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छत्तीसगढ़ी कहिनी- डोकरी दाई के मया

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फेंकू महराज के रंग –रंग के गोठ ल गाँव के मनखे मन सुन-सुन के दंग रहि जथे. नानपन के लइकई बुद्धि म लइका-लइका झगरा होइंन त ये हुशियार हीरो बने बर बंबई (मुंबई) भाग गे. भारी खोजबीन होइस त पांच साल के बाद कलकत्ता के बजार म मिलिस. ओखर दाई-ददा मन निच्चट सिधवा मनखे रिहिन. न खेत, न खार, रोजे कमाना, रोजे खाना राहय. दुनो झन सरगवासी होगें.

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चिपकूदास अभी आवत हों कहि के जिहाँ जाथे उहें चटक जथे. अउ ऊँहेंच के पूरती हो जथे. दाई हुकुम करिस- ‘जा त रे बजार ले रांधे के तेल लान दे. दु दिन होगे बिना तेल के उसना साग खावत-खावत जी बिट्टागे हे’. सास के बात ल सुन के बहुरिया मुसमुसा के हाँसिस. ओखर बेटा घलो अपन महतारी के बात ल सुन के हाँस परिस. चिपकूदास झट खड़े होइस. किहिस- ‘दाई लुगा के छोर म पांच सौ के नोट बंधाय हे. ओला झटकून छोर. अभी तेल लानत हंव. दाई किहिस-रोगहा, तोर ददा ल मांग. मोर अंचरा म काबर माई-पिल्ला अपन नजर गड़ियाय हो रे ? चटकूदास ल दाई के बात वाजिब लगिस. फेर ओखर ददा ह वोला बला के तेल लाने बर रूपिया दिस. चिपकूदास घर ले निकलत रिहिस तभे ओखर दाई चेतइस. ‘सीधा कलुआ के दूकान म जाबे अउ एक किलो सोयाबीन तेल लानबे. कोनो मिलही त ओखर संग चटक झन जबे. तोर महतारी ह साग रांधत हे. कढ़इया म साग भूंजावत हे. बघारे बर लागही तेल जल्दी लान’. चिपकू बेटा अपन मुड़ ल हलावत घर ले निकलिस.

फेंकू महराज के फेंकई

रद्दा म ओला फेंकू महराज मिलगे. ओहा चिपकू संग गोठियाना शुरू करिस. गोठियावत अउ मुड़ हलावत चिपकू दु घंटा ले जादा गपिया डरींन. चिपकू ल फेर सुरता अइस अरे ! मोला त तेल लेगे बर हे. मेंहा फेर चटकगेंव., चिपकू फेंकू महराज से पिंड छोड़ाइस. कलुआ के दूकान अइस. अउ पल्ला घर के रद्दा ल धरिस. ठऊँका डेहरी म दाई ह लउठी धरे बइठे मिलिस. चिपकू ल आते देख के घायल नागिन कस फूसफूसइस. तोर अभी आय के बेरा होइस हे रे?

दाई के मया म

चिपकू किहिस-का बतावं डोकरी दाई-एक ठन बड़े गोल्लर हे न, ओहा मोला छेंक ले रिहिस. डोकरी दाई किहिस- ‘तोला अउ कोनो बहाना बनात नइ बनिस रे ? जा तोर ददा ह तोला बजाय बिन नइ छोड़े’. चिपकू हाथ जोर से किहिस-‘दाई, तेंहा त जानत हस ओ गोल्लर मरखंडा हे न ? जेखर उप्पर भड़कगे तेखर खटिया खड़े कर देथे. कतको झन टूरा मन गोल्लर ल छांदे-बांधे बर भिड़े रिहिन ओला देखत-लोगन मन के भीड़ लग गे. गोल्लर ह बगिया गेहे. थिराय नइ हे. आठ-दस झन ओला नाथे के उदिम करत हें. मोला भागे बर जगा मिलिस त मेंहा पल्ला भागत आय हंव. डोकरी दाई ल टूरा उपर दया आगे. ओहा अपन पोता के हाथ ल धर के घर के भीतरी डाहर लेगिस, काबर के ओखर ददा हर घलो टूरा उपर घुसियाय राहय. घर म टूरा चिपकू अपन डोकरी दाई के बल पागे. ओखर डोकरी दाई अपन बेटा ल किहिस एला मारबे पिटबे झन रे!. बस्ती म गोल्लर बगियाय हे. टूरा ह अपन परान बचा के अइस हे. टूरा के ददा किहिस दाई आजकल ये टूरा ह बुता कम करथे अउ बहाना जादा बनाथे. तेंहा ओला अपन मुड़ म चढ़ाय हस. दाई किहिस-‘मोर एक झन त पोता हे रे !. तेंहा ओखरो पाछू परे रहिथस. ये ह बने बात नोहे बेटा. अभी गोल्लर ले अपन परान बचावत अइस हे. तेंहा खुद जा के देख ले. बस्ती के मन जतर–कतर भागत-दउड़त हें. दाई के बात ल सुन के टूरा के ददा ह गुस्सा थूक के कलेचुप होइस. चिपकू तेल ल अपन महतारी के हवाले कर दिस. मामला शांत होगे. साग बघारते साठ सब झन सरलग खाय बर बइठगें.

मूलधन अउ बियाज

कहावत हे के ‘मूलधन ले बियाज जादा पियारा होथे’ ये घर म इही कहावत सार्थक होवत हे. चिटकू अपन डोकरी दाई के आज्ञाकारी पोता आय भले वोला गारी गुफ्तार करत रहिथे फेर ओखर बर गाड़ा-गाड़ा मया करथे. चिटकू के दु झन बड़े बहिनी मन अपन-अपन ससुरार चल दिन. ऊँकर बड़े-बड़े घर दुआर अउ खेती-खार हे. घर म नौकर-चाकर झुलत रहिथें. तीजा-पोरा बर बहिनी मन सकलाथें. अभी उन अपन–अपन दुनिया म मस्त हें.

खाय-पिए बरोबर

चिटकू अपन घर के दिया-बाती, अउ सूरज चन्दा आय. परवार साधारण हे. खाय-पिए बरोबर. न जमा, न लेना, न कोनो ल देना. घर के मुखिया बिरझू फूंक-फूंक के कदम रखथे. गाँव म लोंन ले के शेखी मरइया मन के कमी नइ हे. बिरझू करजा-बोड़ी ले खूब घबराथे. चार आखर नइ पढ़े हे. फेर गढ़े मनखे आय. ओखर घरू अर्थशास्त्र जोरदरहा हे. कर्जा ल बिख बरोबर जानथे. .झूक्खा चटनी भात/बासी पसंद हे फेर करजा संउहत ओखर बैरी आय. चिटकू के दाई घलो पति के रद्दा म चलइया आय. नून-मिरी संग खा लिहीं फेर कखरो घर मांगे-जांचे बर जाना ओखर मन के सुभाव म नइ हे. छोटे परवार हे. सब मिलजुल के मिहनत मजूरी करथें. न कखरो तीन म राहें न पांच में.

फोकटिया महराज

चिटकू ह सिधवा मनखे के सिधवा लइका आय बपुरा. जब-तब फोकटिया महराज के चकरी म फंस जथे. ओखर किस्सा-कहिनी सुने बर हुँकारू देवइया कोनो नइ मिली त चिट्कुच सही. गाँव के मन फोकटिया महराज ल देख के दूरिहा छटकथें. कतको झन दुरिहा ले राम-राम कहि के छटक जथें. जिनगी भर बिना बुता म बिजी रहवइया अउ रोटी टोरवइया मन म फोकटिया महराज सब ले अव्वल हे. ओखर असली नाव के कोनो अता-पता नइ हे. बाते-बात म मनखे मन ले रूपिया अइंठे के कला ओला आथे. मूंदरहा ले तिलक चन्दन लगा के घर ले निकलथे अउ संझा जुआर लहुटथे. गप्प मारे म ओखर ले चतुरा मनखे एतराब म कोनो मिलना मुशकुल हे. रेती ल रमंज के घी निकाले बर ओला आथे. बिरझू अपन टूरा ल ओखर संग बइठे हुंकारू भरत देखथे त रोसिया जथे.एक झन टूरा अउ वुहू बेलाईन हो जही त का कर लेबे सिवाय करम ठठाय के. एखर सेती बिरझू अउ ओखर डोकरी दाई अपन हेरा कस लइका के पूरा धियान रखथें.जंगल डोंगरी के गाँव आय गिनती के मनखे हें. कभू-कभू आवत-जावत लवछरहा सपेड़ पारथें.

फोकट के शेखी

चटकू के अभी उमरे का होय हे बारा बरस के हे. महराज ह बने लइका मन ल घलो बिगाड़े म कोनो कसर नइ छोड़े. कखरो तिर ले बीड़ी मंगवाथे त कखरो तिर माखुर. इही नहीं अउ येती- वोती के किस्सा कहनी म नान-नान लइका मन ल हुँकारू भरवावत रहिथे. भूत परेत के कहनी सुना-सुना के लइका मन ल डरपोकना बना देथे. लइका मन ल बरगलाथे कहिथे स्कूल जा के का करहू. पढ़हूँ तभो बइला बनहू, नइ पढ़हूँ तभो बइला रहू. कतको टूरा मन ओखर बात त सुन के कुड़कुड़ाना शुरू कर देथें. अउ ओखर मुहूँ म कथें ‘पढ़बो ,लिखबो तभे त आगू बढ़बो. अउ सबे लइका स्कूल भाग जथें. फेंकू महराज अपन आप ल गाँव के कोनो महराजा ले कमती नइ समझे. बस्ती अउ पास पड़ोस के मनखे मन ल आपस म बने बनत नइ देख सके. दिमाग के चाल-चलके उन ल आपस म झगरा करवा देथे. जइसे कोबरा के काटे के बचना मुस्कुल होथे.

एके अंगेठा

वइसने फेंकू महराज के डसे मनखे के कछेरी-अदालत के चकरी ले नइ बचपाय. गाँव के पंच परमेश्वर मन जेखर खाथें उनकर गाथें. एखर सेती कतको मनखे धीरे से राम-राम कहिके दबे गोड़ अपन रद्दा धर लेथें. ओखर जबान कैंची ले जादा तेज चलथे. कतको झन कहिथें के ओखर टोक पक्का लग जथे. चटकू के डोकरी दाई अपन पोता ल ओखर चकरी ले बचा के रखथे तभो ले लइका जात ताय फंस जथें. झट ओखर डोकरी दाई परगट हो ज थे. अउ चेचकारत ओला घर लेग जथे. फेंकू महराज के रंग –रंग के गोठ ल गाँव के मनखे मन सुन-सुन के दंग रहि जथे. नानपन के लइकई बुद्धि म लइका-लइका झगरा होइंन त ये हुशियार हीरो बने बर बंबई (मुंबई) भाग गे. भारी खोजबीन होइस त पांच साल के बाद कलकत्ता के बजार म मिलिस. ओखर दाई-ददा मन निच्चट सिधवा मनखे रिहिन. न खेत, न खार, रोजे कमाना, रोजे खाना राहय. दुनो झन सरगवासी होगें. अपन कका के आसरा म ये फेंकू महराज परे रिहिस. कुछ बरस बाद ओखर कका घलो बीमार परिस त उठबे नइ करिस. ओखर एको सन्तान नई रिहिस. बाई अपन मइके म जा बइठिस. बड़हर घर के बेटी उंच-नीच नइ झेल पइस. झट मइके गिस त आबे नइ करिस. फेंकू महराज अकेल्ला एके अंगेठा रहिगे. न बर न बिहाव. न कोनो लइका न पिचका जइसे-तइसे ओखर दिन पहावत हे.

(शत्रुघन सिंह राजपूत छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकार हैं. आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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