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छत्तीसगढ़ी व्यंग्य- बाबू अउ ओखर ऑफिस

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बाबू हर फाईल के जनम कुंडली ल जानथे. फाईल मैनेजमेंट म उनकर मास्टरी होथे. कोन फाईल कते करा हे ? घूमइया फाईल, बिसराम करइया ...अधिक पढ़ें

  • News18Hindi
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बाबू हर आँफिस के धुरी होथे. आँफिस जरूरी हे, त बाबू घलो जरूरी हे. बाबू हर फाईल के जनम कुंडली ल जानथे. फाईल मैनेजमेंट म उनकर मास्टरी होथे. कोन फाईल कते करा हे ? घूमइया फाईल, बिसराम करइया फाईल, अटके-झटके लटके फाईल सब के अता-पता ओला होथे. कोनो फाईल आँफिस म अनशन कर देथे. कोनो फ़ाईल ह आँफिस म आत्म-हत्या कर लेथे. ओ फाईल के किरिया-करम हो जथे. कोनो फाईल खूब चिखथे-चिल्लाथे. साहेब मन भैरा हो जथें. बाबू घलो अपन कान म रूई गोंज लेथें. कतको ल त साहेबजी जानबे नइ करे. साहेबजी ल कानों-कान खबर नइ होय पाय. अनशन करत कोनो फ़ाईल मोक्ष पा जथे. कोनो फ़ाईल भूत बरोबर हलाकान कर देथे .खासकर एप्रोच वाले फाईल उपर तुरत कार्यवाही होथे. अइसना फाईल साहेबजी, बड़े बाबू अउ आँफिस के घलो कल्यान कर देथे. कोनो-कोनो आँफिस म नवा छत्तीसगढ़ दिखथे. बाकी म ढर्रा म ज़िंदाबाद होथे. वइसे जनता से गोठियाय बर साहेबजी, बाबू साहेबजी मन करा टेम नइ राहय. टेम हे त समस्या ल जाने-बूझे कोन ? देर-सबेर नियाव मिलथे त ओखर महत्व गुड़-माटी कस होथे.

फाईल मर्मज्ञ कहिथें….

फाईल मर्मज्ञ मन के अनुसार फाईल दु परकार के होथे गरू फाईल अउ हरू फाईल. गरू फाईल जल्दी निपट जथे. हरू फाईल के सफर कन्याकुमारी से चल के हिमालय के चोटी तक के यात्रा बरोबर अत्यंत कठिन होथे. मनखे जवानी म आवेदन करथे त बुढवा के होत ले ओखर सदगति या दुरगति होथे. कोनो फ़ाईल के भगीरथ-तपस्या खतमे नइ होय. सालों साल जारी रहिथे. बाबू वरदान दे के कतको फ़ाइल ल मोक्ष प्रदान करवाथे. कतको फाईल त आँफिस म दम घुटे के बाद साँस लेना बंद कर देथें. बाबू के सेती कतको बुता सरल हो जथे. ओ ह कहूँ लालची होइस त सरल बुता हर कठिन हो जथे. अउ कठिन ह सरल होथे. कतको साहेबजी मन कुरसी म कम से कम बइठथें. बइठगे त जादा जरूरी बुता ल पहिली निपटाथें. तहाँ ले राजधानी के प्रश्न उत्तर म बिजी हो जथें. हप्ता म तीन दिन सरकारी मीटिंग म बितथे. दौरा मारना घलो जरूरी होथे.

ऑफिस के भूलभूलैया

सरकारजी के जोर आँफिस म बने चलत नइ दिखय. ओखर ताम-झाम बाहिरे-बाहिर जगमगा के बुझा जथे. आँफिस के सुन्दरता फ़ाईल से होथे. हर आँफिस अपन औकात के अनुसार फाईल कारखाना हो जथे. सरकार के राजस्व विभाग भूलभूलैया होथे. इहें सब ले जादा फाईल रोवत-गावत, परे-डरे अपन शिकायत सुनाथें. साहेबजी मन फाईल सरकावत सबले जादा सुंदर दिखथें. जनता के बुता आफिस के चक्कर लगाना होथे. चक्कर लगात रेहे से आफिस के हलचल के ज्ञान होथे. आफिस के चक्कर लगाना लोकतंत्र के चक्कर लगाय के पुन्न कस होथे. आँफिस परिक्रमा से फल मिले के गुंजाइश बनथे.

ऑफिस के अर्थशास्त्र

आवेदक के आफिस के चारों खुंट गोल-गोल घुमथे. फेर वाह रे! आँफिस, आँफिस के साहेब अउ बाबू कोनो ल आम-जनता के पीरा नइ जनाय. आँफिस परिक्रमा करत-करत सालों-साल बित जथे. सरकारजी न जनता से जुड़ पाएं, न जनता सरकारजी से. आँफिस के अर्थशास्त्र, इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित, अस्त्र-शस्त्र सब बाबू अउ साहेब के आसपास होथें. बाबू बड़ बिजी परानी माने-जाने जथें. फ़ाईल म बूड़े रहना, फ़ाइल म तउरना, फाईल म डूबकना, फाईल के गहराई नापना, एक नजर म आवेदक के वजन जानना ओला बड़ ख़ूबसूरती से आथे. डिजिटल इंडिया के तहत आँफिस पोर्टल ल अपडेट करना जरूरी या अनिवार्य कब समझे जही भगवान् जाने.

साहेब के अर्थशास्त्र

बाबू के आत्मा ओखर ओखर आँफिस म बसथे. कतको बाबू मन साहेब ले जादा नियम कानून जानथें. बड़े बाबू जोंन कहि दिस तोंन प्राय: आख़िरी होथे. छोटे बाबू से बड़े बाबू के कार्य-दूरी दिखथे. अउ बड़े बाबू से साहेब के कार्य-दूरी कभू दिखथे, कभू समाप्त हो जथे. कतको आँफिस म बड़े बाबू साहेब के विकल्प बरोबर होथें. बड़े-बड़े बुता ल निपटा देथें अउ साहेब के अर्थशास्त्र के नीत के अनुसार चलथें. साहेब के गणित के उत्तर अउ बड़े बाबू के गणित के उत्तर एक होय ले आँफिस बने चलथे. साहेबजी के सोच के भूगोल के अनुसार विभाग के सेवा कार्य चलथे. कई साहेबजी मन अपन आँफिस ल खुद चलाथें. कतको आँफिस बड़े बाबू के ईशारा से चलथे. जेन पारटी के सरकार होथे तेंन पारटी के दखल बाढ़ जथे. हल्का-फुल्का अधिकारी मन के बैंड बज जथे. बने गरू व्यक्तित्व ल सब झन ल घेपे बर परथे. अइसन अधिकारी इहाँ कमती लगथें. साहेबजी कइसनो होंय बड़े बाबू सब ल झेल लेथें. अनुभव के धनी होथें न. कुल मिलाके बाबू के बिना आँफिस म अंधियार होथे.

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