छत्तीसगढ़ी विशेष- "नान-बाबू" एकेल्ला परिवार ला सिखोदिस

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रोजीना अपन समय मा ठाढ़े मंझनिया के बेरा तियारी करत बासी बसिया पीके तियारी करइया हमर पबरित रोजगार धरइया के तोर जिनगी धन्य होगे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 15, 2021, 6:05 PM IST
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नान बाबू का नाम लेबे ततके भर मा एक स्वस्थ अउ चिक्कन तेल फूल चुपरे छै फुटिया सियान आगू-आगू रेंगत जावत हे तइसे लागथे. खखउरी मा पर्रा दाबे मुड़ मा बोहे टुकना चरिहा मा चना फुटेना रचरच ले माढ़े चले जाथे. ओला बजार हाट के दिन के अगोरा नइ राहय. रोज कमाना रोज खाना अउ हरहिन्छा सुतना बसना. खोर बाहरिन दाई दिन भर के सवांगा मा लागे राहय. सौदा के लेनदेन मा बड़का बाबू संगे संग आथे जाथे अउ मुड़ बोझा ला घलो लाना ले जाना करथे. कांवर के दारी मां कांवर घलो लेगे रइथे.

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भरे बजार मा लकर धकर रेंगना

शहर मा जा देखे हवन ऊंहा रंग-रंग के समान एके भांवर किंदर के बिसाए जा सकत हे. रोजी रोजगार धरइया ला कांही करे ला नइ परय बस अपन बिचार ला बदलके रोजी पानी के चिन्ता डाहर जाना परथे. चार दिन के रेंगई धरई मा कतको झन के दिन बदलगे हे. हमन देखत आवत हावन आजो मिहनत करइया बर काम के दुकाल नइये. सबो परिवार बर काम सकेले के काम करईया हमर नान बाबू के बड़का बाबू रचरचा के सौदा ला धरिस अउ लचकत कांवर ला बोहे लकर धकर चले जाथे. पाछू-पाछू सियान के मन अशीस देवत रेंगे रेंगे चले आवत हे. आगू पाछू सुरतावत चलत एही हरय जिनगी के सार अउ कथा संसार.
कहिबे तभे पतियाही अइसे नोहे

रोजीना अपन समय मा ठाढ़े मंझनिया के बेरा तियारी करत बासी बसिया पीके तियारी करइया हमर पबरित रोजगार धरइया के तोर जिनगी धन्य होगे. ते नइ जाने का होथे बरसा पानी ,जूड़ सीत अउ झांझ झोला. सबो दिन बर तोर अगोरा करईया अपने अपन चले आथे. चुरकी मुरकी धरे बांधे के तोर तियारी मंय काला बतावंव. कोनो दुरिहा गांव , सहर के अवइया घलो तरिया के पार ले नाहकत- नाहकत तोर व्यक्तित्व ला देखके ठोठके बिना नइ राहय. मचोली मा बइठे. एक ठन नानकुन लउठी मा फरिया बांधे माछी खेदे के उदिम करत तोर रुप रंग आपे आप मया के बंधना डोरी हो जथे. चल दिही तेनो कोनो न कोनो पईत लहुट के आहिच. एक पईत जेन आगे तोर चुरकी मुरकी मा मोहए बिना नइ राहय अइसन जादू डरइया तोर जय हो.

का रचे हे तोर रचना मा संसार



सबे जिनिस के सोंद-सोंद ममहई हा रद्दा रेंगइया ला लहुट के देखे मा मजबूर कर देथे. करी लाड़ू के पाग धरे ततके मा ठठरम- ठठरम बाजत खावत जावत खवइया ला का कहिबे. जोंधरा- जोंधरी के लाई उसने धान फोरे मुर्रा लाई अउ ओमा पुरऊनी धरे , जोरे जंगारे लइकामन के खाई खजेना तोर भारी पुछन्तर होवय. सीजन के तिली लाड़ू ला पुरोवत-पुरोवत आंखी डाहर ले खुशी के आँसू झरे ला धर लेथे. चना चबेना ला का कहिबे चल रे मन रेंगे रेंगे तहूं चाबले चार दाना अउ तर जा.

सादा सरवदा तोर चोला

मुड़ मा पागा घलो नइये सलूखा अउ धोती मा तोर सवांगा. खांद मा पटकू अरोय अउ हाथे मा तोर चांदी के चूरा अतके मा कतका मोहनी के काया. रंग तोर सांवर-सांवर गोरियाए नइ पाइस काबर के तोला बारो महिना खटाना हे. घर दुवार के चिन्हा चिन्हारी तोर भंड़वा मा फूटत-छटकत दाना के सुगंध ला का कहिबे. पारा परोसी के लइकामन रोजेच करथें तोर अगोरा. मोहल्ला मोहल्ला मा किंदरत-किंदरत तोर खोरबाहरिन घलो बेचेत जावत-आवत दिन बादर ला सकेले धरे रइथे तइसे लागथे. जीयत जिनगी मा हमला का चाही अपन छोटकुन रोजगार के जरिया तेमा घर परिवार सम्हेरे घलो राहय अउ तनिया के जेवन पानी घलो पावत राहय. सगा सोदर के मान गऊन मा कोनो कभी झन होवय अतके आस ला लेके नवा तरिया के पार मा सुखी जीवन हे नान बाबू के.
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