छत्तीसगढ़ी विशेष - भूरी भइस के छांद

.

छेरका महाजन पुछथे-कइसे करबे पहाटिया तेला तहीं बता, तोर अतेक साल के अनुभव हे, ओ समय कइसे करत रहे होबे

  • Share this:
छेरका महाजन के घर मं एक ठन भूरी भइस रिहिस हे. ओहर अड़बड़ खटकायरीन रिहिस हे दुहे के बेरा पहाटिया ला हलाकान करय. सोझ-बाय कभू दुहाबे नइ करय. जब ले पड़िया (बेटी) गुजरे हे तब ले ओकर सोग मं अउ सनताप के मारे हे, ते काकर सेती हे के, जब दुहे धरथे पहाटिया, ओहर मेछरा देथे. काहय-मालकिन मैं कइसे करौं, दुहौं ते छोड़ दौ?

ये भी पढें : छत्तीसगढ़ी कहिनी - समय के चकरी फेर घुमिस

महाजन के बिसवनतीन नांव के गोसइन रिहिस हे तौन हर कहिथे-हाय, तैं कइसे कहिथस पहाटिया, सात-आठ लीटर दूध ए तीर हे का? सेती-मेती आय हे का? संझा बिहनिया मिला के दुनो जुअर मं पंद्रह-सोलह लीटर दूध होथे. बाजार मं ओकर कीमत सात-आठ सौ रूपया के होथे, एहर कमती हे का? एला कइसे छोड़ देबों. अतेक चारा पानी खिलाथन, पिलाथन रोगही ला अउ देख दुहाय के बेरा कइसे चरित्तर करथे, मटका देथे तउन ला? नइ छोड़न बबा, तैं काही कर फेर कइसनो कर के दुह ये रोगही ला. सही रसदा मं लान.

तोला पइसा के परे हे मालकिन फेर ये तो चंडालिन परे हे, जहाँ दुहे ले धरथौं तहां ले इतराय ले धर लेथे. जब ले पड़िया का मरे हे, एकर तीर मं ओधथौ तब बघनीन सही गुर्री गुर्री देखथे अइसे लगथे जना-मना गटक जाहि का? पहाट मं लेगथौ चराय बर तिहौं दुसर जानवर मन ला कुदावत रहिथे, बइहागे हे पड़िया के सोग मं तइसे लागथे?

सही काहत हस पहटिया अपन-अपन पिलवा (संतान) बर सब ला माया मोह लगे रहिथे. महीने भर तो होय रिहिस हे जनमें. अब मरगे तौन ला का करही, ओकर सोग मं बुड़े राहत होही बपरी हा? भुलाही धीरे-धीरे कइसनो कर के. मालकिन बिसवनतीन कहिथे–पहाटिया तोला सुरता हे, तोर इहाँ पहाटनिन के पहिलावत लइका जब गुजरे (मरे) रिहिस हे तब कइसे ओला एक महिना बर मइके भेज दे रहे? गजब मं संतान मिलथे अउ उहू हा कहूँ असमय गुजर जाथे तब ओकर पीरा ला जनम देवइया महतारी ले जादा मरद मन नइ जानय, समझय.

अतके बेर बिसवनतीन के गोसइयां छेरका महाजन खेत डाहर ले आथे. लाठी, पनही अउ गमछा ला एक तीर उतार के मंडलीन मेर आके कहिथे-अरे बाई झटकिन चाहा तो बना दे. थके मांदे आय हौ खेत ले.
कउवागे ओहर कोन मरय का के मारे अउ तोला अलेना सूझे हे. तरेरे अउ कउवाय बानी मं महाजन ला ओहर कहिथे-राह, तोला ला तो चाहा पिए के रहिथे, देखत नइ हस भइस हा दुहावत नइ हे तउन हा?
खखुवाय असन काबर गोठियाथस बिसवनतीन, मैं का जानौ तोर भइस हा दुहावत हे ते नइ दुहावत हे तउन ला? मरत-खपत खेत ले आवत हौ बाई, नांगर जोत के चलौं घर जहौं तहां ले गरम-गरम चाहा मिलही फेर तोर हुरसे कस बोली ला सुन के मोर माथा भन्नागे. चाहा तो जाय चूल्हा तरी, तोर बोली तो तुतारी असन चलत हे. अइसे लागथे जना-मना कउद परगे का?

अइ हां, मैं थोरको कांही कहिथौ तब मोर बोली हा तोला सुहावय नही, तुतारी मारे असन लागथे कहिथस, तब जा बने गुरतुर-गुरतुर बोलइया पड़की परेवना, मयूर अउ कोयली सही बोलइया दुसर गोसइन बना के ले आ. महाजन ओकर ये बोली ला सुन के सट्ट खागे. पहाटिया, मालिक, अउ मालकिन के संवाद सुनत भूरी भइस ला दाना भूसा मोय के खवावत रिहिस हे, ये सोच के ओहर मान जाही तब कहूँ तीर मं ओधे ले दिही, दुहन दिही. का दुहन नइ देवत हे का रे पहाटिया भइस हा? मालिक हा ओला पुछथे.
हौ गा मेछरावत हे. ढेठी (थन) ला धरथौ तहां ले छटारा मारथे, एक दू घौं उलन (गिर) गे हौं घला. ए देख ना

माड़ी कोहनी हा घला छोला गे हे. पहाटिया के बात ला सुन के महाजन हा भूरी भइस ला तरि ले उपर तक निहारथे अउ कहिथे-ए तो अड़बड़ सीधी रिहिस हे अइसे खटकायेर कइसे होगे? कब ले अइसन चरित्तर करत हे. अइसे तो नही के कोनो मोर भइस ला नजर लगा दे होही? दुनो जुअर मिला के पंद्रह-सोलह लीटर दूध देवत सुनीन होही तहां ले ओकर मन के आँखी पटपटा गिस होही. जा तो खेलावन गउटिया नइ ते दुखु कका ला बला के लानबे उही मन अइसन के रकम ला जानथे, झाड़थे फुकथे.

इही बीच बिसवनतीन हा फेर मुंह मारत कहिथे-ये रांड़ी ला कांहीं नइ होय हे, नजर-वजर कुछु नइ लागे हे, थोरके के बहुते तहूँ हा अतेक पढ़े लिखे हस फेर तोरो अक्कल मं भूसा भरे हे. अरे पड़िया हा मरे हे न, तेकर सोग मं अभी दुहावत नइ हे. भुला जाहीं न तहां ले दुहाही बपरी हा. जीयत रिहिस हे तब तो दुहाते रिहिस हे सब के दुःख सुख ला समझना चाही. छेरका महाजन पुछथे-कइसे करबे पहाटिया तेला तहीं बता, तोर अतेक साल के अनुभव हे, ओ समय कइसे करत रहे होबे? अरे कांहीं नइ होय हे गा ये भूरी भइस ला, दुहाही, सीधा नहीं तेड़गा मं दुहाही. एकर छांद ला दे मोला, ओकर दुनो गोड़ (पैर) ला बाँध के दुहत हौं.
ले दे के कोन मेर खुटी मं टंगाय राहय छांद तेला बिसवनतीन हा लान के पहाटिया ला के देथे. ओकर दुनो गोड़ ला छांदिस. मेछरावय झन सोच के मालिक भइस के मुड़ी ला धरिस अउ पहाटिया हा दुहना सुरू करिस. थन मं दूध भर गे रिहिस हे. जब दुनो मुठा मं थन ला धरिस तब समावत नइ रिहिस हे. पहली हलू-हलू करके थन ला कोरमावत गिस फेर दुहे बर सुरु करिस. चर्र चर्र के आवाज बिसवनतीन सुनिस तब अपन गोसइयां कोती कन्नेखी मार के देखिस तब ओहर मुसकुरा दिस. दुहत ले पहाटिया हफरगे. सात-आठ लीटर के दुहइ कोनो कम बात नइ होवय.

पहाटिया के हंसी छुटगे, बिसवनतीन कोती देख के कहिथे-मालकिन अभी तो बला टरगे अब देखव संझाकन पदोथे ते का करथे? अउ अपन गोसइयां ला घला उठेवा मारे बिना नइ रिहिस. कहिथे-देखे तैं काहत रेहे न कोनो मोर भइस ला नजर लगा दे होही? अब कइसे बिना झाड़ फूंक के उही भइस हा दूध दिस, कहाँ के अंध-बिसवासी नइतो. ( डिसक्लेमर- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.