छत्‍तीसगढ़ी विशेष: खुलइय्या हे राजनीति के पहिली पाठशाला

कतको लइका मन के संघर्स के सुबह नइ होय. काली के टूरा आज के सियान होथें. जेखर सपना-बुलंद होथे ओखर किस्मत घलो बुलंद होथे. कोनो अपन किस्मत के धार म खुदे घिसा जथे. सपना के टूट-फूट चलते रहिथे.

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  • Last Updated: January 8, 2021, 1:42 PM IST
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बरीलाल सोचत हे कइसे कोनो चुटकी बजात बड़े आदमी हो जथें. कतको झन अपन सपना के सीढिया म चढ़त-उतरत थक जथें, तब जाके दार-भात ले-दे के चूरथे. मिहनत-मजूरी करत कनिहा टूटथे अउ  जोड़-घटाव शून्य रहिथे. इही जोड़-घटाव म कुकुर कटाएँन होथे परान घलो छूट जथे. अब अइसना म कोनो सपना कइसे देखे, कोनो अपने–अपन बड़हर हो जथें. पुरखौती धन-दोगानी काम आथे. ठेलहा रही के घलो मुसुर-मुसुर खावत राह. एक दिन एक झन आदमी किहिस’अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, सबके दाता राम’. नेता मन ल कुरसी के दरकार हे तहाँ ले अब सबके दाता सरकार हे. डांड़ रे, डांड़ गरीबी के डांड़ (गरीबी के रेखा) हमर भारतीय राजनीति के सब ले बड़े आविष्कार आय. खबरीलाल के दिमाग म सपना के इन्द्रधनुषी रंग अउ तरह-तरह के विचार दंड-बइठक करत रिहिस.

सपना के बीजा बोते साठ होगें मुंगेरीलाल

जब लालबुझक्कड़ अइस त ओखर धियान टूटिस. अउ पूछिस-खबरी भाई तें ह कते दुनिया म हस? खबरीलाल मितान ल बइठारिस फेर किहिस-सपना के दुनिया म भटकत हों गा. सपना के दुनिया म बड़ आनंद हे. अपन दुःख, पीरा ल भूला बस सपना देख. सपना देखे बर अउ सपना देखाय बर कोनो रोक-टोक नइ हे. सपना देखत-देखत कतको झन  मुंगेरीलाल होगें. बड़े बने बर सब सपना देखथें. कखरो सपना साकार होथे त कखरो निराकार रही जथे. सपना के बीजा त बोएच बर लागथे न, बिना बीजा के फर कहाँ लागही. बहुत सोच समझ के सपना बोए जथे. लकर-धकर म बने बुनाय बुता बिगड़ जथे. जइसे नेव होही वइसने घर बनथे. नहीं त मिहनत अकारथ हो जथे. जेखर जइसे घर दुआर ओखर वइसने लच्छन होथे.
हर सपना निछावर

लालबुझक्कड़ किहिस-सपना बोए बर सावधानी जरूरी हे. कोनो खूब मिहनत करके अपन सपना ल सच करथें. जोंन किस्मत के धनी होथें उन सपना देखे बिना मालामाल होथें. हाई-जम्प, लांग-जम्प के अपन महत्व हे. कोनो रिले-रेस, त कोनो कुश्ती लड़े कस उठा-पटक करके बड़े आदमी बनथें. सपना सच करे बर दांव-पेंच मारे बर लागथे. किस्सा-कहनी सबके संग होथे. पैदाइसी बड़हर घलो होथे. उन ल देख के लागथे के किस्मत घलो कोनो चीज हे. करम-योग ले किस्मत-योग जादा गरू होथे. नहीं त गोबरे थोपत-थोपत नोंनी जवान ले सियान हो जथे. कतको लइका मन के संघर्स के सुबह नइ होय. काली के टूरा आज के सियान होथें. जेखर सपना-बुलंद होथे ओखर किस्मत घलो बुलंद होथे. कोनो अपन किस्मत के धार म खुदे घिसा जथे. सपना के टूट-फूट चलते रहिथे. हमर लोकतंत्र म भाग्यवादी राजनीति जादा हे. पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीति करत राजा साहेब कस उन जीथें. कतको आदमी दूसर के सपना ल साकार करे बर पीढ़ी दर पीढ़ी खप जथें. केवल छप्पन भोग करइया मन रंग-रंग के गोठियाथें. वुहें दुसर अपन हर सपना ल ओखर मन उपर निछावर कर देथें. कोनो सपना के बोझा म जीथें त कोनो सपना उपर खुदे बोझा होथें.

आजकल बेरोजगारी के मारे कतको लइका मन नेता हो जथें. चांस मिलिस त सिकन्दर नहिं त दरी बिछावत, उरसावत, ताली बजावत उमर पहा जथे. जल्दी चांस मिले ले नेतागिरी के जाब म बड़ बरक्कत होथे. नेतागिरी के पांत ल बने धरे बर लागथे तहाँ ले सब समस्या हल हो जथे.

सियासत के पाठशाला



खबरीलाल किहिस खबर हे के अब नेता बने के सपना ल साकार करे बर ‘सियासत के पाठशाला’ दिल्ली म खुलइया हे. ये पाठशाला म नेतागिरी के गुर सीखाय जहि. जनता-जनार्दन के दिल कइसे जीतना चाही एखर कौशल म निपून हो के नेता मैदान म उतरहिं. जवान मन ल ‘सियासत के पाठशाला’ पढ़ा-लिखा के ईमानदार-राजनीति के घुट्टी पियाहिं. चुनाव म मैदान कइसे मारना ये कला अउ ओखर दांव-पेंच एमा शामिल रही. इंडियन स्कूल आफ डेमोक्रेसी(लोकतंत्र के भारतीय स्कूल) आधुनिक राजनीति के पहला स्कूल होही. दलगत राजनीति ले अलग हर विचारधारा वाले 50 युवा नौ महीना प्रशिक्षण लेहीं. विभिन्न राजनीतिक दल के नेता मन ल व्याख्यान दे बर बलाय जहि. जाहि हे के जे नेताजी मन राजनीति के विद्यार्थी ले मास्टर होगे हें. उन सिखाहीं के राजनीति म पेंच कइसे लड़ाय जथे. पतंग काटे के मंजा म कतेक धार जरूरी हे. कक्षा छह महीना बाद शुरू होही.

बड़े होय के दिन बादर

गोबरदास किहिस- सब बढिया हे. एक अरब पैंतीस करोड़ के आबादी वाले देश म एक ठन सियासत के पाठशाला खुलीगे त ओखर ले का भारत म सतजुग आ जही? खैर, ‘नहीं ममा ले कनवा ममा ल भले जान’ लेव. खूब दंदियावत हे, कोनो जगा ले जुड़ हवा त बहे. कुछ तो नवा हो. एखर ले राजनीति के मामूली कार्यकर्ता घलो राजगद्दी के सपना देख सकत हे. हर छोटे मनखे ल कुरसी के सपना मोह सकत हे. हर आँखी के अलग-अलग सपना होथे. अतेक बड़े देश म सपनाच ह सार हे. सपना देखना अउ सपना देखाना दुनों म राजनीतिक कला हे. उन सपना देखाथें, हम सपना देखथन.

खबरीलाल किहिस-कभू-कभू सपना मनखे ल उछाल देथे. उसने जइसे चीत-पट के सिक्का. सपना के  उड़नखटोला म सैर के मजा जेला आथे वुही त बड़े, अउ बड़े आदमी होथे. नेतागिरी के लाइन म समाज-सेवा के आड़ होथे. ये आड़ म देखते-देखते आदमी के महान बने के गुड़-चांस होथे. राजनीति म आम कार्यकर्ता महत्वपूर्ण होथे. ओला ख़ास बने म बहुत समे लगथे. कखरो-कखरो के त पूरा उमर पहा जथे ओखर आगू बढ़े के आस खतम हो जथे. जेन राजनेता मन ल राजनीति म बड़े गेम खेलना होथे तेंन आम कार्यकर्ता ल ख़ास मानथें. ख़ास के आसपास भविष्य के विसवास होथे. अपन क्षेत्र के हर आदमी के परवाह वोला होथे. एखरे सेती अइसन नेता मन ल दशकों तक चुन-चुन के लोकसभा-विधानसभा भेजथे.

कउड़ी के न काम के, फोकट म नाम के

 शेखचिल्ली किहिस-वइसे आजकल एक बात कहे जथे के जेन कुछु नइ बन पांय उन नेता जरूर बन जथें. जनता के भाग (भाग्य) लिखे के योग्य हो जथें. पहिली कहे जाय के जोंन कुछु नइ बन पइंन गुरूजी बन जथें. अब त गुरूजी बनना खुद गुरूजी के लइका बर कठिन होगे हे. बरोजगारी सुरसा कस बाढ़त हे. अइसं म नेतागिरी सही होगे हे. फेर दुरिहा के ढोल जब बाजथे तब कान ल बड़ सुघ्घर लागथे. आजकल त हर लाइन म कोरी-कोरी हर वेराइटी के नेता मिलथें. फेर जादातर नेता मन होथें कउड़ी के न काम के, बस फोकट म नाम के.

आदर्शवाद के हवा गरेर

आजकल राजनीतिक विचारधारा अतेक मिन्झरागे हे के ये पारटी होय, चाहे वो पारटी नाम अलग-अलग होथे अउ आख़िरी म रंग एके होथे. ‘कुरसी’. ले बढ़ के कोनो जिनिस नइ होय. एमा सबे गुन-अवगुन हे सार बात इही हे के कुरसी सपनामय होथे. एमा पावर के अनंत महिमा हे. एखर बिन सब आदर्शवाद के हवा गरेर आय. कुरसी त हर सुंदर सपना ल साकार कर सकथे. (यह लेखक के न‍िजी विचार हैं)
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