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बस्तर : समलूर मं दीयारी के अलगे अंदाज

बस्तर : समलूर मं दीयारी के अलगे अंदाज

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आनंद, खुशी, सुख, शांति, परेम, संतोष अउ सहकार के नांव हे दीयारी याने दीवाली.ये परब, तिहार ला तो सबो भारतवासी बहुत उछाह से मनाथे फेर बस्तर के दंतेवाड़ा जिला के समलूर गांव के आदिवासी जउन तरीका ले मनाथे त उन हा सबले हटके अलग अउ निराला हे.गांव वाले सब मिलके तपेश्वरी देवी के मंदिर मं दीया धर के जाथे.मंदिर जंगल मं परथे.हर घर ले एक-एक दीया जलाना अनिवार्य हे, अइसे विधान हे.

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वइसे छत्तीसगढ़ मं बस्तर इलाका एक इसे जघा हे जिहां बारहों महीना कोनो न कोनो तिहार आदिवासी मन मनाते रहिथे.कोनो दिन, कोनो पखवाड़ा अउ कोनो महीना अइसे खाली नइ जात होही जिहां तिहार, परब नइ होवत होही, खुशी नइ मनावत होही, नइ नाचत-कूदत होही.दूसर अरथ मं इही केहे जाय के बस्तर तिहारीं वाला इलाका हे.घर-घर मं, गांव-गांव मं तिहार, परब के रसम-रिवाज गूंजते रहिथे.लइका, जवान, सियान अउ बुढ़वा-बुढिय़ा, आदिवासी मन किसम-किसम के परिधान पहिरे अपन कला, संस्कृति के संदेश, देश-दुनिया ला देवत रहिथे.इहां के परब, तिहार ओ उत्सव अउ खुशी के रूप मं झलकथे, जउन देखते बनथे.दूसर जघा अइसन कोनो परकार के उत्सव, परब, अउ तिहार देखे ले नइ मिलय जइसन बस्तर मं मिलथे.

बाहिरी दुनिया ले दूर एकर मन के ये संस्कृित एक मिसाल हे, जउन कोनो जघा नइ मिलय ओ इहां मिलथे.खुशी, आनंद, अउ परेम के झोरफा संगम जौंन देखना हे अइसन मन बस्तर के यातरा करयं.इहां के लोगन मन ला देख के, ओकर मन के कला, संस्कृति, परब अउ तिहार ला देख के सब अकबका जही, अउ कइही के अइसने लोग होथे, कला, संस्कृति अउ तिहार होथे.अभी तक तो ओमन होली, हरेली, देवारी अइसने गिने-चुने तिहार देखे हे.यहां का बारहों महीना तिहार, खुशी मं नाचत-कूदत आदिवासी सपरिवार देख ले.

खुशी बिसाय मं नइ मिलय, जउन मिलथे, तउन नकली खुशी हे.नकली खुशी के नशा बिहनिया चढ़थे, अउ संझाकिन उतर जथे, फेर आदिवासी मन के तिहार के खुशी के अइसे नशा चढ़थे के उतरे के नाम नइ लेवय.ये कोन से खुशी जेकर नशा कभू नइ उतरय? एकर मन के ओ नशा हे परेम के नशा.ओमन देवी-देवता से परेम करथे, प्रकृति से परेम करथे, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी अउ एक-दूसर से परेम करथे.नफरत, घिरना, इरसा का चीज होथे, नइ जानय.मनखे ला मनखे समझथे.देवी-देवता समान समझथे.बस्तर मं जउन सुख, शांति, परेम अउ सुकून देखे ले मिलथे ओकर इही सब कारन हे.जुरमिल के, सहकार के भावना से काम करथे.तेकर सेती ओकर मन के संतोष के भावना देखे ले मिलथे.छल-कपट, परपंच, धोका ये सब ले कोसो दूर होथे.इही पायके एकर मन करा सुख, शांति अउ संतोष देखे ले मिलथे.अइसन मनखे मन, जउन ला आज के सफेद पोशधारी, शिक्षित वर्ग के लोगन मन आदिवासी कहिथे, अशिक्षित अउ नइ जाने का-का कहत फिरत रहिथे, फेर सही मं कहिबे ते ओमन वास्तव में देवी-देवता समान हे, पूजन करे के लइक हे.

एकर मन के आचरन, बेवहार, संस्कार अउ परम्परा के संदर बानगी अभी देखे ले मिलिस हे.दंतेवाड़ा के समलूर गांव मं.अइसन परम्परा, संस्कार अउ तिहार नइ दूसर जघा देखे ले मिलय.जउन देखिन तउने अचम्भा मं परगे, के अइसनो भी तिहार अउ परंपरा होथे. सब गांव वाले एकजुट होके, सहकार के भावना ला लेके तिहार मनावत रिहिन.दीवाली ला ओमन अन भाखा मं दीयारी कहिथे.ओकर मन के गांव समलूर मं विख्यात तपेश्वरी माता के मंदिर हे, जिहां लछमी पूजन के दिन ‘दियारी पर्व के दिन के विशेष पूजा होथे.अनुष्ठान के बखत नवा चाउंर के पिसान (आटा) नवा चांउर के बने भोग अउ खीर देवी ला अरपन करे जाथे.ये देवी के पूजा-पाठ अउ अनुष्ठान मं गांव के सबो मनखे भाग लेथे.अनुष्ठान खतम होय के बाद देवी ला अरपित करे के सबो साजो सामान समेत पुजारी मन ला बाजा-गाजा के साथ कंधा मं बइठार के जउन पारा मं ओमन रहिथे, तिहां पहुंचाय जाथे.पुजारी मन चिहां रहिथे उहां तक तुमड़ा, राउत अउ कउंरिहा मन पारंपरिक वेश-भूषा मं दल-बल के साथ उखरा पांव (पैदल) चलथे, संग मं पारम्परिक बाजा मोहरी के गूंज, अउ बामड़ा देव के प्रतीक अउ तपेश्वरी देवी माता के साजो-सिंगार के सामान ला धर के चलथे.मंदिर ले पुजारी मन के घर दू किलोमीटर दूर हे.समलूर के गांव वाले मन के अनुसार तपेश्वरी देवी अउ पुजारी मन के प्रति ओकर मन के मन मं बहुत आस्था, परेम अउ विश्वास हे.

समलूर मं तपेश्वरी देवी माता के मंदिर मं दीयारी पर्व (दीवाली) पर गेंदा फूल अउ चाउंर धोये के रस्म रिवाज हे.एकर बाद गेंदा के फूल गांव के दूसर देवी-देवता मन ला अरपन करे जाथे.इही दिन नवा फसल के चाउंर ला धोये के रसम निभाय जाथे.एकर बाद गांव वाले मन धेये चाउंर ला पका सकत हे.

प्रकृति पूजा के अजब-गजब परम्परा हे समलूर मं.दियारी अउ नवाखाई पर्व बिना ग्राम देवी के अनुमति के नइ मना सकयं.गेंदा फूल अउ अनाज के घला उपयोग नइ कर सकयं, अइसे विधि विधान हे.ये नियम के पालन बर कड़ाई अउ अनुशासन से करे जाथे.तपेश्वरी माता मंदिर के प्रधान पुजारी परमानंद जिया के मुताबिक दीयारी पर्व ला चाउंर धोवाई के रसम ले जाने जाथे.देवी करा नवा फसल के अनाज ला धो के उपयोग मं लाय बर अनुमति मांगे जाथे.अइसने दीवाली के पहिली दिन-रात मं गांव के हर घर के एक सदस्य तपेश्वरी देवी के मंदिर मं जाथे अउ एक-एक दीया जला के आथे. मंदिर गांव ले दूर जंगल मं हाबे.

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Chhattisgarhi Articles, Chhattisgarhi News, Diwali 2021

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