छत्तीसगढ़ी विशेष: चीजबस घलोक खरकती आ जथे चँवथा पीढ़ी मा

मेंयार, कांड़, कठवा सफ्फो अपन समय के चिन्हा रिहिन आज के दिन ला झांकत होही तइसे लागथे. चल दिही कहिके कोनो ला बिसवास नइ राहय.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 22, 2020, 12:24 AM IST
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केहे गेहे लक्ष्मी चंचला होथे ए बात ला घटत कतको झन अपन जीयत जागत देखे हाँवय. बड़े - बड़े महल, किला, बाड़ा सब्बो एक दिन भर जथें. देखइया मन बर देखनी हो जथे अउ चेतइया मन चेत जांए ता बने बात ए. फेर अइसे का मति हो जथे के बीते समय ला कोनो संकेत मान के आने वाला कल के चिंता नइ करंय. गांव - गांव मा गंउटिया मन के घर दुवार सब भिड़िंग - भाड़ंग होगे. नवबेड़िया कपाट एकंगू ढलगे परे हे. मेंयार, कांड़, कठवा सफ्फो अपन समय के चिन्हा रिहिन आज के दिन ला झांकत होही तइसे लागथे. चल दिही कहिके कोनो ला बिसवास नइ राहय.

सब्बो जिनिस, सब्बो कोती चमचम ले माड़े राहय. नौकर चाकर अपन काम मा मगन राहंय. हरे - खंगे मा मालिक मकान सहायता करे मा कमी नइ करंय. सेवा सटका मा कतको के जिवका चलय. आसरा राहय एक दूसर के. कोनो मेरन दाउ ला जाना हे ते चार झन आगू - पाछू चलंय. देश , काल दुनिया भर के संस्कार, अपन-अपन पहिचान ला बना के राखे बर अलग-अलग चिंतन करंय. सभ्यता के विकास मा देखबे ते लड़ई - झगड़ा करत. मरत हपटत. अपन आप ला श्रेष्ठ साबित करइया कतको आइन अउ कतको गिन. मान मर्दन करके राज गद्दी पवइया आज इतिहास होगें. फोटू टंगाए हे फेर का काम के.

जतका ग्रंथ के निरमान होइस तेन हजारों बरस के तपस्वी मन के फल हरय. जीव के परत ले अउ जीव के हरत ले कोन चालक हे कोनो नइ देखे हें. अउ कतको झन देखे घलोक होही. एमा गवाही साखी के बात बिल्कुल नइ होना चाही. बोली - भाषा के अंबार लगे हे. लिखई - पोछई चलतेच हे. बोलचाल मा भाव - भावना अलग ले दिख जथे. दुनिया के रचना करइया अइसे का नइये कहिके कभू नइ सोंचय. तें सोच अउ जान तोर सोंचे के पहिली सब्बो रचना आगू ले रचाए मिलही. पनपत - पनपत सब्बो जीव - धारी आज अपन श्रेष्ठ कृति के रूप मा दिखाई देवत हे. एक दूसर ऊपर निर्भरता आजो सोला आना सच हे.



बलसाली आजो अपनेच बल मा मतंग हे. ज्ञान के अभी कतका विकास होए हावय तेखर कतको किस्सा सुने मा आथे. जाने - सुने - देखे के आजो चलन हावय. धरती ले उप्पर अकास डाहर निहारत - निहारत अपन कल्पना के विकास मा कतको झन लगे हें. कतको झन ज्ञान ला परोसे बर अपन जिनगी खपा दिन अउ कतको झन आजो नवा - नवा ज्ञान ला खोजत - खोजत किंदरत हें. धरे सकेले राखने वाला मन के दिन ले धरे सकेले राखही अउ आखिर मा उनला का मिलही. सोंच विचार, मन प्रवचन के जमाना आगे हे, तें बइठे भर राह तोर बर सब्बो जनम के बात जनवइया मिल जाही.
अइसे व्यवस्था मा संसार के रचइया जीव - निर्जीव सब्बो ला बांध के राखे हे के का बताए जाए अक्कल नइ पुरय तभो ले अंटिया - अंटिया के बोलने चालने वाला घलोक लगे हे अपन हिसाब मा बनगे नइते नतगे. बनत भर ले सब्बो बने लागथे अउ कहूं बिगड़गे ते जान दे. तरक्की बने बात ए सुख - सुविधा बाढ़य बने बात ए. फेर अलहन झन होवय. अलहन ला जानके घलोक कतको झन अपन जीवन काल मा जीव जगत के दुश्मन हो जथे. उपयोग करे के हिसाब मा सब्बो किसम के समान बने हे. तोर ऊपर हे ते कइसे उपयोग करबे.

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डरभुतहा जीव के सेती सब्बो झन जी परान ले कोसिस मा रइथे के कोनो जानय झन अउ हमर काम हो जवय. चतुर - चलाक ते झन बन. उप्पर कोती देख अउ केवल मन मा सोंच के ओखर आगू मा का हरस तोर बर अतके काफी हे. बिपत परे मा सब्बो छोटे - बड़े कइसे एकमई हो जथें आज के पुकार ए. मिले मांझे रेहेरइबो तभे तो एक - दूसर के बढ़वार होही. चलत -फिरत जीव मा जंजाल झन आवय. प्रकृति के नियम धरम ला देखव आजो रत्ती भर. फरक नइ दिखय. समय मा संचालन के भार कतका काल रिहिस अउ कतका आज होगे हे सोंचव.

सुवारथ के सेती प्रकृति के विनाश करइया मानुष मन के सेती कतका बेर का हो जाही तें जाने नइ पाबे अउ एक दिन अइसे अंधियारी आही के हजारों साल मा अंजोर देखाए बर रद्दा नइ मिलही. समय के कीमत हे, समय कीमती हे , जानव अउ आने वाला समय के कदर करे बर तियार राहव.
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