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छत्तीसगढ़ी विशेषछ भीड़ भड़क्का बजार हाट मा काय बिसारत हन अइसे मा कइसे बनही बता तो भला

साधन के कमी राहय त कोस दू कोस हा घलो दुरिहा लागय.

साधन के कमी राहय त कोस दू कोस हा घलो दुरिहा लागय.

समय अपन सीमा ला टोर डारे हे. अब तोर बनाए अउ बिगाड़े के दिन गय. पहली पहाती निकल जावत रेहेन अब घरो घर चिंता हा पहावन नइ देवत हे. समय काल बनके पाछू परगेहे. हमन थोरकुन बिलम के सोचबो तभे बनही.

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रायपुर. सबो जनम के सेती एदरी कोजनी काली का होही अइसे सोच हमर दिमाग मा किंदरत हावय. जाने सुने रहिबे तभे चेतलगहा कमाए खाए के दिन बने बने दिखही. घेरी बेरी घोरत हा मानुस तन ला ए जिनगी के अधार हा. सबो कोती एके बात का होही अवइया दिन मा. अवइया दिन बर धरे सकेले के बात घरो घर चले लगिस. फेर काला धरबे अउ काला सकेलबे. कहइया कहत - कहत थक जाही फेर सुनइया के धियान नइ धरय. सब बने चलत रइही अइसे कहिके कहइया के मन बारो महिना दउड़त हावय चारों मुड़ा काम नइये अउ काम हावय त ओखर पुरती दाम नइये. सबो ला अपन परिवार के चिंता हा खावत हे. कोन डहर ले काय कर डरी अइसे बइठे सपना के देखइया बेरा कुबेरा घलो नइ चिन्हत हे.

आंसो के दिन बादर ला कइसे सकेलबो
दिन कहिके नइ आवय फेर बुता तियारे बिना काम घलो नइ चलय. गांव - गंवतरी डहर अपन सपना ला बोवइया सरलग बोवत जावत हे शहर के सुरता मा सबो जिनिस के उपजइया अपन तन मन धन लगाके पुरोतेच हे तभो ले ऊंखर मन डर समाएच रइथे. डरभुतहा जीव के का कर लेबे धिरलगहा घिलरत रइथे अउ पुरोवत रइथे. हमी हम रहिबो तेनो बने नइ होवय सबो झन के सेती सबो काम होना चाही. पहली अलदा - बलदा के जमाना रहिसे तेन फेर लहुट के आगे हे तइसे लागथे. कम अबादी अउ कमइया धमइया के अजादी इही हम पुरखा के चिनहा जानके आजो हमनला ओइसनहे जुगत लगाना परही. कमाओ मन के अउ खाओ तन के. कम से कम मा गुजारा अउ बीमारी दुखी मा सहारा वूही अब सुरता मा लेके चलना परही बने बने मा सबो बने लागथे. दिन बादर अपन समय मा चले आथे सोंच ला उजागर करव अउ देश दुनिया ला सब झन जानव तभे सुरता के आंखी मा नींद परही नइते चलतेच हे तेन चलतेच रइही.

सेती मेती के जमाना गय एकेल्ला होगे हन
पहली चारों मुड़ा अपन - अपन जोखा मड़ाके राखे राहन. रीत नीत के रद्दा मा चलना हमर धरम राहय. अबतो रीत नीत घलो सिराती आगेहे तइसे लागथे. सनन सनन पवन झकोरा मारत हे , गली गली गोहरावत हे कोनो पुछइया नइये. सबो अपन अपन घर मा सपटे हावंय. कोठी मा धान नइये. चांऊर बर लाइन लगाना परथे. नेवता देवइया अब ढिरियाए असन होगे हें. ककरो चलतेच नइये. जेकर सेती चलय जमाना तेखर मति छरियागे हे. का कहुं डाहर ले कोनो आहीं अउ बताही के ये दिन कतका दिन के अगोरा मा हावय. लहरा मार के तिरियाने वाला सइघो लिल डारथे. एके झन होगे हन भीड़ मा का करबो.

दुरिहा के रहई घलो संदेश देथे
साधन के कमी राहय त कोस दू कोस हा घलो दुरिहा लागय. रेंगत हपटत कइसनो करके अवई जवई लगे राहय. तीज तिहार , बर - बिहाई , हंसी खुशहाली मा सकलाए सगा सोदर बने बिलम के जांवय. मान गऊन मा कोनो कमी नइ राहय. अउ आज बेरा कुबेरा घलो नइ चिन्हावय. आठो काल बारो महिना तोर आरो लेवइया के कमी नइये. बात रहत सकलाए सगा के ते का कर लेबे. छट्टा छट्टा में रेंगई अब बजार हाट में जवई मा सामिल होगे हे. पहली जमाना मा ए अनुशासन रिहिस फेर आज के जरूरत के सेती सबो भरभरा के भोसकत हे तइसे लागथे , अइसे मा कइसे बनही बतातो भला.

( डिसक्लेमर – लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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