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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- राखी बांधे बर बहिनी मइके आही, रक्षाबंधन के धरम ल भइया निभाही

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रक्षाबंधन के तिहार ल श्रावण मास के पूर्णिमा के दिन बड़ा धूमधाम ले मनाथे. रक्षा सूत्र ल ही रक्षाबंधन केहे जाथे. रक्षाबंधन ह वेद के संस्कृत शब्द 'रक्षिका’ के अपभ्रंश आय. रक्षिका के अर्थ-'रक्षा करे खातिर वचन देवई’ आय. राखी तिहार के परम्परा कब ले चले आवत हे एमा विद्वान मन के अलग-अलग मत हवय. कोनो विद्वान कहिथे-ए परम्परा ह राजा बली के समे ले चले आवत हे. जब राजा बली निन्नाबे जग पूरा करके सौवां जग पूरा करे बर बइठिस तब गुरू शुक्राचार्य ओला ये न बध्यो बली राजा... मंत्र ल पढ़ के रक्षाबंधन बांधिस. जउन मंत्र ल आज भी पंडित मन रक्षाबंधन बांधे के बेरा म पढ़थे.

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रक्षाबंधन तिहार (पर्व) के संग कतनो ऐतिहासिक अउ पौराणिक कथा जुड़े हे. जइसे एक घाव देवता अउ राक्षस मन के युद्ध होइस. युद्ध म देवता मन हारे बर धर लिस. तब गुरू बृहस्पति के सलाह के मुताबिक राक्षस मन ल हराये खातिर इन्द्राणी ह मंत्र तंत्र अभिशक्ति युक्त धागा दिस. जेकर से देवता मन ल युद्ध म विजयश्री मिलिस.

पौराणिक कथा के मुताबिक अइसे केहे जाथे एक घाव बामन अवतार म भगवान विष्णु जी ल राजा बली करा दास (द्वारपाल) बनके सुतल म रेहे बर परिस. बहुत दिन बीते के बाद भगवती लक्ष्मी जी ल चिंता होइस. भगवान विष्णु जी ल खोजे बर लक्ष्मी मइया ह सुतल लोक पहुंचिस. उहां जा के देखथे त भगवान विष्णु जी ल अपन वचन के पालन करे खातिर राजा बली के सेवक बनके रेहे बर परत हे.
एला देख के माता लक्ष्मी जी ह राजा बली ल रक्षा सूत्र रूपी राखी बांधिस तब राजा बली ह माता लक्ष्मी ल किहिस-बहिनी उपहार के रूप म आज तोला जउन मांगना हे मांग ले, मंय जरूर दुहूं. तब माता लक्ष्मी किहिस-भैया मोला कुछु नइ चाही बस आपके ए सेवक (द्वारपाल) ल दे दे. एकर बाद राजा बली ह भगवान विष्णु जी ल दासता से मुक्त कर दिस. तिही दिन ले बहिनी मन अपन रक्षा खातिर भैया मन ल राखी बांधे के परंपरा शुरूआत होइस हवय.

पहिली तो पंडित मन घर-घर जा के रक्षा सूत्र ल बांधय. ओकर अवेजी म पंडित जी ल सब उपहार देवय. अपन रक्षा खातिर घर म, गाड़ी म, मोटरसाइकिल म राखी बांधथे. धार्मिक ग्रंथ मन म घलो राखी ल लगाय के परम्परा चले आवत हे. पहिली तो राखी तिहार ल सादा नरबदा मना लेवय फेर समय के संग आज राखी तिहार ह भव्य रूप ले ले. राखी तिहार के अगोरा सबो भाई बहिनी मन ल रथे. राखी तिहार ल तो बहिनी मन अगोरत रहिथे काबर कि बहिनी मन अपन भाई ल राखी बांधे बर मइके जाथे. जेला साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर ह गीत म बहुत बढ़िया वर्णन करे हवय –

फूलगे य फूलगे य, फूलगे य चिरइया
मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया
राखी बांधेे बर, बहिनी मोर आही
भाई-बहिनी के धरम ल निभाही
अंगना म चिहुकत हवय य चिरइया
मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया.

धरती मइया कस थारी सजाहूं
सुरूज नारायण कस दीया जलाहूं
माथे म सगुन के तिलक लगाहूं
हाथे म असीस बर नरियर धराहूं
अमरइया म कुहु कुहु कुहकय कोयलिया
मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया.

हाथ म चंदा कस राखी चमकही
नदिया नरूवा कस मया कुलकही
जंगल झाड़ी मन नाचही करमा
खुशी के सागर ह आही घर-घर म
बाजा बजाही दुम दुम कारी बदरिया
मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया.

असीस दिही बड़े भइया मोला
मंय असीस दुहूं छोटकू भाई तोला
भाई के राहत ले नइ राहय फिकर
गजब दुख होथे, भाई नइ राहे जिंकर
अजर-अमर रहे भाई-बहिनी के मया ह
मइके म जोहत होही, मयारू मोर भइया.

(दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Articles in Chhattisgarhi, Chhattisgarhi, Raksha bandhan

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