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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- शराब ला ठेंगा अउ दूध दही ला हां

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कोनो, कतको अटिया ले डोमी सांप सही, शेर बरोबर गरज लय, हवा विकराल तूफान के रूप धर लय, जेठ के घाम कस तप लय सूरज फेर एक न ए ...अधिक पढ़ें

जउन दिन असलियत के पोल खुलथे तउन दिन अइसन मन मुंह देखाय के लइक नइ राहय, दांत ला निपोर देथे, मुंह मं पल्लू छिपा लेथे, कोनो झन जानय के ओमन का… का कुकरम करे हें.

सबे दिन, सबे समे एक समान नइ होवय. ओ तो काल के पहिया हे, चक्कर लगावत रहिथे, ऊंच-नीच होवत रहिथे. इही मं दुख-सुख, हानि-लाभ, जस-अपजस, जीवन-मरन, दिन-रात, हार-जीत सब होवत रहिथे. ‘देख रे आंखी सुन रे कान जइसे सब चरित्तर हा जीवन मं घटत-बढ़त रहिथे. एमा समाज, संस्कृति, कला, साहित्य, भाषा-बोली, राजनीति, धरम, उद्योग,धंधा, खेती-किसानी सब आ जथे. समे ककरो बर रुकय नहीं, दुआ-भेद नइ करय. जउन ला हंटर देना रहिथे, चाबुक मारना रहिथे ओकर संग वइसने सलूक करथे अउ जउन ला पुचकार देना रहिथे, मया-दुलार करना रहिथे, महतारी मन बरोबर ओमन ला वइसने अपन सीना मं लगा के रखथे.

कोनो-कोनो कहिथे- अच्छा दिन अवइया हे, तब ककरो, केहे ले अच्छा दिन नइ आ जाय? अइसन कहइया मन लबारी मारथे, धोखा देथे, मनखे अउ समाज ला. अरे सब जानथे, सुरुज नरायन बूड़े है तउन उबे (उगबे) करही, दुख आहे तउन एक दिन जाबे करही. ओहर सदा दिन रेहे बर नइ आय हे. जेकर जइसे करमभोग हे, ओहर कट जही तहां ले जइसे रात के बाद दिन होथे तहां ले सुरुज नरायन उग जथे तइसने सुख ला कोनो रोक नइ सकय. फालतू मतलब सधइया, सुावारथ के रोटी सेकइया मन जनता ला भरमावत रहिथे बड़ा ज्ञानिक अउ सुजानिक बरोबर. पहिली अपन घर, अपन समाज अउ देश के बिगड़े दिन, बिगड़े करम ल सुधार लय तेकर पाछू दूसर के कुला ला धोही. अपन हा तो सिध नइ परत हे अउ चले हे वाहवाही लूटे बर. एमन कोनो जादूगर अउ जोतिसी नोहय जउन नेस्त्रादम्स बरोबर पांच सौ साल पहिली के बात ल जाने के बता दय. जादा दिन कोनो मनखे, समाज अउ देश के आंखी म पट्टी बांध के मुरख नइ बना जा सकय. घुरवा के दिन घला बहुरथे, पंगू लंघयते गिरिम घला के हे गे हे. जब गियान के अंजोर चारों तरफ बगरे ले धर लेथे तब समाज अउ देश के सोसन कर-कर के अपन तिजउरी भरइया अउ मालामाल होवइया, गउदारी करइया मन के मुड़ी कोती के आंखी चेथी कोती लहुटे ले धर लेथे. सोचथें- अइसे कइसे होगे? अब एमा अइसे का होगे कइके सोचे के तो कोनो बाते नइहे. सुरुज नरायन अपन बेरे मं उगथे, अउ बेरे मं ही बूढ़थे. समे के पहिया बने चलत हे, एमा ये चंडाल मन के वश नइ चलय, चलतिस तब युहू मं भांजी मारे ले कमी नइ करतिन.

देश, समाज अउ मनखे के नियम, आदत, बेवहार, करम, धरम, संस्कृति, भाखा, बोली, तिज-तिहार सब ला एमन अग अगड़म-बगड़म कर डरे हे. ओमन तो छटपटावत हे, ये शिकारी के जाल मं फंसे पंछी मन बरोबर अब घुरवा के बहुरे के दिन आगे हे, अति के अंत होवइया हे, शकुनि के चाल धरे के धरे रहि जाही ओ दिन के अब जादा अगोरा नइहे. एकर बढिय़ा एक ठन नमूना, अभी-अभी मिले हे. ओ का हे सुनव: बस्तर मं जइसे नक्सली मन पागी छोर के भागत हें वइसने आदिवासी मन का करे हे- अभी के नवरात परब म अपन जुन्ना परम्परा मं बदलाव लाये के उदीम करिन. ओकर मन संस्कृति मं शराब के जबर हिस्सा रिहिसे के ओकर बिगन कांही नेंग नइ होवत रिहिसे. कोन जनी, कोन का गुरु मंत्र दिस, कान फूकिन ते शराब ला बॉय काट करे के कठोर निरनय लिन. अभी नवरात मं कोनो आदिवासी शराब नइ पिन, न शराब पी के मंदिर गिन, न पूजा-पाठ मं भाग लिन. निरनय के अनुसार जउन आदिवासी ए नियम के उल्लंघन करहीं तउन ला पांच सौ रुपया डांड़े (दंड) दे जाही. ए फरमान के सारथक असर निकलिस. मरे रोवइया कोनो आदिवासी ये परब मं शराब नइ पिन. सकारात्मक परिनाम मिले ले आदिवासी समाज मं खुशी के लहर देखे ले मिलत हे. अब तो ओमन शराब के बदला मं सब दूध सेवन के निरनय लेबर सोचत हें. ये संबंध मं आदिवासी महिला सरपंच लक्ष्मीबाई के कहना हे अवइया समे जब ग्राम सभा के बइठक होही तेमा शराबबंदी के प्रस्ताव लाये जाही. अउ ओला सर्वसम्माति से पारित करे जाही. असने सबो देवगुड़ी मं पीपल पेड़ घला लगाय जाही.

आदिवासी संस्कृति मं शराब के चलन कब ले शुरू होय हे, कोनो ल नइ पता. लगथे पूरा षडयंत्र होय हे. एक समाज ल शराब के नशा मं डूबो के देश-दुनिया ले ओमन ला अलग-थलग करके अपन उल्लू साधे के कोसिस करे सोसन करे के पूरा चक्रव्यूह चलाय हे. सदियो तक ओमन अशिक्षा, अज्ञानता अउ सोसन में पिसावत चले आवत हे. खुद जागव तब सबेरा होथे कहिथे तइसने ओमन आज समझगे हे के कोन-कोन मन हमर लहू पिये हें, घर उजारे हें, बहू-बेटी के इज्जत लेय हें. ओ शेतान मन कोन हे, धीरे-धीरे सब समझ मं आवत जात हे. देखन आघू का होवत हे.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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