छत्तीसगढ़ी व्यंग्य: साहेबजी, हम आम मनखे,कीरा-मकोरा आन

छत्तीसगढ़ विशेष.

लालबुझक्कड़ किहिस-प्रशासनिक अधिकारी मन लोकतंत्र के बड़े राजा-महराजा ले का कम हें !! उन त नेताजी मन ल गोल घुमा देथें. नेताजी मन के भूगोल अउ अर्थशास्त्र ल बदल देथें. देश के आम मनखे आँफिस-आँफिस म रोज चक्कर काट काट के अपन जवानी खपा देथें तभो ले उनकर काम नइ हो पाय.

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शहर के चौपाटी म संझा जुआर लइका-सियान मन के भीड़ अपने अपन बाढ़ जथे. कोरोनाकाल के पीरा म घरे म राहत-राहत सबे झन ल अकबकाय रिहिन. मउका मिलते साठ सब छेल्ला होगें. चिन्तन-ठिहा म खबरीलाल, गोबरदास, लालबुझक्कड़ अउ शेखचिल्ली अपन-अपन बात ल ओसावत-फूंनत हें. खबरीलाल किहिस-हम आम मनखे आन, आम मनखे के हैसियत देश म का हे? कीरा मकोरा कस! जे जब पावत हे, तब हम ला खुंदत, रेंगत, अउ हमर उपर दउड़त हे.

रीढ़ के हड्डी नइ होय

लालबुझक्कड़ अपन गियानी बुद्धि ले किहिस- कतको आम मनखे के रीढ़ के हड्डी नइ होय. ये मनखे ल जे डाहर घुमाना चाहो, जब चाहो, घुमा लो. बिचारा चूं-चां नई करे. दूसर प्रकार के मनखे ख़ास किसम के होथे. अपन भाग के रोटी खाथे. रोज नवा-नवा सपना देखथे. ये मनखे मन के सपना लंकेश रावण के सपना ले बड़े सपना होथे. यहू मन अपन टेक वाले होथें. अउ तीसर प्रकार के मनखे होथे तें न कौड़ी के होय न काम के. नदिया के धारा म बोहाय कस बोहावत रहिथे.

सत्ता के मलई म ताकत हे

खबरीलाल किहिस-आम मनखे के न कोनो नीति होय न नियम. ओखर संग थोरकुन मीठ बोल देय तहाँ ले मेंचका बरोबर कूदत रहिथे. आँखी-आँखी म नाचत रहिथे. आम आदमी के औकात ल नेता मन बने चिन्हें हें. शेखचिल्ली किहिस-आम आदमी समय पा के खुद ‘सत्ता के मलई’ के ताकत ल समझथे. राजनेता ओला फ़ुटबाल बना के खेलत-कूदत रहिथे. लालबुझक्कड़ अपन गियान के पेटारा ल खोलिस किहिस-देखो भइए, ये आम आदमी मन फोकट के खाय मारे टकराहा होथें. हर बखत ताली बजाय म हुशियार होथें. गोबरदास किहिस-कुछ आम मनखे मन केवल ताली बजाय अउ ताली बजवाय बर ये धरती म परगट होथें अउ धरती ल धन्य-धन्य करथें.

गरीबी के खेती बर फ्री सेवा
गोबरदास किहिस-आम मनखे ख़ास मनखे के सेवा म लगे रहिथें. आम मनखे के सोच के कोनो कीमत नइ होय. हर छोटे बुता आम मनखे के नाव होथे. आम मनखे के पेट अउ बुद्धि ल नापे के यंत्र केवल ख़ास मनखे म होथे. शेखचिल्ली किहिस-ख़ास मनखे आम मनखे के सवारी करथे. नेताजी मन बर आम मनखे देश के बेहतर वोटर होथें. नेता सुविधा देय उपर ले देथें. सुविधा पा के आम मनखे धन्य-धन्य हो जथें. नेता देश के गरीबी ल पोसत आवत हें. देश जानथे के गरीबी कभू हटे नहीं, न नेता मन ओला हटन देंय. गरीबी के जमीन म वोट के खेती लहलहाथे. गरीबी रेखा म राजनीति के रहस्य हे. जानकार कथें ये रेखा के खाल्हे डाहर गरीब अपने-अपन ठेला जथें.

आम मनखे सदा लाईन अटैच
सब फ्री सुविधा पा के उन अपन गोड़ म खड़े नइ होय पांय. उन त यहू भूला जथें के उनकर गोड़ हाथ भगवान ह मिहनत करे बर दे हे. फ्री चीज ह जी के जंजाल आय. उन अपन नहीं दूसर के गोड़ म खड़े होथे. अपन बुद्धि के सुरता ल उन भुला जथें. दुसर के बुद्धि म रेंगथें. लालबुझक्कड़ पूछिस- ‘आम मनखे के का पहिचान हे?’ गोबरदास किहिस-आम मनखे के एके प्रमुख लक्ष्य होथे चुनाव तिहार म वोट देना हे. सब सुविधा फ्री म लेना हे. येखर बड़े आत्म-गियान होथे. आम मनखे लाईन अटैच मिल जथें फेर वोहा राशन दुकान के लाइन म हो चाहे कोनो किसम के सरकारी सुविधा केंद्र होय लाईन सदा प्रिय हे.

आधारहीन-पहिचान

खबरीलाल किहिस-आम-मनखे तीर आधार के अलावा किसम –किसम के पहिचान-पत्र मिलथे. फेर कोनो पहिचान–पत्र बिना त्रुटी वाले नइ होय. ढेरों पहिचान पत्र के राहत ले ओखर औकात निराधार होथे. आधार के परगट होय के बाद से ओ लाइन म खड़े हे तभो ले ओ आधारहीन हे. हर दफ्तर म हर जगह लाईन हे. कहूं कमीशन खोरी, कहूं चोरी-चोरी, कहूं हरामखोरी, कहूं मुंहजोरी अउ कहूं खुलेआम भ्रष्टाचार जिंदाबाद हे. आम मनखे अपन छोटे से बुता ल करवाय बर अपन जिनगी के एक चौथाइ से आधा जिनगी लाइन म खड़े-खड़े निकल देथे. भोकलू कहूं लोकतंत्र म आधुनिक राजा (संसद,विधायक बड़े प्रशासनिक अधिकारी,बड़े कारोबारी) बनगे त ओखर मन के दसों पीढी के उद्धार हो जथे. फेर लोकतंत्र के गद्दी घलो पूर्वज के रजिस्ट्री बरोबर लगथे.

सरकारी आँफिस-आँफिस...अनंत पीरा

शेखचिल्ली किहिस-देखव जी, मोर त मानना हे कि मनखे के भाग घलो सुख–दुःख के कारन बनथे. जेन अपन मुहूँ म सोंना-चांदी के चम्मच ले के जनम लेथें उनकर धन के.मन के अनंत-कथा होथे. आम आदमी म कोनो कोनो अपन भाग ल बदल पाथें. नहीं त शेष मन त अपन-अपन समस्या ले लड्त लड्त अभिमन्यु हो जथें. कई पीढी शहीद हो जथें तभो ले भाग नइ संवर पाय. लालबुझक्कड़ किहिस-प्रशासनिक अधिकारी मन लोकतंत्र के बड़े राजा-महराजा ले का कम हें !! उन त नेताजी मन ल गोल घुमा देथें. नेताजी मन के भूगोल अउ अर्थशास्त्र ल बदल देथें. देश के आम मनखे आँफिस-आँफिस म रोज चक्कर काट काट के अपन जवानी खपा देथें तभो ले उनकर काम नइ हो पाय. नियाव पाय बर जिनगी भर छटपटात रही जथे ओला नियाव नई मिल पाय. गोबरदास किहिस- आम मनखे ओ ह आय जेखर तीर नियाव नइ पहुंच पाय. तारीख के सड़क म दउड़त-दउड़त परान निकल जथे. न ओला नियाव मिले, आँफिस-आँफिस के अनंत पीरा वाले चक्रव्यूह ओखरे बर बने होथे. लालबुझक्कड़ किहिस-जिनगी के संझौती म सवाल हल करना बहुत कठिन होथे. पीड़ितजन मन के चीख सब भसम कर सकत हे. एखर सेती पावर पा के सम्हल के चलना सब झन ल कहाँ आथे.

ख़ास आदमी के घलो होथे पीरा

खबरीलाल किहिस-अंग्रेज मन देश छोड़के गिन फेर अपन रणनीति म सब आँफिस अउ प्रशासनिक-व्यवस्था के अइसे संरचना करे हें के ओखर जगह म कोनो जवाबदेही नई छोड़े हें. साहेब मन त साहेब होथें न !! बड़े –बड़े अधिकारी मन के पूरा उमर नेता मन के गुलामी नहीं त उत्कृष्ट चमचागिरी म बीत जथे. उन सुकून के जिन्दगी पाय बर तरस जथें. उनकर पुन्न अतेक होथे के रिटायर होय के बाद उन ल लगथे के अपन जिनगी त हम जी नइ पाऍन. ये ख़ास आदमी मन के गुप्त पीरा होथे. कोनो अधिकारी अउ नेता मन ल छोड़ के एक मोड़ म आ के उन सोच म परथे के जिनगी के भूलभूलय्या अइसनो होही हम का जानेंन. ? मुंधियार होगे रिहिस. शहर म खंबा के बिजली जलगे राहय. खबरीलाल किहिस चलो घर चलव अउ सब घर डहर रेंग दिन.