छत्तीसगढ़ी विशेष: बनी-भुती कर लेतेंव का, केहेंव जी

जांगर - चोट्टा मन के बात हरय. आयता मा रायता मिलगे बस , फेर काहे किंदरत रह गोल्लर असन. उधेनत हे छाबे मूंदे ला.
जांगर - चोट्टा मन के बात हरय. आयता मा रायता मिलगे बस , फेर काहे किंदरत रह गोल्लर असन. उधेनत हे छाबे मूंदे ला.

जांगर - चोट्टा मन के बात हरय. आयता मा रायता मिलगे बस , फेर काहे किंदरत रह गोल्लर असन. उधेनत हे छाबे मूंदे ला.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 21, 2020, 11:03 PM IST
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ब नारी परानी भला कतका झेल ला सइही? खिसियाए सकय नहीं. भितरे-भीतर चुरत रइथे. दू-चार दिन के बात होतिस तेला कोनो सइही लेतिस. सरी दिन बर काकर सेती कोन सहत रइही? एको दिन मौका - बेमौका कहूं रांधे गढ़े मा ऊंच-नीच होगे त जान दे काहत हे. हकाहक देवई ला भला कतका सहिबे अइसे कहिके मन हा घलोक ओ दिन असकटागे. अइसन हेच घटना अबड़ सुनई मा आथे. ए घटना हा घटना नोहय. नकरमरजी नोहय. जांगर - चोट्टा मन के बात हरय. आयता मा रायता मिलगे बस, फेर काहे किंदरत रह गोल्लर असन. उधेनत हे छाबे मूंदे ला. काम के कोनो कमी नइये. समाज मा नशा पत्ती, जुआ चित्ती भरमार होगे हे. झोझो परगे. झपाए ऊपर झपावत हें, का करलिही कोनो अइसे सोच होगे हे. देखते ते कोनो गियानी असन बघारत रइही. गोठ बात ला झुकन नइ देवय. नवा - नवा, रंग-रंग के बात कोनो ला सुनना हे ते ओधा मा खड़ा होके सुन सकत हे.


अलालमन के घलोक गली मोहल्ला मा ठीहा बनगे. शहर होवय के गांव कोनो जगा नइ बांचे हे. रात - रात भर गिंजरई. उदाबादी करई अउ दिनभर सुतई ए काय हे भला? दिन बुड़ती अलालखोर के मांदी परथे. बने खा - पीके अटिंयावत दू-चार पइसा कोनो कमा के लाए हे तेमा भांजी मारना अउ निकल जाना. चोर पुलिस के खेल ला आए दिन सुनत रइथन. वोहुमन भला काय करंय. चोरहामन के दस रद्दा. तें देती जावत हस वोमन दोती हांवय. फेर हां के दिन ले बांचबे एको दिन तो सपड़ मा आबेच. सपड़ाए तहां तोर औकात का ए पता चल जाही. अरे अलाल हो चेत जावव रे. अभी कांही नइ बिगड़े हे. बने मनखे मन के संगति मा आवव. मंदिर देवाला, पूजा पाठ के कतको ठिकाना सबो समाज मा हावे. सुन्ना - सुन्ना झन राहय. महिला नारी जाति मन कतका दिन खटाही. सब्बो जगा उही मन दिखथें. पूजा-पाठ अउ उपास काखर बर करथे ते नइ जान सकस का.


कई झन अपन घर परिवार मा कतक अच्छा से निभाव करथें. दू-चार दिन बर हरे. फेर अपन अगुवाके बाना ला थाम्ह झन. परवारिक रहिबे त समाज मा घलोक पूछ परख रइथे. सब्बो जगा जाके देख दुनिया मा कतका का होवत हे. कहां ले कहां पहुंचगे संसार. चांउर, कोदई के चिंता नइये, उपराहा काय लागही तेला सोंच. देखा सिखी ही सही अपन हाथ मा चार पइसा कइसे आवय अइसे कहिके चलना परही. गांव देहात मा अप्पड़ मन पहिली अपन परिवार बर सोंचय. कांही कुछु सकेले धरे के गोठ बात चलते राहय. अलवा-जलवा, भाजी-पाली करके कतको दिन ला निकाल के काली के चिंता करंय. अब पढ़े - लिखे बाबू - नोनी जमाना के साथ चलना चाहत हें. अक्कल जतका पुरथे वोतका अपन काम मा लगे के सोंच बाढ़त हे. काम खोजे बर अकेल्ला जाए के हिम्मत पढ़े लिखे मा बाढ़थे. फेर सावचेत घलोक रहना चाही। शोषण के जमाना आगे हे अइसे सुनई मा आवत रइथे.


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हम मन ला करना हे. अपन काम मा उस्ताद रइथे तेन मन के शोषण कोनो नइ कर सकंय. बिन फोकट के बात मा मजा लेवइया ले दूरिहा रहना चाही. आठो काल बारो महिना कतक सुघ्घर बांटे हे भगवान. चरदिनिया नइ राहय ओकर रचे संसार हा. सब ला अपन-अपन जगा मा व्यवस्थित राखे हे. ते कांही करले ओकर काम अपन समय मा होकेच रइही. उपजाए खाए के जिम्मा तोर हे. तोला का चाही मन लगाके धरे सकेले रा बस. समय आगे काम मा लग अउ फेर समय बताही ले अराम कर सुख - दुख मा , रोग राई मा घलोक मन मा विसराम राख. हड़बड़-हड़बड़ करबे ते नइ बनय. अपन खेती अपन सेती अउ सुख दुख काकर सेती जीव धरे हस त सब्बो किसम के अड़चन ला घलोक बने चतवारत चल.

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