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छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- अलकरहा बिहाव के झारा-झारा नेवता

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लालची मन के का गति होथे, ओला तो सब जानत हे। बटन दे नेवता ला झारा-झारा का फरक परत हे। फेर उमर हा तो अपन हिसाब चुकता कर लेथे। एक घौं के बात हे, इही शहर मं एक झन बने चाम सुंदर डोकरी रिहिसे।

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एक घौं के बात हे, इही शहर मं एक झन बने चाम सुंदर डोकरी रिहिसे। बने खाता-पीता घर के गउंटनीन आय। पक्की-पक्की घर-दुवार रहिसे। एको झन लोग-लइका नइ रिहिसे। आधा उमर मं बीच जिंदगी मं ओकर गउंटिया छोड़के परमधाम रेंग दीस। अब अकेला गउंटनीन कइसनो करके अपन जिंदगी काटत रिहिसे। अड़बड़ किटकिटहीन अउ खटकायरिन रिहिस, परिवार के कोनों रिसता-नाता संग ओकर नइ बनत रिहिसे तेकर सेती कोनों ओकर घर आवय-जावय नहीं। दस आगर तीन कोरी के होगे रिहिस ओकर उमर, तभो ले फिलिम देखना नइ छोड़े रिहिसे, जइसे कोनों नवा फिलिम लगतिस, रिक्शा मं बइतिस अउ चल देतिस सिनेमा देखे बर।

एक झन ओकर घर मं कॉलेज पढ़इया छोकरा राहय, तेकर ओहर अड़बड़ मदद करय। बने-बने खवातिस, पियातिस, अउ कभू बनय तब उही बाबू ला धर के रेंग देतिस फिलिम देखे बर। अइसे लगथे के ओ छोकरा के रूप-रंग अउ बढ़त जवानी ल देख के डोकरी ओकर ऊपर मोहागे रिहिसे। एक दिन ओ बाबू ला कहिथे- एक ठन बात तोला काहत हौं, मोर बात ला मानबे तब बहुत मजा करबे, सुख पाबे।
सिधवा गढऩ के बाबू, गउंटनीन के चाल ला नइ समझ सकिस अउ कहिथे- का बात हे दाई तौंन ला बता?

देख तैं मोला दाई झन कह, मोरो कोनो लोग लइका नइहे। मैं मर जाहौं तहां ले मोर पूंजी के दस झन लगवार पैदा हो जही, खवइया हो जही। अउ अइसन मैं नइ होवन देना चाहत हौं। मैं मोर जतका संपत्ति हे, खेत-खार अउ पूंजी पसरा हे, ओला तोर नाव करे के इच्छा होवत हे।

पढ़इया छोकरा घला गरीब घर के रिहिस। न गांव मं ओकर खेत-खार राहय न घर दुआर। काकर बेटा हे, कोन हे, कहां के तेला कोनो नइ जानय। कइसे ये शहर मं गउंटनिन घर भाग जाने असन आगे तौन ला ओहर नइ जानय। अब ये दाई जौंन पासा फेंकत हे तौंन ला ओहर समझ नइ सकत हे, सबो पूंजी ला ओकर नांव करे के पीछू का राज हे? का सोचत हस बाबू, का मोर बात तोला मंजूर नइहे, विश्वास नइ होवत हे? गउंटनीन पूछथे। नहीं दाई, अइसे बात नइहे। ओ बाबू कहिथे।

फेर तैं मोला दाई केहे, मैं तोला काहत हौं न मोला दाई झन काह। गउंटनीन ओला बरजथे।
‘तब का काहौं, अतेक दिन ले उही तो काहत आवत हौं। बाबू के बात ला सुनके गउंटनीन कहिथे- जौंन मैं योजना बनावत हौं ओला मान। मोर जतका संपत्ति हे ओला तोर नांव करना चाहत हौं। चल जाबो तहसील ऑफिस अउ सब कागजात तइयार करके ओमा मैं दस्तखत कर देथौं, अउ ओ दिन ले ये संपत्ति के तैं मालिक हो जाबे।

अउ तैं गउंटनीन, तैं तो जुच्छा हो जाबे, खाली हाथ? पढ़इया बाबू के ये सवाल ला सुनकर गउंटनीन कहिथे- जुच्छा नइ होवौं रे, तैं होबे मालिक अउ मैं होहूं तोर लोगई। चल कोर्ट जाके उहां बिहाव कर लेबो।

साहेब मन ये हमर दुनो के बिहाव ला होवन दिही, मानही, हांसही नहीं, अनफभक कइसन ढंग ले बिहाव करत हे? का दाई, ये उमर मं बदनामी करावत हस? फेर तैं दाई केहे, तोला दस घौं रोकत हौं, मोला दाई झन काह? अब मैं बिहाव के बाद तोर बाई बनइया हौं। तैं गरीब मनखे, बने आबाद रहिबे। मोर का हे, थोरकिन जिंदगी बांचे हे तोर संग हांस-गोठिया के बिता हौं।

ये गउंटनीन के बात ला टार नइ सकिस, ओहर अउ जइसने काहत गिस वइसने करत गिस, रजिस्ट्री के बाद सब चेंज, बस के मालिक संग अउ गउंटनीन के मांग मं सिंदूर घला भर दीस। कोर्ट के साहेब मन ये नवा दम्पत्ति ला सुखमय जीवन का कामना करिन। फेर अलहन एक ठन भारी होगे। गउंटनीन के साध नइ बुता पइस, जेकर बर अपन सब संपत्ति ला पढ़इया लइका के नांव करिस, ओर संग बिहाव घला कर डरिस, पहिली हनीमून के बेरा मं ओहर दम तोड़ दीस। परान पेखरू उड़ागे। पढ़इया लइका के कांही समझ नइ अइस, के ये सब कइसे होगे, फेर अतका जरूर जान डरिस, अउ हांस घला डरिस। उमर के घला तकाजा होथे, जौंन उमर के तौंन काम उमर मं फबथे। लालच जीव के जंजाल होथे।

बुधारू कहिथे- सुन डरे सामरतन ये कहिनी ला। ओहर कहिथे- हौ भइया सुन डरेंव, फेर का करबे आजकल तो डोकरी-डोकरा मन जादा माते ले धर ले हें। तैं नइ सुने हस का, चंदू मंडल हा सुकालू के बहू ला उढ़रिया ले के भाग गे हे।

अरे राम-राम, का कहिथस संगी, ओ डोकरा ला अपन उमर के घला खियाल नइहे गा। एक पांव कबर मं गड़े ले जाथे, अउ अइसन चाल? बुधारू बताथे। सामरतन कहिथे- एकर ले बड़े बात मैं तोला बतावत हौं, सुन हमर परदेश मं घला अइसने कस अलकरहा बिहाव होवइया हे। गजब दिन से हो-हल्ला मचे हे। छत्तीसगढ़ के एक झन पुतरी असन सुंदर राजकुमारी हे, ओकर नांव हे सत्ता। तेकर संग बाबा साहेब बिहाव करिहौं कहिके अडिय़ागे हे। नीयत गडग़े हे ओकर ऊपर।

सामरतन के बात पूरा नइ होय पाय रिहिसे के बुधारू बीच में रोकत कहिथे- ओकर तो बिहाव होगे हे, अढ़ई साल बीतगे। दुसरइया कइसे बिहाव हो सकत हे, ककरो जूठा करे अउ बासी माल ला कोनो खाही जी? कइसे हे तोर बाबा साहेब हा, दुछुहा हे का?

सत्ता सुंदरी बर बड़े-बड़े के मुंह ले लार टपके ले धर लेथे सामरतन। ये उमर के खियाल नइ करै। डोकरी होवे ते डोकरा होवे। तैं कहिनी सुनाय नहीं, कतेक सुग्घर लागिस। लालची मन के का गति होथे, ओला तो सब जानत हे। बटन दे नेवता ला झारा-झारा का फरक परत हे। फेर उमर हा तो अपन हिसाब चुकता कर लेथे। फेर दूसर के गोई बर नीयत खराब करई अच्छा नइ होवय। ओकर गोसइयां जब कहूं ये बात ला जानही तब का होही।

तब जौंन होही तौंन तो होबे करही, मातही रंगझाझर। बुधारू कहिथे- दुनिया मं दुई चीज बर तो झगरा लड़ई मातथे भाई- सत्ता अउ सुंदरी। ये तो आदिकाल ले चलत आवत हे। देखना हे ये शतरंज अउ चौसर के खेल जौन बिछावत हें तेमा डोकरा जीतथे के जवान।

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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