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छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- कोलिहा अउ खुसरा चिरई के बिहाव

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नानपन के बात हे, गली-खोर मं अइसने खेल-खेल मं जब कभू बदरी आ जाय, कभू घाम उजय (उगना) तब बादर कोती मुंह करके हाथ ल लमावत क ...अधिक पढ़ें

नानपन के बात हे, गली-खोर मं अइसने खेल-खेल मं जब कभू बदरी आ जाय, कभू घाम उजय (उगना) तब बादर कोती मुंह करके हाथ ल लमावत काहन- घाम (धूप) उजा, घाम उजा कोलिहा के बिहाव हो जा, काहत हो-हो, हा-हा चिल्लावन. तब देखन, हमर मन के केहे ले न घाम उवय अउ न कोलिहा के बिहाव होवय. कोलिहा राहय तब ना ओकर बिहाव होवय. तब का करन, झूठ-मूठ के ठट्ठा-मसखरी मं कोनो ला कोलिहा (सियार) अउ कोनो टूरी टानकी राहय तेला कोलहीन बना के पुतरी-पुतरा के जइसे बिहाव होय, तइसने बिहाव करन.

अब बिहाव मं तो घराती अउ बराती होथे. ढेड़हा अउ ढेड़हीन होथे. पूरा सवांगा करे ले परथे. लुगरा, पोलखा, बहू बर जेवर, दमाद बर सबो सवांगा करे ले परथे. झांपी, पर्री, बिजना, मउर अउ दुनिया भर के जोखा करत ले घर के आड़ी पूंजी बेचा जथे. ये तो सगा-पहुना कस खेल-खेल मं लइकापन अलवा-जलवा मं कोलिहा के बिहाव के जोखा करेन. ओ समे सिरतोन म कहूं सहिच के बिहाव करे रहितेन, तब झन पूछ, कतेक खरचा लगे रहितिस. फेर निपटायेन ओ समे कोलिहा के बिहाव ला. बहुत नाचेन-कूदेन, गायेन. सुआसिन मन दमाद बने राहय तउन कोलिहा, पगरइत (कोलिहा के ददा) अउ बराती मन ला अइसन भडिऩ, गीत गा-गा के गारी दीन ते ओकर तीन पुरखा ला पानी पुरो दीन. ओ बिहाव के सुरता आथे ते संगवारी मन संग हांसत-हांसत कठल जाथन. तइहा के बात ला बइहा ले गे. आज के लइका मन तो अइसन खेलकूद, नाटक-लीला, ये सब ला भुलागे. मरगे सब टीवी, इंटरनेट अउ चैनल मन के चक्कर मं. ओकर मन के मति छरियागे. सोचे समझे के सबो शक्ति खतम होगे.

फेर सियान मन ओ समे गोठियावय, बतावय के वाजिब मं कोलिहा के बिहाव होथे, ओमन ओकर मन के बिहाव के लाड़ू, बरा घला खाय हें. ये बात थोकन अलकरहा लगथे, मन गवाही नइ देवय के ये मन ओकर मन बिहाव के लाड़ू बरा खाय होही. फेर सियान मनखे हे भई, लबारी तो नइ मारही, इही सोच के विश्वास कर लन. ओमन भरोसा के लइक अइसन कई ठन सबूत अउ उदाहरन देइन, तब भरोसा करे ले परिस.

एक बखत के बात हे, पढ़त रेहेन तउन समे इसकूल मं एक पशु-पक्छी के परेमी आय रिहिस. ओहर ओकर मन के बोली-भाखा, रहन-सहन, आचार-विचार अउ बेवहार के गियाता (विशेषज्ञ) रिहिसे. ओहर कतको जानवर अउ पक्छी के बोली-भाखा ला बोल के देखइस. सब बक खागेन, अचरज लगिस. उकरे मेर ले सुने रेहेन खुसरा चिरई अउ कोलिहा के बिहाव के बारे मं. ओहर बतइस- ओकर बोली-भाखा मं बात करे के जरिये कोलिहा के बिहाव मं शामिल होय के मौका मिले रिहिसे.

ओहर बतइस- जइसे मनखे मन के बेटी-बेटा के बिहाव जउन रसम-रीति ले होथे वइसने उहू मन करथे. उहू मन सबो जोखा, सवांगा के तइयारी अपन हिसाब ले कइसे, कहां ले, कोन ढंग ले करथे, उकरो समझ मं नइ अइस, फेर करथे जरूर. नाचथे, कूदथे, गाथे, मटकथे, समधिन मन ला आंखी घला मारथे, टोनकथे, कोचकथे. मैं तो ये सब देख के अचरज खागेंव रे भई. बहुत सुंदर ढंग ले बिहाव होथे, सगा, बराती मन के सुवागत सत्कार करथे. खान-पान, लाड़ू, बरा के घला बेवस्था करथे. महूं ला खाय के मउका मिले हे. सिरिफ भासा अउ बेवहार भर के अंतर हे. जानवर ला, जानवर मत समझव, ओला परेम, बेवहार देवत वइसने बेवहार उकरो कोती ले मिलथे. सब बोली के भूखे हे, पियार के भूखे हे. भगवान ए संसार मं मनुज ला उबजारे हे तब अउ दूसर पशु-पक्छी अउ जीव-जुन्तु ला जनम दे हे. ककरो संग कोनो भेदभाव नइ करे हे. फेर जतका भेद करे हे अउ करथे मनखेच हर करथे. ककरो हिंसा मत करव, दुख झन दव, आपस मं एक-दूसर संग मिल-जुल के राहौ, पिंयार से राहौ, इही तो सब ले बड़े धरम हे. फेर का अइसन देखे ले मिलथे. काकर मन मं, नीयत मं खोट हे, कपट हे, एला समझे ले परही, आत्मनिरीक्षण करे ले परही. सब पता चल जही.

स्कूल मं अपन परदशन देखाय के बाद गुरुजी मन ओ पशु-पक्षी परेमी के सुवागत करिन अउ भेंट स्वरूप कुछ राशि अउ प्रमाण-पत्र दीन. उही दिन गांव मं बाजार रिहिस हे तिहां ओहर वइसने अपन कला के परदशन करिस अउ पशु-पक्छी के बोली-भाखा, आचार-बिहचार, बेवहार अउ समाजिक रहन-सहन, बर-बिहाव के बारे मं बताइस. ओला देखे-सुने बर कटा-कट मनखे जुरियागे रिहिन. सब खुश होगे, ओकर ऊपर अउ जेकर ले जतका बनिस भेंट दीन. अउ किहिन- मोरो गांव आबे, मोरो गांव आबे.

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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