छत्‍तीसगढ़ी विशेष: भादयीं क मांड अउर सावा टागुन, अभाव आ रोग दुनो क इलाज

अब समय अईसन आ गईल बा की लोग फिर से टागुन, भदई, सावा खोजत हवें.
अब समय अईसन आ गईल बा की लोग फिर से टागुन, भदई, सावा खोजत हवें.

भदयीं धान के एगो प्रजाति ह, इ बूढ़ बुजुर्ग के भी वही आसानी से हजम होत रहल हा अउर कम पानी में पैदा होत रहल ह. यही के संगे सावा अ टागुन जवन अब हेल्दी फूड कहल जात रहल ह उहू येही टाइम होत रहल हा. इ सब कुदरत के वरदान रहल हा किसानन खातिर.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 30, 2020, 2:28 PM IST
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दयीं, धान क एगो प्रजाति ह. इ तनी जल्दी पक जाले, मतलब की भादों में खाये लायक हो जाले. वोइसे त आप देखब की धान क बाकी फसल कुवार की आखिर में पकेले. भादों में ओकरा में बढियां से रेणा लागेला. लेकिन भदयीं तबले खाये लायक हो जाले. एकर कवन फायदा ह? जल्दी पाके चाहे देरी से, एकरा से केहू का मतलब बा? इ समझे खातिर तनी पीछे जाएके परी.

जब देश में ‘हरित क्रांती’ ना भईल रहे तब केहुके केतनो खेत रहे, भर पेट खाना मिलल मुश्किल रहे. गांव/जवार में बहुत कम लोग रहलन जिनका घरे साल भर क खर्ची रहे. एसे की तब पैदावार बहुत कम होखे. खेत ऊसर ढेर रहें. जेवन रहबो कईलन ओकरा पानी की आभाव में फसल बढ़िया ना होखे. इनार और तलाव से पानी आवे के रहे. सुख जाय त काम ख़तम. आज समझल जा सकेला की टरेन से पानी भेजे के परत बा. टीवी/अख़बार में केतन कुछ बोलल/लिखल जात बा. तब त केहू के कुछऊ पता ना चले, सूखा, बाढ़ कहनी में मिले, देखेके कमे मिले. लेकिन आज त तकनीक की वजह से हमनिक एक-एक क्षन क खबर पावत बाड़ी जा.



ओ जमाना में बढ़िया खाद पानी क अभाव में फसल चउपट हो जाय सो. अईसन समय में भदयीं जईसन जल्दी आउर कम पानी में पके वाली फसल लोगन के जीवन क असरा रहलिन स. भदयीं क खसियत इ रहे की जल्दी हो जाय. कम पानी कम लागे. उचास माटी में आसानी से पैदा होखे. इ जिउतिया की तेवहार ले तइयार हो जाय. लोग जिउतिया में माड़ चढ़ावेला. जेकरा घरे चाउर खतम हो जाय, ओकरा के भदयीं क फसल परसाद बनावे के काम आवे. हमार माई बतावे ले की भदयीं क माड़ बहुत मीठ होला. एकर चूरो बढ़िया होला. सुवाद आउर गंध त बहुते सुघर आवेले.
भदयीं क चाउर ललछाहूँ होला. भात बनले पर दू रंग क दिखेला. बस इहे ह कि तनी एकरा के पीटे में मेहनत ढेर लागेले. दूसर धान मतीन ओकर बाल बहरे ना निकलेले. इ रेणा में पक जाले. बाकी धान मतीन एकर बाल पकले की बाद बहरियाले नाहीं, लेकिन रेणा क मुंह खुल जाला. जईसे की कपास क खुल जाला, ठीक ओयिसहीं एकरो खुल जाला. त एकर छोट-छोट आटी बनाके, बाल के मुठ्ठी में लेके डंडा से पीटे के परेला, चाहे पाहिले गोफा में से बाल बहरे निकाले के परेला फिर सटकल/झारल जाला. अब आप सब त जानीलां की घरे में खर्ची ना रही, लईका/छेहर भूख की मारे रोवत रहिहन स त, एतनी मेहनत केतना बाउर लागत होई. लेकिन भदयीं गरीबन क एगो आस रहे की पाकी त भरपेट खाए के मिली.

भदयीं की संगे एगो आउर फयदा रहे. जईसे कि एकरा के पीटले की बाद घाम में सुखवे खातिन ना सोचे के परत रहे. लोग कराही में डाल के उलय देत रहें. ओकर भूसी तनी कमजोर होल. तनिको आंच लागेले त फूट जाले. फिर ओखरी-मूसर से कूट के भात बना लेत रहलन जा. एके सभे खाय. गरीब अमीर से मतलब ना रहे. ऐसे की खाए में नीमन लागे. सब मिलाके मतलब इ की भदयीं अईसन चीज रहल की जल्दी से खायेलायक हो जाय. अईसन लोग जिनकरी पल्ले खेत ना रहे, मजूरी क के जियत खात रहलन जा, उनहन लोगन के भदयीं जीवन क अधार रहे.

भदयीं की संगे सावा आउर टागुन होखे. इ तनी मोटहर अनाज रहे. लेकिन तब बहुत सकेती में काम चलत रहे. सावा आउर टागुन जल्दी हो जाय. त मान लेहीं की जेकरा चाउर-गेहूं साल भर के खईले भर ना होखे त उ लोग एहिसे काम चलावत रहलन जा. सावा डवरा मतीन होखे. छोट-छोट गोल दाना होखे. सावा अपनी मजबूती खातिर जानल जात रहे. इ कहीं कहीं आजो पईदा होखेला. एकर खसियत इ रहे की गरीब लोगन में जेके पहलवानी करेके रहे उ लोग इहे खाय. सावा पर सात गो परत रहे. बुढ़-पुरनिया लोग बतावे ला की सावा कूटे में हाथ में फोका पर जाय. सावा मोट अनाज रहल. ओकर हथुई बना के लोग खाय. भात बने. माठा भात लोग खूब खाय. आप सब जनीला की माठा पाचक ह.

सावा की संगे मोट अनाज रहे टागुन. टगुनिया ओइसन होखे जईसन की देह आउर कपड़ा में सटे वाली घास होले. इ घास त आजोकाल्ह मिल जाई. कबो जंगल-झाड़ में जईब त आप के एह घास से बचत-बचत जीव उबिया जाई. टागुन क चाउर बने. भात बने. इ देखे में सामान्य चाउर की तरह ना रहे. इ ओईसन होखे जईसन की छोटका (सईअवा) बजड़ा होला. एकर लोग भात बना के खाय. एकर चाउर त पियर देखाय लेकिन भात उजर होखे. टागुन आउर सावा के पानी कमे चाहेला. डीहगर माटी में इ बढ़िया पैदा होला.

अब आप सोचत होब की इकुल जनले क कवन जरुरत बा? जरुरत इ बा की जब आभाव रहे तब बेमारी कम रहे. लोग खरबिरहिया दवाई लेके नीमन हो जात रहलन जा. आज जब बहुत कुछ बदल गईल. उत्पादन बढ़ गईल. खेती में कई तरह क बीज आ गईलन स. बड़हर कंपनी बीया बेचत बाड़ी स. खेत में कम लागत में, खूब ढेर कईसे पईदा होई, लेकिन आप देखब की शहराती लोग आज फिर से उहे भदई, सावा, टागुन खोजत बाड़े लोग. एकर कारन सेहत ह. जब उत्पादन कम रहे तब बेमारी कम रहे. तबकी समान में कवनो अईसन चीज ना रहे कि जवान शारीर के कमजोर करे. लेकिन बाद में बहुत कुछ बनावटी होखे लागल. अब समय अईसन आ गईल बा की लोग फिर से टागुन, भदई, सावा खोजत हवें.
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