छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: यहा काय ए आजकाल के खाई खजेनी

छत्तीसगढ़ी विशेष
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चना, मुर्रा,लाई,अऊ जलेबी , मिठाई हमर छत्तीसगढ़ मन ला अबड़ भाथे. गांव देखें बजार भराथे. बड़े बजार ,छोटे बजार अऊ हटरी बजार के चलन हावय।जंगल राज मा दुरिया -दुरिया के गांव मा हप्ता बजार भराथे .दुरिहा होए के सेती अपन गांव घर ले मुधरहा रेंगे- रेंगे बजार मा अमाथे. एकरे सेती ओ डाहर बिहिनिया ले बजार माड़ जाए रथे.

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टघलाके मुहड़ा ला खिल दे तहां हवा पानी बंद, बेचावतथे बजार मा रंग-रंग के खई खजेना. सियानमन घलो चिखेबर धर ले हें. पहली जमाना मा तेलहा-फुलहा के भारी परहेज राहय एकरे सेती तिहार बार के रांधय अऊ सिरवादंय. दू चार दिन चलिस तहां खतम. आजकल तो महीनों टंगाए- टंगाए देखे बर मिल जाही.
बीमारी के जर ला टमरइया बईद -डॉक्टर का करय कोन जोग ला मड़ावय सब अंन्ताजी चलइया होगे हें. बीमारी जादा बाढ़जथे तभे बाहिर लानथें -लेगथे अऊ इलाज होथे.
झार -फुक बइगई-गुनियाई आजो सुने बर मिल जही. बछरभर मा कई पईत मौसम बदलथे अऊ जूड़-सर्दी धर लेथे एकर कारण हरय कुछु कांही बाजार मा लेके उही मेरन खाना. पहली घर मा चेतावंय. कांही खाए के संउख होही ते बिसा के घर ले आनबे. घर मा बांट-बिराज के खाबो. ए बांटे -बिजारे मा एक ठन सन्देस राहय कहां नकसान करइया जिनिस तो नई बिसा डारे से.

सबों जगा के खान-पान मा अपन डहार के उपजे- बाढ़ें जिनिस के आधार होते. कोनो मेरन कांही त कोनो मेरन कांही. ते देस-दुनिया ,घुमे फिरे जाबे ते सबो ला जान डारबे . ठंडा-गरम सबो सहइया हाड़ा के सेती ही खान-पान के संबंध होथे. इंहा नई मिलय ते का करबे अइसे कहइया घलो मिल जाही. फेर आजकल सबो चीज बारो महीना मिल जाही. तोर थैली मा पईसा होना चाही फेर सबो तोर ए. बिसाके धर ले अऊ पुरोती चलन दे का करना. बासी- तियासी घलो सेंकत हें.
खाई-खजानी पेट भरहा खाए के नोहर. चुरूम- चारम होगे तहां बस. सबो घर पहुंचना सगा के अवई -जवई आठो काल बारो महिना चलतेच रइथे. सगा उतरइया कांही न कांही बिसा के धरे रहीं. लइका मन के धियान ह झोला कोती रइथे. खई निकरिस तहां ले खब ले धरके खातेच खा. केरा ,संतरा,मोसब्बी ,सेवफल होगे त का पुछना हे. फल अऊ मेवा-मिष्ठान गांव-घर बर नेवई के मिलइया खजानी हरय. टुसा- टुसा करके कलिंदर खवई सीजन मा खाए बर पाथे ओकर मजा अलगेच हे.



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बजरहा समान मनमाड़े अंकन बनाए- सजाए वाला होथे. व्यापारी मन कारखाना खोल डारे हें. दूसर देस ले घलो खाई- खजानी आए ला धर ले हे. मुंह के सुवाद के सेती बिसा- बिसा के खवई चलिस तहां झन पूछ. कोन बनाने वाला हरे कहां बनवाई चलथे पूछे के काम नइये पइसा फेंक तमासा देख अइसनेच चलत हे. साफ सफिन जगा देखे सुने जाए के काकर मेरन टाइम हे. निसफिकर होके कतकों झन मेल मिलाकर के काम ला धरले हावय. कांही जिनिस बाजार मा नवा आईस त दूसर दिन मेल मिलावर सुरू. मिलावटी जमाना मा का करबे ।ककरो ते बिगाड़े नई सकस. पहुंच वाला मन अपन बनौकी पहली ले बना डारथे. छोटे- बड़े सबो दू पइसा उपहार के चक्कर मा का नई करत होही ।तोला का करना हे कहिके चेतादिही होगे.

चना, मुर्रा,लाई,अऊ जलेबी , मिठाई हमर छत्तीसगढ़ मन ला अबड़ भाथे. गांव देखें बजार भराथे. बड़े बजार ,छोटे बजार अऊ हटरी बजार के चलन हावय।जंगल राज मा दुरिया -दुरिया के गांव मा हप्ता बजार भराथे .दुरिहा होए के सेती अपन गांव घर ले मुधरहा रेंगे- रेंगे बजार मा अमाथे. एकरे सेती ओ डाहर बिहिनिया ले बजार माड़ जाए रथे. बारा बजिस तहां उसलती हो जथे. अदला-बदला बर कोचिया मन बजार के खुसरतिच मा बांटा बार धरे बोरा बिछाए जमे रथे. सौदा पटा के नगदी धरा दिन होगे . जंगली जीवन एकदम सादा झूठ लबारी ऊमन ला छूबे तक नइ जानय फेर बीच बजार मा आके कइसे ठगावत हे कोन उनला ठगइया होगें , काबर ठगत होही देखे के बात ए. सबो दुनिया मा काकर चलही तेला कोन बतावय. ठगइया मन अब थोकन सावचेत राहंय काबर के जमाना अइसे आने वाला हे तेमा तोर चोरी -लबारी चलने वाला नइये. तइयारी होगे हावय .धीर लगाके देखव , अबक - तबक एदे आतेच हे ते जान डार . चेतावनी हावय मान डार.
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