छत्तीसगढ़ी विशेष : लकर - धकर मा सब जतर - कतर हो जथे

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कहां के रिस ला कहां भंजावत हे तेला कोन जानही. बिना मुंह के गायगरु घलो अपन बेवहार ले चेतावत रइथे ओला कखरो का परे हे अपन रद्दा आवत हे अउ अपन रद्दा जावत हे तभो ले ठठइया ठठावत हे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 2, 2021, 12:09 PM IST
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बने थीरबांह लगाके कांही बुता ला करबे तभे सिध परथे. पहली ले तियारी होना चाही. बने बिचार के अपन गोठ ला लभाना चाही काबर के गोठ बात मा घलो लकर लइया के झलक मिल जथे. अपने अपन सपनाए मा कुछु नइ मिलय. मन भितरी मा काय चलत हे तेला मुहरन मा झांकबे ततके मा जान डारबे तेखरे सेती केहे गेहे मन मलिन नइ होना चाही.

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कोन काय करत हे देखव चारों मुड़ा

चरबत्ता करइया अउ गुनइया दुनों एके जगा सकलाइन अउ सोचे लगिन. सोंचत - सोंचत पहागे फेर कांही रिजल्ट नइ पाइन. सबो किथें अउ सबो सुनथे अइसे कभू नइ होवय. सुनइया घलो असकटावय झन अइसे गोठ करना चाही. चारों मुड़ा ला संघारे असन सियानी रद्दा हमला बने चतवारे के उदिम करइया जनवाथे तभे जनाथे के हमला कोन रद्दा मा चलना चाही. अपने अपन घेक्खराई करई घलो बने नइ होवय. करनी अउ संघरनी मा परिवार के हिस्सा घलो हमला समरथ बनाथे. अभी घलो कांही नइ बिगड़े हे चलव हमन चारों मुड़ा ला बने सगियान बनावन
हकरस ले कांही कहिदेबे बने नोहय

कोनो डहर ले आए कोनजनि का दुख ला मुड़ मा बोहे आए हे. सुरताएच नइ पाइस अउ हकरस ले गोठ बात ला ओखर कान मा परही त ओला कइसे जनाही तेला जानना जरूरी हे. पहटिया हकाहक गरुवा ला ठठावत राहय अउ आंय-बांय चिचियावत राहय. आंय बांय चिचियाई घलो बने बात नोहे. कहां के रिस ला कहां भंजावत हे तेला कोन जानही. बिना मुंह के गायगरु घलो अपन बेवहार ले चेतावत रइथे ओला कखरो का परे हे अपन रद्दा आवत हे अउ अपन रद्दा जावत हे तभो ले ठठइया ठठावत हे. अइसने आजकाल मनखे घलो हो जथे तेला बिचारना चाही. बिचारे मा का टाइम लागही. फेर थोरकिन लागहिच ते का भइगे अपन गुनई ला ते काबर छोड़े ते जान. मुड़पीरा के ओखी लगाए कलेचुप रेहे रा. हकरस - भकरस मा कतको काम बिगड़ जथे.

लउहा लेवइया के चितभंग हो जथे



कतकोझन कलासे असन रेंगत दिख जथें. एही हरय अपन बांटा के परेम. परेम मा कतको झन के मन ला जीते जा सकत हे. लउहा लेवइया के गोठियाई घलो करूवाए असन लागथे. चलव अपन सुमिरन मा गवाही धरके अपने मन मा सुरतावन नइते बनत काम घलाव अपन समे मा बिगड़त जावत हे तइसे लागे लगही. कोनो दिन अइसे नइ जावय जेमा रंग - रंग के बिचार नइ उमड़य. बिचार ला बांधे मा सरी उमर लग जाथे. उमर अपन अगोरा मा कोनो ला नइ राखय बाढ़ते अउ बाढ़तेच जाथे. कोनो नइ रेंगय. संगी संगवारी के दिन रेंगही. रेंगे बर तोहिच ला परही तभे नवा सुरूज के दरसन होही. अगुवाए के फेरा मा चितभंग होए के डर समाए रथे. पाप ला मुड़ मा बोहे के दिन किंदरथे.

चलही तोरेच ते जान डारबे

हमूमन ला अपन लकर लउहा ला तियागे ला परही. कोनो कांही कहिदिन ते ओतका बेर टारदे पाछू अपने - अपन सब बने लागे ला धर लिही कोनो जोजियावत ले परे - परे गुनत रइथे अउ कोनो ला जोजियाएबर नइ परय. सब गुनवान अपन समय मा अपन करत धरत निकल जथें अउ पता घलाव नइ चलय. लकर - धकर काए. काम के न काज के. बने - बने मा घलाव जतर - कतर के होवई ला कोनो नइ भावंय. अपन भावना मा सबो रकम के बात आत जात रहे इही मेरन हमर निरनय सही होना चाही तभे अवइया दिन के अगोरा रतिहा नींदभर सोए के जुगत मड़ाही.  ( डिसक्लेमर – लेखक साहित्यकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं.)
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