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छ्त्तीसगढ़ी व्यंग्य - लेखकजी के सांप-सीढ़िया सोच

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आजकल जे पाथें ते खटाखट किताब छपवाथें. साग-भाजी बेचइया से ले के जेल के नेता तक किताब लिख के महान हो जथें. अइसे लागथे के ...अधिक पढ़ें

एक दिन एक झन लेखक महाशय के फोन अइस- ‘मोर हाल-चाल पूछिस’.सुख दुःख के सरलग गोठ के बाद मोला किहिस ‘आजकल मेंहा बढ़िया लेख लिखत हंव. लेख अतेक बढिया हे के मोला सोचे बर परत हे के एला कते अखबार/पत्रिका म छपे बर भेजंव. भेजंव के नइ भेजंव. आज के समय म विचार अउ भाव के चोरी-चकारी बाढ़गे हे. तय नइ कर पावत हंव के मेंहा का करंव. मेंहा पूछेंव- अपन रचना ल कहाँ, कहाँ भेजे हो ? स्थानीय अख़बार म ट्राई करो’. लेखक महाशय किहिस-लोकल वाले सोच से मेंहा उबरना चाहत हंव. लोकल के टोटल लोकल सोच होथे. मोर सोच राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर ल छूथे’. मेंहा कहेंव-‘महोदय, आप मन त हाई-जम्प वाले आव. अपन स्तर ल झन गिरन देव.भले दुसर ल गिराना परे त गिरा देव.ओला अपन सीढिया बना लेव. आजकल गिरे-हपटे के चांस हर क्षेत्र म दिखत हे. आप गिरे अउ हपटे के खतरा ले मुक्त हो. हाई-लेवल म लेख रवाना कर देव. आपके लेखनी कभू राकेट त कभू मिसाइल के गति ले फरफरावत चलथे. ओला लक्ष्य तक पहुंचना जरूरी है. कभू-कभू बारूदी विचार ह लेखक के खोपड़ी म ब्लाष्ट हो जथे. सावधानी जरूरी हे’.जादा विचार-वान मनखे ले बच के चलव. कतको झन मन साहित्य म घलो मनरेगा के गोदी खनवावत दिख जथें.

भंइस मुड़ी के हाले से प्रेरना

लेखक महाशय किहिस-‘आपके सोच उत्तम हे, सुंदर सोच के दुकाल सबे जगा हे. आपके ऊंचहा सुझाव मोला पहिली बखत मिले हे. आखिर किताब आही तेला जनता त पढ़बे करही न. फेर जनता घलो आजकल बिजी होगे हे. जेन बिजी नइ हें तेंन आलसी हें. उन सुनथे जादा, पढ़थे कम. संचार क्रान्ति के जुग हे. लेखक महाशय किहिस –‘मेंहा चाहत रेहेंव के कोनो अखबार/पत्रिका के संपादक छाप देतिस त बड़ अच्छा होतिस. एक-दु जगा ट्राई करे रेहेंव फेर मोर उच्च-विचार ल उन झेल नइ पाइंन. वापसी होगे..मेंहा कहेंव- सीधा किताब छपवा लेव आजकल जे पाथें तेन खटाखट किताब छपवाथें. साग-भाजी बेचइया से ले के जेल के नेता तक किताब लिख के महान हो जथें. अइसे लागथे के कतको झन पैदायसी लेखक होथें. अउ हाथ म किताब धरे परगट होथें हें. लेखन म समाजवाद हे. भंइस के मुड़ी हलावत देरी हे फेर कविता लिखत म देरी नइ लागे. झट प्रेरना-प्रवाह कैच करके आसु कवि होवइया कम नइ हें. लोग दर्जनों किताब त चुटकी बजावत लिख लेथें. हमर देश म प्रतिभा के सुकाल हे. मोर सुझाव हे के आप सीधा-सीधा किताबे छपवा डरो. ओखर से आपके शोर सुन के कतको संस्था जोरदार पुरस्कार दे के आप ल जीते जी अमर कर देहीं’.

पांच किताब छपगे : खोपड़ी खपगे !!

लेखक महाशय किहिस-‘ इही बात म सार हे’. . वइसे मोर पांच ठन किताब छप चुके हे. छठवां छप के अवइया हे’ मेंहा कहेंव-आप पांच ठन किताब लिख मारेव . फेर जंगल म मोर नाचिस कोन देखिस’ ? लेखक महाशय मोर बात ल सुन के चिढ़गे, जोर से खिसियइस फेर किहिस-‘आजकल लोग दूसर मन के उपलब्धि ले सुलग जथें. सुलग-सुलग के भंग-भंग ले बर जथें’.मेंहा केहेंव-आजकल हर गाँव-सहर के अली-गली म सायर सिंह हें. किताब किंग हें. का लिखे हे तेला ओखर परोसी नइ जानें. कोनो तो ओखर चार लाइन गुनगुनातिस/बतातिस !! दनादन सरकारी किताब के खरीद हो जथे. जेन किताब सरकारी खरीद म पास होगे तेखर किताब/या सामग्री स्कूली पाठ्यक्रम म आवत देरी नइ लगय. उनकर अखिल भारतीय होय के चांस बाढ़ जथें. कुछ कवि मन तीन चार बने ताली बजाऊ कविता लिख के डायरेक्ट अखिल भारतीय होय के गुनी होथें. फेर कवि-लेखक वाले लेंन म घलो राजनीति के घुसपैठ होगे हे. अ.भा. के सील-मोहर लगिस तहाँ ले देश-बिदेश परिक्रमा अइसने हो जथे. एला कथें परम सौभाग्य. आप सरिख सुयोग्य लेखक ल छोड़ के काहत हंव के लेखक/कवि बनना अब सरल होगे. कोनो दस किताब के धनी हें, त कोनो पन्द्रह के. कोनो बीस किताब …लिख के वरिष्ठतम लेखक/कवि हें. अपन आप ल देश-प्रदेश के मशाल साबित करत हें. आप करा त सब खूबी हे’ अपच- बात

लेखक महाशय ल मोर बात अपच बरोबर लगिस’. झट किहिस-हम किताब लिखवान नहीं जी खुद लिखथन. किताब त अपने अपन लिखा जथे. झट पांडुलिपि प्रकाशक ल भेज देथन’.किताब छप –छुपा के आ जथे. मामूली अर्थ-दान करे ले किताब हाथ म होथे’. मेंहा मुड़ ल हलाएंव दर असल लेखक महाशय ल ये बताना जरूरी रिहिस के मोर पांच ठन किताब छ्पगे. छठवां किताब छप के अवइया हे. सातवाँ के पांडुलिपि छपे बर रवाना करत हों. मोला खुशी होइस चलो किताब उपर किताब लिखना असाधारण बात आय.

कमरा ओढ़ के घी पियइया

लेखक महाशय बहुत खुश दिखिस. खुश त ओला लगना चाही. मेंहा पूछेंव आगू का करना है ? वो ह किहिस सब कार्यक्रम सेट हे. सहर/कस्बा म किताब उपर कुछ आधुनिक गैर विद्वान् मन के गोष्टी करवाना हे. बड़े-बड़े विद्वान मन गरिष्ठ होथें. उनकर चोचला बहुत होथे. फूल नाश्ता-पानी के इन्तिजाम रही. गैर विद्वान् मन कस के नाश्ता करहीं अउ तारीफ़ के पूल बांधहिं. हँसी-मजाक वाले माहौल म समीक्षा घलो निपट जही. कोनो-कोनो साहित्य समिति म जेन नेता टाइप कवि होथें. उन अपन पारटी के नेता अउ चमचा मन ल बला के शानदार सार्वजनिक हाल म अपन सम्मान करवा लेथें. फलां-फलां संस्था द्वारा सम्मान’. मेंहा कहेंव-‘लेखक महाशय-आप तो पहुंचे फकीर हो’.मोर काबर परीच्छा लेट हो’? ये बात सुनते साठ वोहा जोर-जोर से खलखला के हांसत रहिगे. मोला लगिस के कमरा ओढ़ के घी पियइया मन लुकाय-लुकाय जिंदाबाद हे. फोन ल रख देंव.

(शत्रुघन सिंह राजपूत वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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