छत्तीसगढ़ी व्यंग्य : नवा राजनीतिक चेतना के नवा सूर

.

.

सत्ता के बारहमासी वसंत हे. पुष्प-वर्षा के इंद्रधनुष हे. माला से उन मालामाल हे. कार हे, काफिला हे. उन अपने वसंत म बिजी हें. प्रकृति के बसंत ल कार के कांच नीचे करके कभू कबार देखथें.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 24, 2021, 2:02 PM IST
  • Share this:
राजनीति म भक्ति के बड़ महत्व हे. भक्ति करे ले शक्ति मिलथे. देश के राजनीति म आजकल भक्तिकाल चलत हे. एमा चारण-वंदना के पूरा छूट हे. राजनीति के भक्तिकाल म खूब नवनीत-लेपन होवत हे. जेला छत्तीसगढ़ी म लेवना लगाना कहे जथे. नवनीत-लेपन के अदभूत चमत्कार होथे. लेवना लगाना घलो एक कला आय. कोन ल लेवना लगाना हे? लेवना काखर लगाय से लगही? कब लगाय जाय? कतेक देर तक लेवना लेपन करे जाय. ओरिजनल लेवना लगाय जाय या ओमा कुछ अन्य द्रव्य मिलाय जाय. लेवना लगात समय चेतन चूर्ण खवाय जाय के नहीं? लेवना लगाय बर नवनीत-लेपन कला म माहिर सुप्रसिद्ध खिलाड़ी मन से कोचिंग मिले हे के नहीं? आदि प्रश्न के पूरा समझ होना जरूरी हे. नहीं त ओखी के खोखी हो जही. बनत काम बिगड़ सकत हे. राजनीति म नेता भक्ति-गीत/वचन के चलन बाढ़गे हे. प्रशंसक टोली ल झूठ बोले के पूरा छूट हे. आलोचना के आगू म पूर्ण विराम हे. अनुचित ल उचित माने जाय. असत्य ल अतेक घोरे जाय के असत्य जनता बर सत्य हो जाय या जनता ल भरम हो जाय. इही ह नवा राजनीतिक चेतना के नवा सूर होगे हे. मूल मुद्दा ल स्वाहा करो.

प्रकृति के मनमोहनी सुन्दरता
सत्ता के बारहमासी वसंत हे. पुष्प-वर्षा के इंद्रधनुष हे. माला से उन मालामाल हे. कार हे, काफिला हे. उन अपने वसंत म बिजी हें. प्रकृति के बसंत ल कार के कांच नीचे करके कभू कबार देखथें. उन ल समझ म नइ आय के महुआ के खुशबू ले कइसे नशा चढ़ जथे. प्रकृति के सिंगार अउ ओखर जवानी के रवानी के बोध हो पाना कठिन होथे. प्रकृति के मनमोहनी सुन्दरता तरह-तरह के खिले रंग-बिरंगी फूल मनखे के जिए के उमंग ल बढ़ा देथे. इहाँ राजनीति के भूल-भूल्लैया म जिनगी पलाश होना चाहत हे. राजनीति दिन ब दिन सुक्खा अउ रसहीन होवत हे. कुछु करो फेर सत्ता म विराजो. सत्ता के भीतर म असली वसंत हे. जिहां वसंत हे, वुहें सुख हे.

राजनीति म चारण-चमत्कार
आजकल के सिद्धांतहीन राजनीति के बहुत चलन हे. टाप लीडर मन के भक्ति करो. शक्ति पाव. भक्ति जतेक जादा होही, शक्ति ओतके जादा मिलही. जइसने भक्ति वइसने शक्ति के गुंजाइश होथे. भक्ति के प्रदर्शन कब करना हे? कब नहीं करना हे? प्रदर्शन करना हे त कइसे करना चाही? कतेक भक्ति देखाना हे? कतेक भक्ति ल लुकाना हे, कतेक भक्ति-भाव के देखावा करना हे? ये जानना जरूरी हे. भक्ति के सागर कब अउ कइसे बरसाना हे? नेताजी मन के केवल माला जाप करना हे के पुष्प भेंट कर, पुष्प वर्षा कर उनकर वन्दना करना हे? समय परिस्थति के उपर सब निर्भर हे. सज्जन अउ आदर्श पुरूष मन के कथन हे के जब सुप्रीम बॉस खुश दिखे तब मंगल-गान करे के अच्छा मुहूर्त माने जथे. मस्का मारे के घलो रीत-नीत होथे. एमा सुवारथ के फल मिले के प्रबल योग होथे. ये योग म मुख्यमंत्री/मंत्री/दल के प्रवक्ता/संगठन में पद/मंडल अध्यक्ष आदि बने के चांस होथे. चारण बने म का लाज सरम करना. जरूरत परे तो चरण पखार के चरणामृत ले म कोनो कंजूसी करे के जरूरत नइ होना चाही. पारटी सुप्रीमो या अंडर-सुप्रीमो खुश होगे त इच्छा अनुसार वर दे के जीवन कृतार्थ कर देथे.



चरणामृत सेवन अउ नाम जाप सेवा
एक दु के आगू झूको. ओखर चरणामृत लेव, भक्ति-गान करो, भक्ति-गान करवाव, पूरा वातावरण भक्तिमय कर देव. अइसना चरन अनुरागी ल कोन पाछू ढकेलही? भक्ति म एकदम मिसरी घोर देव. “तुम्हीं हो माता-पिता तुम्हीं हो” स्टाइल म हाईकमान के भक्ति जरूरी हे. सब थोथा हे, इही भक्ति म सार हे. सार-सार ल धरो, थोथा ल उड़ा देव, इही सही नीति हे. नेता भक्त-मंडली बनाव. अपन गुट हिट होना चाहिए. ये हिट भक्त-मंडली भक्ति सागर के लाहरा म धीरे से मंत्रीमंडलीय टोली म बदल सकत हे..राजनीति म सब संभव हे.

बइला मनखे सदाबहार
बइला किसम के मनखे सदाबहार होथे. ओखर आगू म काबुली नस्ल के घोड़ा काम नइ आय. हाथ उठाय के अभ्यास अउ बॉस सेवा के फल अचानक मिलथे. राजनीति म योग्यता के तराजू अउ ओखर मानदंड अखंड-चमचागिरी म हे. बोकरा कस नेता के पाछू शेर कस नेता चलत देखे जा सकत हे. एमा कोनो अचरज नइ होना चाही. ओखरे बताय रद्दा म चलना जरूरी होथे. नीति, सिद्धांत, सब ल खातू के गड्ढा म फेंकना बुद्धिमानी होथे. वसंत के आनंद वुही ल मिलथे. बस हर हाल म बॉस के सहस्त्रनाम माला रोज जपो. ओ नहीं त ओखर नीचे के पावर वाले मन के सहस्त्र, दस सहस्त्र नाम जाप करो. सेवा करे ले राजनीतिक-मेवा जरूर मिलथे एखर गारंटी हे .

रोजे वसंत-उत्सव
राजनीति के गियानी-ध्यानी मन कथें के जब लोहा गरम लाल-लाल राहय तभे अपने दल के विरोधी/विपक्ष उपर राजनीति म कूटनीतिक हथोड़ा चलाना चाही. एखरो बर समय कीमती होथे. लोहा जुड़ाय ले ओला पिटे से हाँसी होथे. वाह वाही त गरम लोहा ल अपन कूटनीति ले पिटे से होथे. सत्ता म वसंत-उत्सव के बड़ महत्ता हे. जब तक गद्दी हे तब तक वसंत हे. जेखर सत्ता बुड़ गे ओखर बर भरे वसंत म सत्ता विरह होथे. सत्ता विरह के दुःख संसार के प्रमुख दुःख में से एक होथे. लोकतंत्र म वास्तविक वसंत सत्ताधारी मन के होथे. एमा राजा जनक कस सत्ता निर्मोही मिलना असंभव हे. बहरहाल सत्ता के रोजे वसंत-उत्सव होथे. नेताजी मन जिहां जाहीं वुहें फूल बरसथे. फूल हार ले लदाय-लदाय उन ल लगथे जइसे उन साक्षात् इंद्रदेव होगे हें. बड़े भाग जो सत्ता पायो. कदम कदम म सत्ता राहत ले यशोगान करइया चारण मिलथें. सुख के हर साधन होथे. लोकतंत्री आसन म बड़ चमत्कार हे.

सत्ता-वसंत के कुहू-कुहू ..विपक्ष म करूण रस
हाईकमान सेवा ले मंत्रीजी बन गेव त मने-मन गदगदावत राहव. जतके बड़े मंत्री ओखर ओतके बड़े रूआब होथे. मंत्रीजी जे डाहर जाथें जनता-जनार्दन अउ ओखर चमचा/अनुयायी मन ओखर पाछू-पाछू भागत रहिथें. कतको शेडो नेताजी मन के रोजी-रोटी इही भाग दउड़ म चल जथे. किसम-किसम के गिराहिक मिलथें. मंत्रीजी जानथे के महामोहिनी कुरसी चार दिन के होथे. राजनीति ह झटका-पटका खूब मारथे. फेर संइयां भए कोतवाल त डर काहे का? ओला डरना नइ हे, डटे रहना हे. जिहां गुर(गुड़) हे तिहां माछी भनभनाबे करही. फेर सत्ता के मिठास के बात त अउ उंच हे.

सत्ता के वसंत बर अलग से वसंत ऋतु के रद्दा देखे के जरूवत नइ होय. वसंत ऋतु उनकर बर बारहों महीना होथे. कोनो आन्दोलन होय ले उनकर वसंत डोल-डुला के फेर स्थिर हो जथे. विपक्ष के सत्ता विरह म करूण रस के धार फूटत रहिथे. कभू-कभू वीर-रस के प्रेक्टिस म थरथराहट आ जथे. वसंत ऋतु के शीतल, मंद, सुगंधित बयार जिहाँ सत्ताधारी मन उपर आनंद के बरसात करथे वुहें सत्ता विरही मन के कुरसी वियोग-राग लू बरोबर होथे. जनता त हर युग म भोली भाली होथे. वोहा वसंत-राग सुन के नाचथे. (लेखक साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज