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छत्तीसगढ़ी व्यंग्य-‘गउ माता’ परीक्षा म अइस निबंध

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य-‘गउ माता’ परीक्षा म अइस निबंध

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गोबरदास अउ ओखर मितान परसादीराम गउ माता के धियान धरत हे. गंभीर भाव वाले मुख-मुद्रा हे. गोबरदास किहिस-‘गउ माता सबके बेड़ा पार लगाथे. प्रायमरी, मिडिल स्कूल से आसीस देवत आत हे. वार्षिक-परीक्षा म कोनो निबंध आय के झन आय फेर गाय के निबंध जरूर आय.

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सहर गाँव/कस्बा वाले स्कूल म गाय खुदे आ के खिड़की तिर खड़े हो जाय. हम्मा..हम्मा..के आवाज लगा के अपन किरपा बरसाय बर नइ छोड़े. ओखर धियान म परीक्षा के अपन मरियादा हे. हम्मा..हम्मा..स्वर गउ माता के कोड़ साउंड कस लागे. गउ माता संकेत म कहे ‘मेंहा आगे हंव रे, मोला देखव अउ लिखव ‘गउ माता’ के निबंध. याद करे हो न ? जेन ल याद नइ हे तोन फेर मोर दरसन करव अउ निबंध लिखव. तुंहर हिंदी पेपर बर मैं खुदे किरपा बरसावत हँव. चारा चरत रेहेंव तेला छोड़ के इहाँ आय हंव. तुंहर छोटे गरूजी अउ बड़े गुरूजी दुनों जानत हें. तुमन नकल थोरे मारत हव, मोर दरसन करत हव. दरसन के फल त मिलनाच हे न. तुंहर उद्धार होना हे. दस नंबर म आठ नंबर त मिलि जही’.

गोबर के लिपाई

परसादीराम किहिस-‘गउ माता के किरपा स्कूल म खूब बरसे. गोबर करे के उचित स्थान खईरखा-डांड के बाद स्कूले राहय. माटी के स्कूल ल गउ माता रोजे अपन गोबर ले पबरित (पवित्र) करे. गोबर के लिपाई से स्कूल धन्य होय. कोनो स्कूल म टाट पट्टी राहय. त कोनो स्कूल म टाट पट्टी के सदा दुकाल जानो. गनती के कमरा,/या खोली, जिहां आधा अंजोर, आधा अंधियार राहय. खिरकी हे त बने हे, नइ हे तभो बने हे. खिरकी होय ले खोली म हवा आय-जाय. अंजोर घलो जनाय, खिरकी के नइ होय ले लइका मन ल धंधाय कस लागे. गाँव के स्कूल हेडमास्टर भरोसा चले. जब चाहे तब स्कूल लगा ले, जब चाहे तब पढ़ा लिखा. फेर चाहे साढे पाँच काबर न बज जाय.

चाक के जगा छुही

गरीबदास किहिस-‘ महीनों चाक के बिना छुही भरोसा लिखई-पढ़ई आगू बढ़े. भुइंया म बइठ के पढना अउ लिखना होय. जिहां टाट पट्टी राहय वुहाँ टाट पट्टी उपर लइका मन बइठें. एकात कुरसी रहे. गाँव के विदया परेमी मन डेस्क, कुरसी के व्यवस्था कर देंय. नइ करें तिहां बेंच म घला गुरूजी के आसन जम जाय. गोबरदास किहिस-‘स्कूल म लकड़ी के तख्ता टूटहा-फूटहा राहय. ओला टूटहा कुरसी उपर रखे जाय. चाक के उरके के बाद सफेद छुही अउ टूटहा-फूटहा तख्ता काम आय. हुशियार अउ चंचल किसम के लइका मन भेंगराज (भृंगराज) पौधा के पत्ता म कोइला मिला के तख्ता ल करिया-करिया चमकांय. गुरूजी घलो एमा लइका मन के मदद करें. तख्ता म सफेद चाक (खड़िया) या छुही से लिखे जाय. आधा जुआर के बाद गुरूजी स्कूली डाक पहुंचाय बर केंद्र शाला जाय. नदिया-नरवा वाले गाँव तो बरसात म टापू बन जाय. नरवा घलो परीक्षा लेय, नाहक सको त नाहको ? कभू-कभू डाक सहित गुरूजी बोहात-बोहात बांचें. सुक्खा दिन म स्कूल के लइका मन कुछ किलोमीटर दूरिहा केंद्र शाला म भागत जा के डाक जमा करें. अउ पलट के भागत स्कूल म हाजिर हो जांय. तब न ददा ल आपत्ति होय, न दाई ल.

सरकारी डाक के डर

परसादीराम किहिस-‘सरकारी डाक तइहे के गुरूजी मन ल खूब डरूवाय. खूब पढ़ई अउ खूब खेलकूद होय. तइहे के म.प्र. म ए.डी.आई नामक ओहदाधारी परानी(प्राणी) होय.(आजकल उनकर जगा बी.ई.ओ.होथें) उन स्कूल-स्कूल दौरा करें. पढ़ई-लिखई अउ दाखिला रजिस्टर आदि के जांच करें. आजकल बड़े-बड़े अधिकारी साल छै महीना म दौरा मारथें. उन पढ़ई-लिखई ल छोड़ के सब चरचा करथें. तइहे के नानकुन करेजा वाले मास्टर के जी पोट-पोट करे. गलती दिखे त साहेब खूब फटकारे. ए.डी.आई(सहायक जिला शाला निरीक्षक) के लिखे ले झट गुरूजी के तबादला हो जाय. तनखा रूक जाय, गैरहाजिरी के पइसा तनखा से कट जाय. वइसे पगार दु महीना ले छै महीना के बीच म मिले. ओखरो बर मीलों पैदल चले बर परे. पगार नइ मिले त मुहूँ लटका के फेर रेंगत-रेंगत पैडगरी रद्दा चिखला-पानी एक करत नाप. पगार ए.डी.आई मन निकालें. कट-पिट के डेढ़-दु,/अढाई-तीन सौ नगद रूपिया मिले. उहू म पे-सेंटर प्रभारी भांजी मार देय. मास्टर-मास्टरिन मुड़ धर के बइठ जाँय. तब तिहार-बार म एडवांश मिले. जेन साल भर कटत राहय. उधारी नकदी उपर भारी परे. जिला के बड़े साहेब के बड़ रूतबा राहय. मास्टर ल देख के आफिस के बाबू मन के लार टपके. कोनो न कोनो बहाना उनकर जेब गरम हो जाय. अब ई-पेमेंट व्यवस्था हे.
गुरूजी बहुउद्देशीय कार्यकर्त्ता

गरीबदास किहिस-‘तब मास्टर बइला चरवाहा कस लागे. लइका मन ल स्कूल म फांदे-फांदे गियान देना राहय. कोनो लइका मरखंडा बइला कस, त कोनो ह गोल्लर कस उत्पात मचांय. बड़े-बड़े अलहन आय. गाँव के चतुर सुजान मन गुरूजी के संग देवंय. अनुशासन अइसे राहय कि एक मानीटर पढ़ई करवाय अउ पूरा स्कूल ल संभाल लेय. गाँव म मास्टरजी मन के मान-सम्मान रहय. एक स्कूल पांच कक्षा, एक गुरूजी, एक स्कूल, तीन कक्षा, दु गुरूजी कतको स्कूल म त लइका राहंय डेढ़-दु सौ अउ एको गुरूजी नइ राहंय. काम चलाय बर गुरूजी अटैच कर दे जाय. साल भर गुरूजी मन के पढाई के संगे संग किसम किसम के डयूटी लगे. सरकारी गुरूजी ल जे विभाग जब चाहे तब अपन बुता बर जोत देय. गुरूजी बहुउद्देशीय कार्यकर्त्ता हो जाँय. वो जमाना म गुरूजी पैडगरी रद्दा म खूब रेंगे. पैडगरी रद्दा म रेंगे के चोक्खा अभ्यास राहय. सड़क वाले रद्दा ले दूरिहा के गाँव जाय बर यातायात के साधन कमती होय. अधिकांश जगा म पहुंचे बर पद-यात्रा करे बर लागे’.अब के अधिकतर स्कूल साधन संम्पन्न हें. गाँव-गाँव सहर से जुड़े.

धारों-धार पानी

दुनों संगी बचपन के सुरता म बोहावत-बोहावत अपन रद्दा भटक गे हें. गरीबदास काहत हे बरसों पहिली के बरसात म हप्ता-पन्द्रह दिन तक धारों-धार पानी बरसे. जाड़ लागे त गोरसी बड़ सहारा होय. अब त बरसात रबक-रबक के होथे. छत्तीस जगा ले स्कूल टपके. जतके पानी बाहिर म वोतके पानी स्कूल म गिरे. कभू कमती त कभू जादा कष्ट होय. तभो ले खपरा वाले स्कूल म घलो लइका मन बिधुन हो के पढ़ें. कोनो-कोनो गाँव म पेड़ के खाल्हे डाहर कक्षा लगे. बने-बने पढ़-लिख के उन कलेक्टर, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, मास्टर आदि बनिन’.

गउ माता के आसीस

परसादीराम किहिस-‘उनकर सफलता म गउ माता के आसीस हे. परीक्षा के दिन म गउ माता ‘निबंध’ लिखवाय बर स्कूल के परछी म संउहत आ बिराजे. दमदम ले खड़े हो जाय. हम्मा ..हम्मा कहि के बता दे के नोंनी-बाबू हो मोला तुंहर चिंता-फ़िकर लगे रहिथे . परीक्षा म तुमन मोर उप्पर निबंध लिखव हे. मेंहा संउहत आ के परछी म बइठे हों. निबंध लिखो. परीक्षा पास करो. विद्यार्थी प्रायमरी चौथी,पांचवीं, छठवीं.सातवीं स्तर तक स्कूल म गाय उपर म हिंदी म अउ मिडिल म गाय के निबन्ध ‘द काउ’ के ऐसे(निबन्ध) लिखे बर आय. लइका रहेंन तब हम गाय के निबन्ध लिखेंन. सिद्ध करेंन के गउ माता के गोवंश पांच हजार साल ले पहिली ले पूजनीय हें.गउ माता के धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, पर्यावरण संबंधी महत्व हे.

लाइफ आफ काऊ गरीबदास किहिस.

गउ माता बहुत उपयोगी परानी आय. दूध देथे, गोबर देथे. दूध बेचाथे, गोबर बेचाथे.गोबर के ऊर्जा ले सरकार के राजनीति चलत हे. जनजीवन म गाय सेवाके भाव हे. बछरू बड़े हो के खेत जोतथे. बइला-गाड़ी तिरथे. बछिया बड़े हो के गाय होथे. आजकल दूध नइ देवइया गउ माता शहर-गाँव म जगा-जगा बगरे रहिथें. मालिक ओला छेल्ला छोड़ देथें. उन का करें खेत डाहर घलो मुंह मार देथें. गउ माता के गोदी माँ के गोदी उ ओखर पियार माँ के लाड़-पियार होथे. गउ माता के पूरा जीवन मानव उपयोगी हे. अउ गउ माता खाथे का? हरियर घास,पैरा-भूसा.पीथे पानी आदि लिख के लइका मन पास होय के दावा करे के लइक हो जाँय.

(शत्रुघन सिंह राजपूत वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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