छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: धान अउ धन के होवत हे चीरहन

बिना धन अउ धान के कइसे नेत-घात (योजना) बनही कइसे देषके विकास होही? आत्मनिर्भर बनना हे, देषला आरथिक विकार कोती ले जाना हे तब मुसुवां अउ बैंदरा मन के पांव मं बेड़ी, डारें बिगन थाम नइ बनय.

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  • Last Updated: October 5, 2020, 10:07 AM IST
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कोठी के धान उरकगे, बैंक मन के तिजउरी के धन (रूपिया) कहां उड़ागे, कोनो गम नइ पइन. ओ तो पाछू, पता चलिस के बड़-बड़े मुसुवा मन कोठी के धान ला खा-खा के फोकला पार दीन वइसने बैंक के धन ला बड़े-बड़े नेता, उद्योगपति, सेठ-साहूकार अउ नौकरषाह मन घोटाला कर कर के सांड अंसन चर डरि. किसान, बैंकवाले मन माथा धर के रोथे, करम ठठाथे. मुसुवा ल कतको जहर दे मरे के नाव नइ लेवय वइसने बैंक घोटाला करइया मन बर कतको कानून बनाय सरकार हां ठेंगा देखावत दूसर देषभाग जथे. बिना धन अउ धान के कइसे नेत-घात (योजना) बनही कइसे देषके विकास होही? आत्मनिर्भर बनना हे, देषला आरथिक विकार कोती ले जाना हे तब मुसुवां अउ बैंदरा मन के पांव मं बेड़ी, डारें बिगन थाम नइ बनय.

बड़े बड़े भोकंड-भोकंडमुसुवा मन कोठी के धान ला खा खा के फोकला पारत हे. कोन कोती ले बिला करके कोठी में खु सर जाथे अउ रात भर डाकू दल मन बरोबर कोठी मं खुसर के जतका खाना हे, फेंकना हें, करथें अउ होत बिहनिया हाथ झर्रावत कहां भाग जाथें कोनो ला कांही गम नइ मिलै? कोठी के छबना जस के तस हे, घर मालिक उपरे उपर देख के बेफिकर रहिथे फेर पाछू ओला कोनो बताथे के मुसुवा मन कोरा पार पार के धान ला गिरावत हे, खावत हे तब ओला चेत चढ़थे. जाके देखथेंतब ओकर होषउड़ाजाथे, कोठी के छबना ला खोल के देखथे तब तो गष खाके पठउंहा मं गिर जाथे. मुसुवा मन खा खा के धान ला अधिया डरे हे.सब के लेना देना है अब का होही? किसान परेषान ये मुसुवा मन के मारे. भोकंड-भोकंड, सांगर-मोंगर मुस्तंडा मन कस ये मुसुवामन कान, पूछी ला टेड़त अइसे भागथे के ककरो पकड़े मं नइ आवयं, झपकिन बिला तरी खु सर जाथे.

येला मारे बर दवाई खवाबे तभे हर कांही फरक नइ परै. जहर हर एकर मन बर अमरीत होगे हे. पकड़े बर पिंजरा लाबे तौनोंमं भोकंड अतेक के धंधा नइ पावैं. सबो उदीम करके किसान हार खाके बइठगें फेर ये मुसुवा मन हाथ नइ लगीन. अजलइत ओकर मन के कम नइ होइस, लूटपाट, धूम-धड़ाका नइ थिरकिस. कोठी के धान फोकला परत जाथे, किसान अपन आंखी के आगू मं लुटावत देखत हे. डाकू दल बरो बर ये मुसुवा मन कान टेड़त, पुछी मेंछरावत किसान के कमई मं आगी लगावत हें. साल भर के कमई, ओकर आड़ी पूंजी ला ये चंडाल, बेईमान मन गारद करत रहिथें तेही पाके ओमन जुच्छा के जुच्छा गरीब के गरीब बने हे. खेत मं फसल हे तब सांड मन बाप कस माल चरथे, लू मिंज के कोठी में धरबे तब ये बेईमान मन के नीयत गड़ जथे. कहां, जाय, का करैं किसान. कोठी मं धरके राखबे तब ये हाल बोरा मं भर के परछी में राखबे तभो तो इन बचावय. भुसड़ी-मंसा मटियामेट करथे तौंन अलग.

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ये तो किसान अउ मुसुवाके बीच के बात होगे. अइसने कस आज देषमं अउ दूसर किसम के बड़े बड़े अउ भोकंड -भोकंड मुसुवा हो गेहे, ओमन बैंक मन मं जमा? गरीब जनता के धन ला अइसे डकारत हे, कुतर-कुतर के खात हें के कोनोंला कांही पता नइ चलत हे? पता तब चलथे जब बैंक वाले मन ओकर करा तगादा करे ले जाथें. तब ओमन हाथ झर्रावत कहि देथें, हमन तो दिवालिया होगे हन. खाता बी ला खोल के देखा देथेंअउ कहिथें, कर लौं जौंन करना हे तौंन. बैंक वाले मन हारे जुआरी कस मुंह लटका के आ जथें गांव मं किसान मन के कोठी खाली, शहर मं जनता के बैंक मन खाली. ओकर मन के मुहु उतरे हे फेर ये मुसुवा मन के मुंह मन तो जइसे गुलाब के फूल कस खिले हे. खिलही कइसे नही, हराम के धन अउ धान ला खा हे, बाप कस माल तब मठ अउ मंदिर के पंडा मन कस तो मुसतंड रइबे करही, मेंछा अउ पूछी ला टेड़बेकरही. ओकर मन के बा पके का जाना हे? जेकर चीज जाथे, धन जाथे, गंवाथे, तौंन हर जानथे ओकर हीरा-पीरा ला. पसीना ओगार-ओगार के जोरे रहिथे एक-एक दाना अउ पइसा ला.



अब तो झकमकावत हे ये मुसुवा मन. जान डरे हे पिंजरा अउ जहर मं काही दम नइहे, लाठी घुनहा हे अउ रखवार रसिया अउ मंदू हे. चारो कोती देख लिन इहां तो ढोल मं पोल हे तब संइया भये कोतवाल के तर्ज मं ये मन अपन काम बताना शुरू कर दिन. धड़ाधड़ कोठी के भीतरे-भीतर बिला बना के धान ला अइसे उदलना अउ खा-खा के फोकला पारना शुरू करिन ते घर मालिक गम नइ पाइन. खाता ला पूंजीपति मन अइसे उलटिन पलटिन के

देना के लेना निकले ले धर लिस. बैंक वाले मन बक्खागे के ये कइसे उलटा गंगा बोहाय ले धर लिस? हरिषंकर परसाई घला कोनो बखत मुसुवामन के मारे बहुत परेषान रिहिस हे. आतंक अतेक मचावैं के ओकर तना हराम हो जाय. कहूं बाहिर ले आवय तब ओकर कुरिया हर तो देखे के लइक राहै. ओकर कापी किताब ला ये ती ओती उलट-पुलट करके तो रख दे राहै, कुतर कुतर के घला गारद कर दे राहैं. ओकर लिखे रचना ला कतको ये मुसुवा मन मटियामेट कर दे राहैं. बिस्तर, कपड़ा तो टुकड़े -टुकड़ा मिलैं. शैतान मन के आगू मं ककरो कांही बस नइ चलैं. कतको बरजबे, कतको डरवाबे, मारबे दउड़ाबे फेर खटकायेर बेईमान, नीयतखोर मन अपन खटकायरी ला नइ छोड़ै.अपन ये दुख पीरा ला एक ठन लेख मं ओहर लिखे अउ बताय हे के मुसुवा मन कतेक परजीवी अउ शोषक होथें. दुसर के धन, सुख चैन छिनना अइसन मन के धरम होथे, करम होथे. इही ओकर मन के ईमान अउ भगवान हे.

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जब परसाई जी अतेक भारी मन से अपन दुख ला बताय हे तब इहां जनता के मन ला समझे के बात हे. कोन लूटत हे किसान अउ जनता धन ला, कमई ला. करोड़ो के बैंक घोटाला कोन करत हे, कोन हड़पत हे किसान, मजदू र, गरीब जनता के पछीना ओगारे कमई ला. इही मन ओ बड़े-बड़ेभोकंड-भोकंडमुसुवा हें जौंन बाप कस माल बैंक के धन ला लूटत हे, डकारत हें. जइसे किसान कोठी के धान ला फोकला पारे मुसुवा मन के कांही नइ कर सकत हें तइसने ये देषके गरीब जनता मन बंैक के लुटेरा मन के कांही नइ बिगाड़ सकत हे ? ओमन डाकू मन कस सीना तान के ओकर आगू ले निकलत हे अउ ओमन निरबल कस मुड़ गड़ियाय खड़े हे. जब रखवारे मन ओकर कांही नइ बिगाड़ सकत हे तब ये निहत्था का कर सकत हें ? लूट लौ साड़ कस पूरा खेत तुंहर बाप के हे तुंहरे मन बर तो बोय हें किसान मन चरही कइके. चर लौ...
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