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छत्‍तीसगढ़ी विशेष: मया हे, पिरीत हे, गीत अउ संगीत हे, उछाह मंगल मनाबो, सुख सपना सजाबो

छत्‍तीसगढ़ी विशेष: मया हे, पिरीत हे, गीत अउ संगीत हे, उछाह मंगल मनाबो, सुख सपना सजाबो

बारो महिना सूरुज के पहरा अउ चंदा के घटना - बढ़ना एही हरय जिनगी के सार . कोनो तोर सेती जागत हे अउ जगवारी घलोक करावत हे.

मिहनत, मजूरी करइया के तन – मन दुनो पबरित होथे, धरती माता के सेवा जतन करके ओखरे संउपे छइहां मा सुरताले. पेज पसिया अन्न कुवांरी के परताप ले मिलथे. अन्न कुंवारी के अपमान नइ होना चाही. सीथा – सीथा के हिसाब होथे. कोन जानी कोन सीथा मा तोर भाग संवारे के वरदान छिपे हे. लिखइया तोर भाग का का लिखे हे तेला नइ जान सकस. बारो महिना सूरुज के पहरा अउ चंदा के घटना-बढ़ना एही हरय जिनगी के सार. कोनो तोर सेती जागत हे अउ जगवारी घलोक करावत हे. चंदइनी के जुगजुगी माला तोर मन मंदिर के देवता ला रिझाए के उदिम करथे तइसे लागथे. मन ठहराव बर धरम-करम के बड़ा महत्व हे. पूजा-पाठ मा जेन आनंद मिलथे तेला कोनो जनवाय नइ सकय बताए के बेरा सब्बो झन धकपका जाथें. मन लगाके रमे रा तइसे लागथे.

रोजीना के काम बुता मा मन असकटावय झन कहिके नाचा-देखन करइया मन गीत-संगीत मा संदेशा देहे के काम करथें. समूह मा अपन गुनगुनहा मन ला संधार के झूमत रा. नोनी-बाबू, घर-परिवार, सगा-समाज सब्बो के मनोरंजन बर प्रकृति हा उपहार सहित कतको साधन दे हावय. मनुष्य अपन कला ला उजागर करे बर कांही-कुछु के निरमान मा लगे रथे. किसम-किसम के बाजा-गाजा चाम ला मड़ा के कइसे ढोल-ढमाका बाजथे. तार ला कसे ततके मा झन्नाथे तन-मन. झन झटक पुदक, झन-झटक पुदक कहिके संदेश देवत हे. गीत के रस मा अन्तस घलोक भीज जथे. गीत ला कहूं संगीत मिलगे तहां का पूछत हस , सब्बो कोती उछाह हो जथे . छत्तीसगढ़ के लोक – संगीत , मीत – मितानी के गीत रमणीक लागथे. शरीर के थकान ला अइसे चुरो देथे संगीत हा के सुवाद मा ममहाती बेरा घलोक ढरके बर भुला जाथें.

सब्बो देश-प्रदेश मा अपन-अपन साधन, सुविधा के हिसाब से गीत-संगीत. हावय. सुख-दुख, मया-पिरीत के काये आना-बाना लगे रहिथे. लेकिन जीवन के आधार कभू झन डोलय बने चमचम ले माड़े राहय, तभे तो जीवन-आनंद घूम फिर के आही अउ हमन उछाह मंगल मनाबो. जीवन-संघर्ष मा नर-नारी, नोनी-बाबू सब्बो ला लगे रहना परथे. मनोरंजन झोकइया अउ पोसइया दूनो हमर समाज मा हावें. खेल-खेल मा कतको आनंद पाथें, कतको आनंद ला देखके आनंद पाथें. सीमा पार मा घलोक आनंद उछाह होवत होही तेनो ला हमर संस्कृति मा सम्मान देहे के शिक्षा मिलथे. काल गणना मा हमर भारत भुंइया सब्बो जनम मा श्रेष्ठ माने गेहे. नृत्य, गीत, संगीत मा हमर संस्कार अउ पूजा पद्धति के संगे-संग सदादिन के मिठास छबाय माढ़े हे तइसे लागथे. समय मा काम, काम के दाम फेर गीत संग ताम-झाम एही हमर रीत हे, मया-पिरीत हे गीत-संगीत हे .

कोनो नइये काल के पुछइया,
धन दोगानी धरे रिही आ जही लेवइया
बारी मा पताल बोले
आमा मेड़ पार बोले
रुख – राई जाम जही बनजा तें पोसइया
कोनो नइये काल के पुछइया …

Tags: Chhattisgarhi, Chhattisgarhi Articles

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