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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- तीजा तिहार म गरीब बाप के पीरा

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पानी के बरसा के संगे–संग तिहार मन के शुरूआत होथे, सउनाही, इतवारी, हरेली, आठे ,पोरा ताहने तीजा, अइसे किसम ले आठ पन्द्रा ...अधिक पढ़ें

तभो ले दूसर मन ल देख–देख के पीरा ल पियत रहिथे | तिहार मनई ह तो गरीब मन बर सजा आय सजा. दाऊ घर के लइका मन खीर– सोंहारी खाथे, त बनिहार के लइका मन उपास रहिथें. काबर कि कभू–कभू तो हप्ता म तीन चार दिन तिहार हो जेथे. इतवारी तिहार, फांफा बरोए के तिहार, बुधवारी तिहार, अइसने किसम के रंग–रंग के तिहार मनाए के परंपरा हे. बनिहार मन गांव गंवई के अइसन नियम के विरूद्ध म बोल तको नइ सकय | काबर कि अभी भी पूर्वज के बनाय तिहार मन चले आवत हवय. मान ले कोनो तिहार के विरूद्ध बोले के हिम्मत जुटाही वोला डांड़ परही. वोकर नाऊ लोहार छोड़ा दे जाही. यहू कइसन तिहार आय जिहां बनिहार मन के अवाज ल नइ सुने जाय. गांव म अभी घलो ग्रामीण व्यवस्था ल माने बर परथे . आखिर जादा तिहार मनई ह हमर विकास म रूकावट आय कि नोहे . खेत म काम रूक जथे. खेतिहर मजदूर मन तिहार के सेती चउपाल म निठल्ला बइठ के पासा अऊ तास खेलत रहिथें. दू–चार रूपिया हाथ म रहिथे वहू ल पान–बीड़ी म उड़ा डरथे. कुछु नइ सुहावय त चारी निंदा करत रहिथें. जादा बार तिहार म हमर छत्तीसगढ़ के विकास रूकत जावत हे.

धान के कटोरा ह तिहारे तिहार के खरचा म उना होवत जावत हवय, जब काम नइ करबो त पेज पसिया कहां ले मिलही ? जब पइसा नइ मिलही त बेरोजगेारी बाढ़ही. आखिर जादा तिहार मनई ह कतका उचित हवय. यदि हम रोजे काम करबो त रोज पइसा मिलही अऊ रोज हमर घर के चूल्हा म आगी बरही. हमन भूखन लांघन नइ राहन, तब तो हमर बर रोज तिहार रहि. हर रात देवारी अऊ हर रात हरेली रहि.

वोइसे यदि मानबो ते रोजे तिहार आय . त का काम करे बर छोंड़ देवन. नइ कमाबो त खाबो काला. अब देख न तीजा आ गे हे. बुधरू के एक झिन दुलौरिन बेटी . तीजा लाए ल जाय बर लागही, इही चिन्ता म बुधरू ह दुबरावत जावत हवय. काबर कि तीजा नइ लाए ल जाबे त बेटी ह कही अब तो हमर मइके वाले मन मरगे हवय. एती बुधारू के गांव वाले मन कही देख सब मन अपन बेटी मन ल तीजा लाए हवय अऊ बुधरू ल देख, एक झिन बेटी ल घलो तीजा नइ ला सके हे. अपन दुख ल अपने जानथे. बुधरू करा तो बहुत अकन समस्या हवय. काला–काला बताए. अरे भई दुनिया हर तो हंसइया हरय, बुधरू के उपर का बीतत हे तेला तो बुधरूच ह जानही.

बुधरू ह अपन बेटी ल तीजा लाने बर जाही त चार दिन के काम ह नांगा होही. आए–जाए बर मोटर गाड़ी के लागही. बेटी–दमांद घर जाबे त कुछु खई–खजाना, चना–फूटेना नइ लेगबे तभो नइ बनय. बेटी आही त ओकर बर अलवा–जलवा लुगरा–पोलखा ले बर लागही | अब बिचारा कइसे करय. आठे के दिन सब घर सूजी, पकवा, सिंघाड़ा बने रिहिस. ओ दिन उंकर घर हंडि़या उपास रिहिस हवय. हे भगवान ! काय पाप करे रिहिसे बुधरू ह तेमा गरीबी भोगत हवय. सब मिले ते मिले फेर बैरी ल घलो गरीबी देखे ल मत मिलय. तीज तिहार तो पइसा वालेे के आय. हरेली के दिन बुधारू ह अपन हंसिया अऊ कुदारी ल बंदन भर के तिलक लगा के छोड़ दे रिहिसे. वो दिन नरिहर घलो फोर नइ सकिस. गांव म अइसे–अइसे उटपुटांग तिहार माने जाथे जिहां के कानून बड़ा सक्त रहिथे. जतका प्रतिबंध कर्फ्यू अऊ बड़े–बड़े शहर म नइ राहय वोतना तो गांव गंवई म रइथे. जऊन दिन फांफा बराथें वो दिन गांव वाले मन म कानून समा जाथे. छेना, लकड़ी धर के तको सहर तनी नइ जा सकय. अब ए बात समझ म नइ आवय कि फांफा बरोए जाथे कि बुधरू जइसे मनखे ल बरोय जाथे, फांफा ह तिहार माने ले भगही कि दवई के छिड़काव करे ले….

अतका लिखत हवंव सबो ह शहर वाले मन बर फालतू लागही, फेर भइया मय तो गांव म रहि के ये सजा ल भोगे हवव. शहर म मान लिस त आठे, देवारी अऊ होली. शहर वाले मन ह तो आठे के दिन सिंघाड़ा, सूजी संउख ले मडि़या के पकवा बनाबे करहीं. देवारी म तो दनादन फटाका फूटबे करही. काबर कि कमई जादा तिहार कम जब तिहार कम मनाही त तिहार ले जुड़े विशेष खरचा कम होही. जिहां खरचा कम होही, बचत जादा होही. बचत जादा होही त हमर पूंजी बाढ़ही ताहन लइका पिचका मन ल पढ़ाए बर कापी किताब बिसा सकत हन. त जादा तिहार मनई ह कहां तक उचित हवय. जउन भी गांव म बनिहार–भूतिहार रहिथे वोकर दुख ह बुधरू जइसे हरय. अंकाल म नोनी ल तीजा लाएच ल लागही. मय तीजा परब के विरोध नइ करत हवंव, फेर बुधारू के बेटी ल अपन ददा के हालात ल समझ के संतोष कर लेना चाही. यदि बुधरू ह अपन बेटी ल तीजा लाए बर नइ गिस त का होइस. ओकर बेटी ल मन मार के अपन ददा के उपर तरस खाना चाही. ए बात ह एक झोक बुधारू के बेटी के बात नोहय, अइसन समस्या के भोगइया कतको बुधरू के बेटी आय.

बुधरू घलो चाहथे अपन दुलौरिन बेटी ल तीजा ला लेतेंव. साल भर म बेटी ल देखे बर मिलथे, फेर का करबे गरीबी ह रोड़ा आ जाथे. बेटी घलव चार महिना आगू ले सपना देखत रहिथे. एसो के तीजा म बिछड़े सहेली मन संग मिल लेतेंव, अऊ पीपर पेड़ म डोर बांध के झून्ना झूलतेंव. फेर का करबे…. ऐसो अंकाल परे हवय, उपराहा म गांव म रोज तिहार मनई म हालत खस्ता हो गे हवय. मय हर तीजा लेय बर नइ आ सकंव बेटी, मोर हिरदे के टुकड़ा तोला नइ देख सकंव, जब कभू पइसा सेकलाही न, त लूगरा धर के आहूं कहिके सोचत बुधरू ह घलो मने मन म बेटी ल समझावत हे….. रिसाबे झन कहिके.

बुधरू ऐसो के अंकाल म मरगे. मरबे करिस त बुधवारी तिहार के दिन. लांघन–भूखन मरगे बिचारा ह, अब तिहार के दिन मरे बर गांव म अऊ बुधरू पैदा करत हवय. बिचारी मैना ह अब तीजा घलव नइ जा सकय. अपन संगी–संगवारी मन के संग ठिठोली नइ कर सकय. साल भर के दुख ल नइ बांट सकय.

बुधारू के बेटी मैना ह दाऊ के टुरी रइतिस ते आठ पन्द्रा दिन पहिली ले तीजा जातिस. अपन मइके म संगी संगवारी के संग बजार हाट जातिस. चुरी–चाकी पहिरतिस अपन ससुरार म मैना ह लइका ल दूध पियावत–पियावत तीजा के दिन गुनत रहिगे. हे भगवान गरीबी कोनो ल भोगे ल मत मिलय. दुनिया म सब ले बड़े सजा गरीबी आय. न वोहर तिहार मान सकय, न बने लुगरा पहिर सकय, न बने चुरी–चाकी, न बने घर द्वार. वोला तो काली के काम बूता के चिंता रहिथे कि काम मिलही कि नइ मिलही. मैना मने मन गुनत रहिथे कि गांव म एको ठोक तिहार मत होतिस. नइ ते पेट ह मारे जाही. तिहार नइ होही ते कम से कम काम म तो जाबोन, दू कौड़ी कमा के लइका के मुंहु म चारा डारबोन, जऊन दिन हमर पेट भरही उही दिन तिहार हे. हम्मन तो रोज एक घांव खा के रोज उपास रहिथन तभो ले भगवान प्रसन्न नइ होवय. हो सकत हे भगवान ह हमर मन लेे रिसा गे हावय. काबर कि भगवान म नरिहर तको घलो नइ चढ़ा सकन, जब पेट बर पइसा नइ हे त नरिहर बर कहां ले लाहूं पइसा भगवान फेर तंय तो अवघट दानी हरस , हे भगवान हमु ल पइसा वाला काबर नइ बनायेस. ताहन तिहार हमु मन बने मान सकतेन. बेटी ल तो तीजा लेवा के ला सकतेन अऊ वोकर सऊंख ल पूरा करतेन. तीजा के बहाना बेटी ल साल म एक घांव देख लेतेन भगवान.

मोला गरीबी के सेती भले मोर ददा ह तीजा नइ ले जा सकिस ते का होइस, कम से कम हम्मन हमर बेटी ल तो तीजा ला सकन अतेक तो सम्पन्न बना दे. भले जादा बड़े झन बना, फेर जादा गरीब घलो झन बना. कम से कम दू बखत के रोटी ह नसीब हो सकय. हे शंकर भगवान तंय कइसे प्रसन्न होबे, कइसन उपास करंव अऊ के दिन के उपास राहंव तब मोर उपर प्रसन्न होबे अऊ मोर गरीबी ल दूर करबे. जब हमर गरीबी हट जाही तब तिहार मनाए म आनंद आही. तब कहूं हम्मन गांव के जम्मो तिहार ल चैन से मना सकथन. तिहारे मनई म हमर आर्थिक स्थिति कमजोर होवत जावत हे तेकर ले हमर आर्थिक विकास नइ हो सकय. जऊन जादा जरूरी तिहार हे, उही ल मान के खुशी के इजहार करे म का आपत्ति हे. तेकर ले कम से कम बेटी ल तो तीजा लाए जा सकत हे. कोनो बेटी ह तीजा ले वंचित मत होवय, कउनो मनखे ह बुधरू कस भूख म झन मरय.

काम के दिन काम अऊ तिहार के दिन तिहार फेर अलग से गांव स्तर के तिहार. बुधवारी, इतवारी, फांफा बरोई कतको अइसे तिहार हे जेला हम्मन रोक के खेत म काम कर सकथन अऊ खेती के काम ल बढ़ा के अपन आमदनी बढ़ा सकथन. हमर आमदनी बाढ़ही त अपन दुलैरिन बेटी ल तीजा ला सकथन अउ तीजा के बिहान दिन फरहर के दिन मन मड़ाए के लइक लुगरा दे सकथन. जेकर ले बेटी ह तीजा ल साल भर झन भुलावय अऊ अवइया साल के बाट जोहय…

(दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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