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छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: थोर बहुत टुहुल-टाहल करते रहना चाही, फुरसुधहा लागही

छत्तीसगढ़ी विशेष

छत्तीसगढ़ी विशेष

हपता नइते पंदराही मा शहरिया मन असकटाके गांव कोती जाए के जोखा मड़ाथे. होटल बासा कतको होगे फेर उही तीर के गांव मा घलो अइसे कुछु करे जाए के दू चार परिवार के रोजी पानी निकल जाए चुल्हा लकड़ी छेना आगी एमा रांधे गढ़े बर आजो हमर गांव जाने जाथे.

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सबो जगा देखले एक्के बात अपन आप ला एके जगा टांग के झन राख।समय के साथ चलना हे ते बने बेरा देख के जांगर ला चलावत रा. कमाई धमाई काहीं नइ चलय अइसे कहिके कतको झन धरे भितरी परे रथें. नारी परानी ला देख होत बिहिनिया ले खटावत-खटावत वोरे सकेले के बेरा तक सांस लेहे के फुरसत नइ राहय. कांही न कांही खंगेच रइही तुहर सेती रोना रोवई ला अबड़ तापथे बपुरी मन।का होगे हमर गंवई के रद्दा चिन्हारी. शहरिया मन गांव मा आके बने पिकनिक मनाथे. चुल्हा आगी नइते गोरसी आगी के अंगाकर उमन ला अबड़ मिठाथे,बस अतके मा दिमाग लगाए के काम हे हमर देसी रोटी-पीठा,खाई खजेना के कहूं प्रचार हो जावय त गांव-गांव मा पिकनिक मनइया आहीं. हपता नइते पंदराही मा शहरिया मन असकटाके गांव कोती जाए के जोखा मड़ाथे. होटल बासा कतको होगे फेर उही तीर के गांव मा घलो अइसे कुछु करे जाए के दू चार परिवार के रोजी पानी निकल जाए चुल्हा लकड़ी छेना आगी एमा रांधे गढ़े बर आजो हमर गांव जाने जाथे. गुंगवावत हे तभो ले आखिर मा पलथिया के खवई के मजा कुछु अउ होथे. माटी के कनउजी, कराही, दुहना अउ भात रांधे के मरकी के अपन अलग पहिचान हावय. थारी लोटा गिलास सबो धोए मांजे चकचक ले खपलाए माढ़े हे देखबे ततके मा भूख हा खटा जथे.

2.बड़हर मन मिहनती होथें
खाता-पीता घर के अपन अलगे बेवस्था होथे. कोनो कोनो घर देखले बारो महिना सगा पहुना के आना जाना लगेच रइथे. रउताइन आछा पहिरे पानी भरे जावत हे. रंधइया अपन अलगेच लगे हे. ताते-तात दार भात अउ साग चटनी अउ कांही कुछु मिलगे ते का पूछना हे. कुल मिलाके देखले काम बुता अउ खवइ पियई के बीच मा अइसे तालमेल बइठे हे के दिन हा जनावय नही कभू-कभू तो दिन घलो छोटे परेला धरलेहे तइसे लागथे.

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3.देह पांव के मजबूती

उम्मर ला हिसाब ले अइसे कहिबे ते पतियावय नहीं तिहीं बता अइसे कहिके मसमोटी मड़ाथें. बारो महिना टुहुल टाहल करइया देहात के अदमी इहां के हवा पानी अउ मार रगरग ले तरिया मा डुबक-डुबक के नहवई ला का कहिबे सिरतोन देखइया मन ला अजम नइ होवय. खाए बर कोहकोंह ले अउ बुता करे मा रगड़ के. बासी खाए के बेरा फिक्स हे।पसिया के संगे संग सीथा ला चिभोर-चिभोर के डपट के मजा उड़ा. सबो सादा नून मिरचा अउ पताल होगे जोखा रमंजले ततके मा मजा आ जथे. कमिया मन के भूख ला खटावय झन कहिके कमइलिन पेजहारिन अपन टाइम ला झुकोवय नहीं.  घरउधिया बुता काम ला सकेलत सकेलत बासी अमराए बर धकर लकर घलो हो जथे. घर परवार ला घलो देखना।कपाट बेड़ी, कोठा बारी सबो डाहर के चिंता तभो ले सब फिक्स हे. घड़ी देखइया देखलय पेजहारिन अपन टाइम मा निकलगेहे. अउ एक ठन बात टुहुल टाहल केहे मा धियान मा आथे. कतको घर मा घरे के बुता हा बेरा के चढ़त ले सिराए नइ राहय. नहात खात कोनो डाहर जाए. संजकेरहा हो जाही कहितेच हे अउ जेंय खाए के बेरा मुखारी चाबत तरिया जावथें. एला कथें धरती के कमऊ पूत जेन अपन जांगर के चलत ले अतरी नइ परन देवय. कांही नइते छोले चांचे के बुता मा अपन लगे रथे इही हरय हमर जिनगी जेमा ए सरीर अपन उम्मर ला जनवावय नहीं. थकासी लागथे,लागही कइसे नहीं एक दिन तो सबो बर तियारी करनच परथे फेर तभो ले टुहुल टाहल करतेच रहना चाही. समय अपन काम मा लगे हे हमूमन लगे रहन तभे बनही. जोड़ तोड़ मा जिनगी नइ चलय. सबो ला अपन पुरखा के बताए रद्दा मा चले ला परही.

4.दुवा भेदी झन होवय

कोनो दिन के सेती होवय तोला आजेच ला लेके चलना परही. देस होवय के परदेस सबो जगा अपन पहचान राहय हमर कमजोरी हर सबले बड़े हमर दुसमन हरय कभू झन अलगियावव काबर के अलगिवाव के सेती समाज मा दुवा भेदी जग जाहिर हो जाथे. केहे के बात ए अल्लर झन परब मड़ियाके खावव अउ अंड़ियाके रेंगव काबर के मानव तन हा बार बार नइ मिलय.

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