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छ्त्तीसगढ़ी लेख - पाछू पलट के देखत-देखत

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इही कोई पचास साठ साल पहिले गाँव म मनोरंजन के साधन कम रिहिस. संझौती बेरा मुक्का सनिमा गाँव-गाँव म देखे जाय. रामलीला, कृष्णलीला, महाभारत, राजा हरिश्चंद्र के नाटक, दसेरा म रावण-वध, नाचा-गम्मत(छत्तीसगढ़ी) होते राहय. गाँव–गाँव म रामायण मंडली रामचरितमानस के पठन-पाठन होय.

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बात ओ दिन के हे जब मनोरंजन के साधन कम रिहिस. गाँव म सब बर साइकिल घलो नोहर राहय. बइला-गाड़ी, भंइसा-गाड़ी, खासर के जमाना भूले-बिसरे दिन होगे. बइला-भंइसा ल बने खवा पिया के एक पइत फांद दे तहाँ ले धरसा, सड़क, पयडगरी, सब जगा गीत गावत चल.अइसे बइला घलो रिहिन जेन गाड़ीवान के बिना सामान ल मंजिल तक पहुंचा के सांस लेंय. बइला के गला म सुंदर सोहई अउ घाँघरा बंधाय रहे. बइला के रेंगे, दउड़े ले घाँघरा के अवाज मन ल खुश कर देय. तइहा के बइला-भंइसा मन खूब ताकत वाले होंय. मन भर चारा चरें अउ कस के मिहनत करें. कोढ़िया बइला, भंइसा मन ल छांट के अलग कर दे जाय. उन गोबर देंय त खातू-कचरा के काम आय. लोगन पैदल/साइकिल से मिलों के सफर तय करें. तंदरूस्त राहँय. किसान के घर के बाहिर म घुरूवा राहय. गोबर अचरा-कचरा सब घुरवा म फेंके जाय. घर के खातू खेत-खार म जाय. फेर रासायनिक खातू के जोर बाढ़ीस. अब छत्तीसगढ़ म गोबर के महत्ता फेर स्थापित होय हे. सरकार जैविक खातू बर खूब जोर देवत हे. वर्मी खातू के उपयोग होवत हे.

धांवरा अउ चितकबरा बइला

धांवरा अउ चितकबरा बइला समेत बड़े जांगर के भंइसा गाँव म अलगे दिखे. एक्का-दुक्का मन तिर फटफटी राहय. ओखरो ले जेन बड़हर होय तेंन गौटिया मंडल करा चार चक्का दिख जाय. उहू चार चक्का के नाज-नखरा खूब होय. पेला-पेली म भुर्र….भार्र भुर्र….भार्र करे नंगद ले धुंगिया छोड़े तब जा के स्टाट होय. कभू चले त मन भर चले, नहिं चले त अड़ जाय. अड़ीयाय कार ल पेलइया-ढकलइया के तन-बदन ले तर-तर तर-तर पछीना छूटे. कार के नखरा देखे बर बस्ती भर के मनखे जुरिया जाँय. भीड़ देख के कार मालिक के सीना चवड़ा होय. साइकिल आम मनखे के आवागमन के परमुख साधन राहय. अब के लइका मन ल साइकिल चलाय म सरम लागथे. पिटरोल वाले दुपहिया वाहन के बिना घर ले बाहिर कदम नइ रखें. जबकि साइकिल स्वास्थ्य बर वरदान हे. यातायात के साधन कम से कम रिहिस.

बस्ती बोले सांय- सांय

गाँव-गंवई म संझा होते साठ सोवा पर जाय. उही मन जागें जेखर बुता राहय. सात-आठ बजे तक बस्ती सांय-सांय बोले. कुलुप अंधियार हो जाय. बिजली कोनो-कोनो गाँव म आना शुरू होय रिहिस. चिमनी-कंदील, मसाल संगवारी रिहिस. रात म कुकुर भूकें, अपन बस्ती म शेर हो जाँय. घुट्कुरी तीर के गाँव म जंगली जानवर मन के आरो मिले. उन अपन इलाका म गश्त देंय.. मूंदरहा ले लइका, सियान, जवान सब उठ जाँय. घर, बारी-बखरी, खेती-खार,बियारा के बुता शुरू हो जाय. तइहा के मनखे अब के मनखे कस सुखियार नइ रिहिस. खूब कमाय-खांय. बटकी म बासी, बंगाला के चटनी नहिं त सुक्खा मिर्चा, लसून, नून के चटनी, भूरका, गोंदली होगे त जान राज भोग होगे. गरमी के दिन म बासी-बोरे म दही-मही डार के खाय के मजा खवइयाच मन जानहीं. पहिली हांड़ी या हंडिया (मिट्टी की हंडी), म भात रांधे,अउ कनौजी म पसाय जाय. माटी के बरतन म भोजन के सुवाद बाढ़ जाय. एमा बासी-बोरे घलो रखे जाय.खवइया मन ल खूब आनंद आय. माटी के कड़ाही म साग रांधे. रंधइया मन पीतल के बटलोही, कड़ाही, लोहा के कड़ाही, पीतल अउ लोहा के करछूल ,डूआ के परयोग करें. फेर जरमनी के बर्तन आगे. यहू कुछ बरस चलिस. पीतल, कांसा, लोहा, जरमनी के बरतन के परयोग होइस हे. फेर जमाना स्टील के आगे. स्टील घरों घर छा गे.

संझौती बेरा के मुक्का-सनिमा

इही कोई पचास साठ साल पहिले गाँव म मनोरंजन के साधन कम रिहिस. संझौती बेरा मुक्का सनिमा गाँव-गाँव म देखे जाय. रामलीला, कृष्णलीला, महाभारत, राजा हरिश्चंद्र के नाटक, दसेरा म रावण-वध, नाचा-गम्मत(छत्तीसगढ़ी) होते राहय. गाँव–गाँव म रामायण मंडली रामचरितमानस के पठन-पाठन होय.मरियादा पुरूषोत्तम भगवान ल छत्तीसगढ़ अपन भांचा मानथे. भगवान राम से जुड़े हे. ये सब के चलते इहाँ रात भर चलइया सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होइस. छत्तीसगढ़ के इहाँ के संस्कृति म रचे बसे हें. इहाँ राम..राम संबोधन ले आजो दिन के सुरूआत होथे. राम-राम कहि के राम आजो प्रचलन म हे. राम राम बोल के एक दूसर के सुआगत करे के जुन्ना परंपरा हे. इहाँ सुख म दुःख म भगवान राम के स्मरण करे जथे. छत्तीसगढ़ी कवि-सम्मेलन ले छत्तीसगढ़ म जन-चेतना बाढ़ीस. येखर लंबा दौर चलिस. छत्तीसगढ़ी म साहित्य लेखन म तेजी अइस. हालंकि इहाँ के संस्कृति विभाग हे. फेर बेजान बरोबर हे. ओखर कार्य-संस्कृति के समीक्षा जरूर होते रहना चाही.

कपसा के आगी-बुगी

बर-बिहाव म अंचरा धरंउनी म सासू माँ रिस्ट-वाच (हाथ-घड़ी) देय. ओखर सुंदर करिया पट्टा दमाद बाबू के कलई म खूब फभे. ओ समय म यहू गिफ्ट बड़े बात होय. सासू माँ दमाद बाबू ल जब ट्रांजेस्टर देय त गाँव भर म ओखर चरचा होय. फलाना ह धीरे से अपन खांद (कंधा) म ट्रांजेस्टर रेडियो लटकाय सुंदर हिदी/छत्तीसगढ़ी गीत सुनत-सुनावत बस्ती भर के चक्कर लगा डरें. नाच, गम्मत, ददरिया, पंडवानी सुनत मन नइ भरय. संझा जुआर बरसाती भैया के चौपाल म त गाँव के गाँव आ बइठे. संझौती आगी सुलगाय के बेरा हो जाय. गोरसी के आगी जुड़ा जाय त जी कउवा/कंझा जाय तब नवा बहुरिया छेना धरे परोस म नहिं त तिर-तखार म आगी मांगे बर जाँय. तब माचिस के नहीं चकमक अउ सेम्हर के कपसा ले आगी पैदा करे के उदिम करे जाय. घरों-घर गोरसी म आगी राहय. गोरसी के आगी जुड़ा जाय त सियान दाई अपन बहुरिया ल चमका देय. बहू के मुहूँ तुतरू कस हो जाय. गोरसी के पलपला के आगी के मद्धिम आंच म दोहनी म दूध चूरत राहय. ओखर साढ़ी के सुरता आथे त अभू घलो मुहूँ पंछा जथे. मुहूँ म पानी आ जथे. बिना मिलावट के दूध घरों-घर होय. तइहा के चाहा के मजा अब के चाय म नइ मिले.गुड़ के चाहा जादा पिए जाए. धीरे-धीरे हम तरक्की करत गेंन. अब अतेक तरक्की कर डरे हन के मिलावट के जिनिस असली लागथे. तब मुक्का सनिमा देखे म मजा आय. बाईस्कोप देखे बर मन ललचाय. गोरसी के पलपला म आलू, सहित तरह-तरह के कांदा उसन के खाय म बड़ मजा आय. घरों घर बाम्हन चिरई (गौरइया) फुदकत राहय.

हाँसत-हाँसत पेट फूल जाय

वुही जमाना म ‘नाचा अउ गम्मत’ जनता के खूब मनोरंजन करे. नाच-गाना देखे सुने बर लइका,सियान, जवान सब के मन ललचा जाय. खेती- खार ले थके माँदे घर लहुटे के बाद म रंधवनी खोली म हांड़ी के चाउर डबक जाय. झटपट खा-पी के माई-पिल्ला नाचा देखे बर डट जाँय. मूंदरहा के होवत ले नाच गम्मत चले. दिन म उसनिंदा के सेती नींद के मारे झूमासी घलो लागे. गम्मत के कथा प्रसंग म पियार के मिसरी राहय, ताना मारे त समस्या अगिन बान हो जाय. हँसी मजाक म जनता के सुख-दुःख ल परगट करे के कला खूब जमे .आजकल त मनखे हाँसना, बने बोलना घलो भूलागे हे. तब हांसत-हाँसत पेट फूल जाय. जोकर सब के मजाक उड़ाय. सरकार के कतको योजना अउ ओखर दुर्दशा, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज सुनाय.

बजार सबके जीवन म घुरगे

अब बजार के बुराई जीवन म घुरगे हे. टी.वी. आ गे, घरों घर छागे. सीरियल के बरसात होवत हे. दिन-रात फिलिम दिखत हे. इंटरनेट म ज्ञान के भंडार भरे हे. वुहें ये ह भूल-भूलइया घलो हे. जेन भटकगें उनकर पता पाना मुश्किल हो जथे. अब तरक्की करत-करत मनखे अपन विश्वास अउ ईमानदारी म भ्रष्टाचार मिला के अविश्वास अउ अशांति बढ़ा डरिस. सादा जीवन, उच्च विचार ह मुहावरा बन के रहिगे.

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