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छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- रंग महल मा राहव मालिक जीयव लाख बरीसे

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धरती माता के कोंख मा सुख शांति के संस्कार हावय. हमन अपन सेती कतको सुख ला भोगत आवत हन त दुःख ला घलो जाने समझे मा कमी नइ होना चाही.

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लोक परंपरा अउ अपन संस्कृति के रखवार मन आजो अपन तीज तिहार ला जोर सोर से मनाथें. अपन मालिक ला असीस देवत नाचत गावत झुंड मा झांझ मंजीरा आजो गमकत मिल जाथें. अइसन हे हमर संस्कार अउ संस्कृति चाहे कोनो राज राहय चारों कोना मा हमर संस्कृति के रखवार अपन काम बुता के संगे संग मनोरंजन के सेती समय ला घलो संधार के जीयत जागत रइथें. नानपन ले संगी संगवारी संग सबो जगा खेल मताए अउ जगाए रेहे के परंपरा घलाव देखे मा आथे.

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ईही ताय जेकर आजो पोषण करइया हांवय
दुनिया चलथे त चलइया घलो कोनो होहिच. चलायमान संसार मा जुगत लगइया घलो दिख जाथें. गनती के मनखेमन अपन सुवारथ के खातिर कतको अनवर वाले गोठ बात तको करथ दिख जाथें. जेन पायके धरे सकेले रेहे तेने आज तोर दया मया के सागर बन गेहे. सकेले धरे बर घलो गुन होना चाही. कमई धमई अपन जगा बरोबर हे फेर बचाए धरे बर सुनता अउ सलाव चाही घर परिवार मा सुख शांति बर बारों महिना नियम धरम के पालन होना चाही. धिरलगहा कलासे असन सुघ्घर बुता जोंगइया अपन जग जंवारा के आजो संवागा करत रइथे. जगत के पालन हार के आजो पूजा होवत हे अइसने चलत रईही तभे जग कल्याण होही तेखर आज जरूरत हे .

दुख – सुख कइसनो होवय चलत रहय
मालिक अउ नउकर के बीच कभू दुराव छिपाव के भाव झन जागय. बनिहार के सेती सबो हरे खंगे के आपे आप पूर्ति होवत हे. कभू नइ जानेन तइसन जमाना देखे बर परगेहे फेर थोकिन जागे के देखव जेन बेवस्था ला अपनाके चलथें तेन आजो उही संसार मा जियत हें तइसे लागथे. प्रकृति के जेन जुड़ाव राखही तेन सदा दिन सुख के छइहां मा रइंही अइसे हमर ज्ञानी विज्ञानी मन कहत अउ चेतावत आवत हें तभो ले निसमुढ़ मनखे अपन करनी मा नइ अपनावत हें तेकरे सेती रंग – रंग बिमारी घोर घोर के घेरी पईत उम्हियाए बर तियारी करत रइथे. थोरेच कुन फरक परगे ततके मा कतक जियानथे. सुकाल दुकाल सबो जुग मा आइस अउ गिस फेर संसार अपन चलन ला नइ छोड़िस. गुजारा होवत राहय बस अतके मा संसार हे.

सुख शांति के पोषक संस्कारी धरती
धरती माता के कोंख मा सुख शांति के संस्कार हावय. हमन अपन सेती कतको सुख ला भोगत आवत हन त दुःख ला घलो जाने समझे मा कमी नइ होना चाही. असीस देए मा कतका सुख समाए हे तेला जानके अंतस घलो जुड़ा जथे. त चलव अपन लोग गाथा ला सरलग बोवत चले जाए. ( डिसक्लेमेर – ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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