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छत्तीसगढ़ विशेष: कहां गै नांगर, कहां गै बइला?

छत्तीसगढ़ विशेष.

छत्तीसगढ़ विशेष.

पानी गिरय तब लइकापन मं गीद गावन, नाचन कुदन-“नांगर बइला बोर दे, पानी दमोर दे”. फेर आज देखत हन, न पानी बादर के ठीक ठिकाना हे न नांगर बइला के. कहां गयै वो नांगर के जब पानी गिरतिस तब किसान नांगर ला खांध मं बोहे, तुतारी धरे अउ आघू-आघू बइला ला हांकत खेत कोती जाय अउ पाछु-पाछु मुड़ी मं धान बोहे ओकर गोसइन रेंगत जाय.

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ओ दिन नंदागे, गुजरगे, बीतगे जब असाढ़-सावन मं पानी बरसना शुरू होवय तब छह-सात दिन के झड़ी मात जै. नंदिया, नरवा, तरिया खेत-खार चारो कोती लबालब पानी दिखय. जिहां के मनखे तिहां छेका जाय. नंदिया-नरवा मं अतेक उड़ेरा पूरा आ जाय ते डोंगा(नाव) घलो नइ चल सकय. कहूं कहूं तो डोंगा बोहा जाय, उलट जाय तब ओमा बइठे लोगन मन कतको तो बोहा जात रिहिन हे तब कतको तउर के बाहिर पार निकलय, अपन परान बचावय. आज कहां गुजरगे वो दिन सपना होगे? कभू लहुट के आही ते नइ आही तेकरो कोनो भरोसा नइहे?

अब तो अइसे दिन आगे हे ते असाढ़-सावन के महिना बुलक जथे फेर पानी के कहूँ शोर नइ मिलय? कोनो मेर बरसथे, कोनो मेरे नइ? कहूँ दमोर के बरसथे तब कहूं निरमामूल बरसबे नइ करय? का होगे समे ला, का सकरायत झांक दे हे ते ओला घोड़ा करायत डस दे हे ते हांक फूंक नइ लागे बरोबर उकरो परान छटक दे हे ते पानी गिरे के नाव लेबे नइ करत हे?
अइसे बात नइहे के बादर नइ आकास मं लहरावय, करिया-करिया घटा अपन संग मं लेके आथे. तब अभे बरसही तभे बरस जाही तइसे लागथे जरूर, फेर छिन भर मं हवा ओला कोन कोती धकिया के ले जथे के फेर ओहर लहुट के नइ आवय. किसान माथा धर के बइठ जथे, ओकर आशा निरासा मं बदल जथे.
का होही पानी बादर के ए तो अब हर साल के किसान मन के रोना होगे हे. प्रकृति घला रिसागे हे, उहू ढेरिया दे हे. मन होथे तब बरस देथे अउ नइ होवय तब कलेचुप आखी कान मूंद के सबके तमाशा देखत रहिथे. आखिर मं मरना तो किसान ला हे. बिन पानी के जग सुन्ना कस हो जथे ओकर मन बर. का होही कहां जाही तेकर कहूं ठिकाना नइ लगय. वाह रे जमाना, तैं कइसन दिन देखे बर कर देस, का दिन ला देस, सब के करलई होवत हे.
कभू कभू अइसन लगथे जउन होवत हे तेन सही होवत हे का? जब प्रकृति के सब नियम ला मनखे मन उझारत अउ टोरत जात हे, कोनो एक बात अउ नियम ला नइ मानत हे तब उकरे का गरज हे? जा नइ गिरावन पानी कही के उहू हा अड़िया के बइठ गे हे. अब एही सब धपोर दे हे पानी के बिगन. सही बात तो आय ओकर रिसई हा. पहिली सब गांव-गांव मं बिन केहे, जोजियाय पेड़ लगावय. अब तो कोनो लगाबे नइ करय. कोन जनी का सांप सूंघ दे हे ते. अउ जउन पहिली ले पेड़ लगे हे तउन ला अंधाधुंध काटत जात हे. जंगल के जंगल साफ़ करत हे, तब अइसन मं भला पानी कहां बरसना हे.
अभी तो ओ दिन अखबार मं पढ़े ले मिलिस के एक जगह हीरा खदान के पता चले हे सर्वे मं. अउ वो हीरा ला खोजे खातिर हजारो पेड़ ला काटे के तइयारी करे जात हे. अभी परयावरन विभाग हा वो हीरा कंपनी ला अनुमति तो नइ दे हे फेर अइसन चरित्तर ये देश मं होवत हे. अरे भाई हीरा निकाले खातिर हजारो पेड़ ला काटना हे ओकर पहिली ओतके कन पौधा तो लगा लौ, पेड़ तइयार कर लौ. सरकारे हे कतेक ला धियान दिही, जनता ला घला चेत करना चाही, बिरोध करना चाही. पेड़ सेती-मेती मं चट मंगनी पट बिहाव असन एक दू दिन मं तइयार तो नइ हो जवय. बहुत मेहनत अउ तपस्या करे मं एक ठन रूख(पेड़) तइयार होथे. काटना आसान हे फेर तइयार करना ओतके मुस्किल हे.
पानी गिरय तब लइकापन मं गीद गावन, नाचन कुदन-“नांगर बइला बोर दे, पानी दमोर दे”. फेर आज देखत हन, न पानी बादर के ठीक ठिकाना हे न नांगर बइला के. कहां गयै वो नांगर के जब पानी गिरतिस तब किसान नांगर ला खांध मं बोहे, तुतारी धरे अउ आघू-आघू बइला ला हांकत खेत कोती जाय अउ पाछु-पाछु मुड़ी मं धान बोहे ओकर गोसइन रेंगत जाय. किसान ददरिया गावय तब गोसइं राग धर के ओकर संग गुन गुनावय. ओ सब दिन अब गुजरे जमाना के बात होगे. अब तो नांगर के जघा ट्रेक्टर आगे हे. झटक ले हे नांगर बइला ला. कहां गै नांगर अउ कहां गै बइला. बदल गे जमाना, बदल गे किसान अउ बदल गे सब खेती के रकम, रीति नीति. उही पाके प्रकृति हा घाला देखावत हे ठेंगा, पदोवत हे रोवावत हे.

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