आरा मं ठाड़हे-ठाड़ चीर के दुआरी मं आय महात्मा मन ला देबर तइयार हो जथे, डोंगरगढ़ बमलइ देवी के महिमा अलगे हे.


अइसन धरम-धाम छत्तीसगढ़ ला काकर नजर लग गे रिहिस हे के ओहर बरसों पर के गुलामी मं जिनगी बसर करिस, बड़े-बड़े शैतान, राक्छस अउ डायन के कोनो कमी नइ हे इहां? जिहां सुख, शान्ति, परेम, आनंद, अउ सदभाव रहिथे ओकर ले बढ़ के संपत्ति, धन, दउलत, सोना चांदी, हीरा, जवाहरात अउ कोनो होथे का? जउन रूख-राई करा चील, गिध, कउआ, अउ साँप मन के बसेरा होथे तेन मेर कोनो चिरई-चुरगुन बास नइ करय, अपन बसेरा नइ बनावय. सुख शान्ति, परेम अउ आनंद सब ला चाही, अइसन दउलत के धाम हे छत्तीसगढ़. तेन ला झपटे अउ लुटे खातिर, कब्जियाय बर कउआ, चील, अउ गिद्ध, सियार बघुवा मन कस दुनिया भर के मनखे इहां आके भुलवार चुचकार के, शिकारी मन कस फन्दा मं चारा बगरा के छत्तिसगढ़िया मन ला फंसा डरथे परबुधिया अउ सिधवा जान के अपन बश मं. का जानय परदेसिया मन के चाल ला हमरे घर मं बाइठे अउ हमरे मन ऊपर राज करथे अउ हमन भोकवा बन जाथन. बेर्र्रा अउ बेइमान मन तहां हमी मन ला आँख दिखाथे. फेर अति के घलो अंत होथे.


हमर छत्तीसगढ़ हमला मिलगे हे, ओला नवा गढ़बों, नवा बनाबों. अउ जतका कुकुर, मुसुवा, सियार, चील-गिधिवा मन नोंच-नोंच के खाय हें ओला उछरवाबों, छोड़न नहीं, जाही कहां? छत्तीसगढ़ के अलग संस्कृति हे, लोक साहित्य, लोक कला, लोक नृत्य, तीज तिहार हे, परब हे. बारो महीना इहां तिहार बार होतच रहिथे नाचत अउ गावत रहिथे मगन अउ बिधुन रहिथे. अइसन सुख, शांति, आनंद अउ परेम के गंगा जमुना के धार बोहावत रहिथे. धन-धान्य अउ संस्कृति ले भरपुर हे हमर छत्तीसगढ़. तेला सिनेमा टीवी वाले मन फूहड़ अउ अनफभक बेसुरा चाल-चलन बगरा के मटियामेट करे मं लगे हें ओला बचाना जरूरी हे.


हमर संस्कृति अइसन हे, सुनव, देखव, जानव अउ समझव के हमन कइसन जीथन, रहिथन, का हमर सुभाव संस्कार हे? कोनो फोकट अउ सेती-मेति मं नइ कहि दय छत्तिसगढ़िया सबले बढ़िया. एकर एक ठन सुन्दर नमूना देख लौ. अभी कातिक के महीना चलत हे. बेटी बहिनी मन फजर (सुबह) ले उठ के तरिया नदिया अस्नान करे बर जाथे. सुरुज देवता उगे के पहिली महादेव के मंदीर मं जाके पूजा पाठ करथे अउ कुंआरी बेटी बहिनी मन मन्नत मांगथे, सुन्दर वर मांगथे. कतेक सुघ्घर, पबरित भावना हे, अइसन संस्कार ओकर मन मं गढ़े जथे. इहां के जतका संस्कृति, रीति रिवाज अउ परब हे एमा फूहड़ता अउ गन्दगी के भाव, कोनो मेर देखे नइ मिलय. जिहां सुख शांति अउ परेम हे तिहें तो अन-जन अउ धन परिपूरन रहिथे, दुःख करलेस अउ संताप के कोनो नमो निशान नइ होवय. फेर इही बेटी बहिनी मन संझाकुन घर-घर सुआ नाचे ले जाथे सब ला परेम के सन्देश देथे. अइसन सुघ्घर संस्कृति ला बरबाद करे खातिर छत्तीसगढ़ ला बाजार बनाय के उदीम करइया मन के मुंह ला काला करना हे, तमाचा मारना हे. चेताना हे ओमन ला सोझ बाय राहव नहिते अन्ते तनते करिहौ तब फेर जिहां ले आय हौ तौंने कोती रेंगौ.

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