छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: लीपे पोते बर अलग रंग के माटी बउरथे छत्तीसगढ़नीन माइलोगिन

छत्तीसगढ़ी में पढ़ें
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मनखे के मन चंचल होथे. ओहा अपन आज के जिनगी ले संतोष नइ पावय अउ आगू के सोचथे. घर सिंगारे मा छत्तीसगढ़नीन माइलोगिन हा दू रंग मा नइ रुकिस. ओला पींयर रंग के माटी मिलगे. एला पींवरी छुही कहे लगिन. यहू ला पानी मा घोर के भिथिया मा भुँइया ले आधा हाथ उपर घर के सबो दिवाल मा खुटियाय लगिस.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 12, 2020, 9:56 PM IST
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आज शहर के नकल करत गाँव के मनखे अपन घर ला दूमंजिला तीनमंजिला बनात हवे. ओला सिंगारे बर नाना किसम के रंग, पेंट, पालिस लगावत हवे. फेर गांव मा एक बखत यहू रहिस कि मनखे हा डारा पाना के घर ला छोड़ जब माटी के घर कुरिया बनाइस. तब ओला सिंगारे बर नवा नवा उदीम घलो करिस. शास्त्र मा ए नरतन ला माटी के चोला कहे गे हावे. मनखे हा जिनगी के संग मा अपन रहे बसे, राँधे खाय, पहिरे ओढ़े के सबो जिनिस ला सुग्घर बनाय के उदीम आदिकाल ले करत आवत हे. सतजुग, त्रेता अउ द्वापर मा विश्वकर्मा हा देवता मन के घर, महल बनावय। कलजुग मा बनिहार, कारीगर, बढ़ई मन घर कुरिया बनाथे. गाँव मा डारा पाना लकड़ी अउ माटी ला संघेर के मनखे हा अपन रहे बसे के ठिहा, डेरा बनाथे. पहिली के घर मन डारा पाना के रहय. पाछू ओमा माटी ला संघेरिस अउ माटी के घर बनाइस. उपर छानी मा डारा पाना काँदी ला छाय रहय. फेर पाछू माटी के घर मा खपरा छानी बनिस. अपन घर कुरिया के तीर तार ला चतवारे अउ सुग्घर बनाय के उदीम करिस. एमा ओखर लिपई पोतई मिंझरे हवय.

छत्तीसगढ़ हा गरीब क्षेत्र रहिस. गरीबी मा जिनगी बितइया मनखे हा अपन मन के उछाह ला कमती नइ कर सके.  गुड़, शक्कर नइ मिले ले महुआ ला डार के मीठ करे जाथे. बिना पइसा कौड़ी के रंग चोखा करे के हुनर छत्तीसगढ़नीन माइलोगिन मेर संइते रथे. इही कला मा अपन घर ला सुग्घर बनाय के उदीम घलो हवय. छत्तीसगढ़ के गाँव के मनखे जौन जंगल क्षेत्र होय चाहे चातर राज मा रहिथे ओमन अपन घर के आगू मा अँगना अउ पाछू मा बारी बखरी खच्चित राखथे. घर के अँगना ला बरसात के जाय पाछू चतवार, बहार बटोर के गोबर मा लीप के सुग्घर बनाथे. छत्तीसगढ़ मा अपन अँगना ला रोज गोबर पानी के छरा छींटा देय के परंपरा घलो चले आवत हे. पूजा पाठ अउ तिहार के दिन तो खच्चित लीपे जाथे.

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छत्तीसगढ़नीन मन अपन माटी के घर कुरिया ला सुग्घर बनाय अउ लीपे पोते बर घलो माटी ला बउरत आवत हे फेर ये माटी के रंग अलग अलग होथे. पहिली जब माटी के घर बनाइस तब भिथिया ला धान कोदो पैरा के पेरौसी मिला के छाबिन पाछू चिकनाय बर बरन माटी ला बउरिस. बरन मानी मा थोकिन गोबर मिलाय के भिथिया ला लीपे मा चटके दर्रा मन मुँदा जथे अउ पलस्तर करे बरोबर सुग्घर चिक्कन दिखथे. फेर मनखे के मन अतका मा नइ थिराइस. ओहा सफेद माटी पाइस जेला छुही कहे जाथे, ओला उही चिकनाय बरंडे भिथिया मा सबो डहर भीतरी बहिरी दिवाल मा पोतिस. अब ओखर घर हा सुग्घर के संगे संग उजास दिखे लगिस. कुरिया के भीतरी के भुँइया ला घलो पेरौसी डार के बरन माटी मा गोबर मिंझार के बरण्ड दिस. उही ला अब चारो डहर पानी पोतना मा लीप दिस. घर लिपनी के पोतनी ला चूल्हा, कनौजी, कराही मा बइठे करिया धुंगिया ला चूपर के लीपे लगिस. पाछू कुछू पाना पतई ला बार के करिया बना के भीतिरी बहिरी कुरिया के भुँइया अउ अँगना तीर बइठे के चाँवरा ला लीपे लगिन. अब घर दू रंग के होगे. उपर सादा अउ खाल्हे हा करिया। घर सुग्घर दिखे लगिस.
मनखे के मन चंचल होथे. ओहा अपन आज के जिनगी ले संतोष नइ पावय अउ आगू के सोचथे. घर सिंगारे मा छत्तीसगढ़नीन माइलोगिन हा दू रंग मा नइ रुकिस. ओला पींयर रंग के माटी मिलगे. एला पींवरी छुही कहे लगिन. यहू ला पानी मा घोर के भिथिया मा भुँइया ले आधा हाथ उपर घर के सबो दिवाल मा खुटियाय लगिस. जौन दिवाल मा बइठे बर चाँवरा बने रहिस ओखर ऊपर ला खुटिया दिन. अब घर तीन रंग होगे. एखर पाछू मुरमहा जगा मा मुरुममाटी के लाली रंग ला घलो लीपे बर बउरे लगिन. मुरुम ला पानी मा घोर के छान के पोतनी मा सादा छुही के उपर लीपे जाथे. जीहां पींवरी छुही नइ मिलय उहाँ इही मुरुम के लाल रंग ला ओखर जगा मा लीपे जाथे. जिहाँ पींवरी छुही घलो रहिथे उहाँ लाल रंग ला दिवाल मा छानी छुए भिथिया ले एक हाथ खाल्हे तक ओरमा के घर के बाहिर के दिवाल ला लीपे अउ सिंगारे जाथे. छानी के लाली खपरा अउ ओखर खाल्हे मा लाल रंग , ओखर खाल्हे या सादा, ओखर खाल्हे पींवरी अउ सबले खाल्हे मा करिया रंग मा लिपाय चाँवरा अउ भुँइया. इही घर हा छत्तीसगढ़िया घर कुरिया के चिन्हारी बनगे.
फेर अब गच्छी वाला घर अउ टाइल वाला बंगला बनत हे. नाउकरी वाला होगे,पइसा कौड़ी आगे. माइलोगिन सुखियार होगे. बड़हर मनबर लीपे पोते के नवा नवा जिनीस आ गे हावे. नाना रिकिम के रंग बनत हे. चिकन करे बर पुट्टी होवत हे. तब लीपे पोते के जुन्ना परंपरा ले मनखे बिसरावत हवय. फेर गरीब छत्तीसगढ़नीन हा छुही माटी करके अपन घर मा आज घलो उजास भरत हे अउ अपन मन मा उछाह भरत हे.
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