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छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- जल, जंगल अउ जमीन मं अधिकार मांगे खातिर संघर्ष का नारा

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सरकार करोड़ों, अरबों रुपया के योजना बनाथे, वनवासी मन बर, पचासो साल ले अइसन योजना बनथे, फेर धरातल मं जाके देखबे तब आदिवासी, किसान, गरीब अउ मजदूर के हालत जइसने के तइसने हे.

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जल, जंगल अउ जमीन बर हक पाय के खातिर छै आगर तीन कोरी साल ले वनवासी मन एकता परिषद के बैनर तले लड़ाई लड़त आवत हे। ओकर मन के आंदोलन शांतिपूरवक चलत हे, इही आसा मं के कभू न कभू ओमन ला नियाव मिलही। ये बीच कतको सरकार अइन अउ गिन, सबो झन ल कुरसी मिलिस तहां ले सत्ता सुख मं भुलागे। वनवासी मन ठेंगवा चाटत रहिगे।

पानी सिर ले ऊपर तब चढग़े जब दोखहा सरकार मन जल, जंगल अउ जमीन ला झटके ले धर लीन। बरपेली करके वनवासी मन के हक के चीज ल नंगा के बड़े-बड़े उद्योगपति, धनपति, मंत्री, नेता अउ नौकरशाह मन करा बेचे के उदीम शुरू कर दीन। वनवानी बेघरबार होय ले धर लीन, जौन आदिवासी, गरीब किसान अउ मजदूर अपने घर, जमीन ला नइ छोड़े के जिद करिन तेन मन ला पुलिस के डंडा के डर दिखा के छोड़े बर मजबूर करे लगिन। जदा जिद करइया मन के घर-दुआर मं आग लगवा दीन। फसल ला गरवा मन ला चरवा दीन, बेटी-बहू संग अनाचार करे ले लग गे। अइसन दुख ला सह नइ सकिन आदिवसाी मन, तब कतको झन गांव छोड़-छोड़ के भाग गे। ओमन कहां गय, तेकर आज तक पता नइ चलिन। ये हे वनवासी मन बर सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रम।

सरकार करोड़ों, अरबों रुपया के योजना बनाथे, वनवासी मन बर, पचासो साल ले अइसन योजना बनथे, फेर धरातल मं जाके देखबे तब आदिवासी, किसान, गरीब अउ मजदूर के हालत जइसने के तइसने हे। तब ये सवाल उठथे, के ओ योजना के रकम कहां जाथे, कोन डकारथे? का सरकार एला नइ जानय? अइसे तो नहीं के मंतरी-संतरी, सांसद, विधायक, नौकरशाह जतका नीचे स्तर के सब करता-धरता हे उकरे मन के बीच मं बंदरबांट हो जाथे। कतेक सुग्घर हमर परजातांतरिक सरकार हे, हितवा-पिरवा हे आम जनता के?

चुनाव के बखत आथे तहां ले इही मन अपना मतदाता (जनता) मन करा आगे हाथ जोड़-जोड़ के कहिथे- तुहीं मन हमर मुलुक के मालिक हौ, माई-बाप अउ दाई-ददा हौ। खियाल रखिहौ, एको ठन वोट खराब झन जाय। कतेक लइका मन असन करलई करथे, कोनो-कोनो मन तो पाय-लगे ल धरथे, जन-मना सिरतोन मं ऐमन हमर पिरित के हें। अउ जब जीत के रायपुर, भोपाल, दिल्ली, पहुंच जथे, तहां ले लहुट के कभू गांव नइ आवयं, नइ झांकय, मतदाता मन ला के ओमन कइसन राहत होही, खात-पियत होही, रोजगार धंधा चलत हे के नहीं। काम-धंधा नइ मिलनय तब पलायन कर जाथे। आन-आन परदेस मं जिहां रोजगार के अवसर दीखथे। कोरोना काल मं दीखिस के कहां-कहां ले मनखे मन भटकत नइ अइन, जौन मन कमाय-खाय बर गये रिहिन हे।

ये हे पचास-साठ साल के किसान, मजदूर, गरीब आदिवासी मन के जिंदगी के लेखा-जोखा। बेशरम सरकार मन ये वनवासी मन के हक के रकम ला डकार डरिन, खा डरिन। ओकर नुमाइन्दा मन के बड़े-बड़े उद्योग, कारखाना चलत हे, देश ला कोन काहय, विदेश तक मं कारोबार फइलगे हे। अरबपति, खरबपति मन के संख्या बढ़त जात हे। अउ गरीबी के स्तर दिनोंदिन घटत जात हे। कोन हे गरीब मन के देखइया-सुनइया? सब सरकार गरीब के नांव लेथे, ओकर मन के रोम-रोम मं, मुख मं गरीब के भाखा बसे हे, फेर करनी कुछु दूसर होथे।

कंगाल होगे हे, ये देश के किसान, मजदूर अउ आदिवासी। एकर मन के जमीन, जायदाद ला झटके के युद्ध स्तर मं गांव-गांव मं अभियान चलत हे। उद्योगपति, धन्नासेठ, मंतरी-संतरी अउ नौकरशाह मन के एजेंट गांव-गांव किंजरत मिल जाही अउ कोकड़ा (बगुला) असन ताकत रहिथे के कोन जमीन, अउ घर बेचइया हे। जइसे पता चलथे झपट परथे, चील-कउंआ बरोबर। गिंधिया डरथे अउ कहिथे- मैं लेहौं जादा कीमत मं तोर जमीन ला। निरनय नइ ले पायवं किसान, आदिवासी अउ ओकर मन के फांदा मं फंसके जमीन ला गंवा डरथे, सदा दिन बर।

एमन काबर बेचथे अपन जमीन, का करहीं जमीन बेचके, कहां जांही, का करही? पटवारी रिकार्ड के सरकार सर्वे करवावय, तब पता चलही, पच्चीस-तीस साल के भीतर हजारों एकड़ पुश्तैनी जमीन किसान, आदिवासी मन के हाथ ले निकले बड़े तबका के हाथ मं चले गे हे। किसान, आदिवासी, हरिजन सब भूमिहीन होवत जात हे। अइसन सरलग कहूं चलत रइही तब का होही भगवाने मालिक हे।
लगथे ये सरकार गरीब, मजदूर, आदिवासी अउ किसान मन के सरकार नइ होवय, कोनो खास वर्ग के सरकार हे जौंन ओकरे मन के सुख-दुख, भलई, अउ काम-धंधा के चिंता म दिन-रात बड़े रहिथे। ओ साल देखने, कइसे छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी, किसान मन के जमीन ला बिना ओकर मन के मरजी के बरपेली हथिया के कोनो उद्योगपति के नांव करइया रिहिसे, आदिवासी किसान मजदूर मन केक विरोध अउ आंदोलन करिन, राजनीतिक दल मन घला ये आंदोलन मं संग दीस, तब ओ जमीन ला लहुटाय बर राजी होइस। हिां का सरकार हे, बरपेली ककरो जमीन, घर-दुआर ला डलहौजी कस छीना-झपटी करहीं। अंगरजे अउ तुंहर मं अंतर फेर का रहिगे?

ओ सरकार तो जंगल, जमीन, पहाड़ अउ सरोवर ला घला बेच-बेच के धन बटोरे हे, कुबेर बने के सपना ला पूरा करे हे, अपन दोंदर ला भरे हे। ऊपर वाले करा देर हे अंधेर नइहे, अति के अंत एक दिन होबे करथे। चर्रस ले एक दिन ओर सरकार के तखता पलटगे। अइसे मुड़भसरा गिरिस के माड़ी-कोहनी छोलागे, ओकर दरद आज ले नइ गे हे।

उही जल, जंगल अउ जमीन पाय खातिर अपने अधिकार के लड़ाई आदिवासी, किसान,म जदूर मन लड़त आवत हे, ओकर मन के संघर्ष सरलग चलत हे। नियाव अउ शांति बर एक सौ बीस गांव के वनवासी मन अभी हाल मं नौ-दस दिन पदयात्रा करके धमतरी जिला (छत्तीसगढ़) पहुंचे रिहिन हे। एकता परिषद के बैनर तले एक मन के आंदोलन चलत हे। इहां गांधी चौक मं सभा करके अपन अधिकार ला पाये खातिर हल्ला बोलिन, ये एकता परिषद गत तीन दशक ले दलित, किसान, मजदूर अउ आदिवासी मन के भलई खातिर काम करत हे। सभा मं ऐलान गिस के धमतरी मं अइसने अउ दुबारा बड़े रैली करे जाही।

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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