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छत्तीसगढ़ी विशेष -हमरो बजट बना दे दीदी: कागज के रूपिया फूंकथे त मनखे उड़ा जथें

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पहिली केहे जाय ‘आमदानी चवन्नी, अउ खरचा रुपैय्या’ अब मुहावरा ल मंहगाई के हिसाब से दुरूस्त करके लिखे अउ बोले बर परही ‘आमदानी दस रूपल्ली अउ खरचा सौ रूपल्ली हे’. चवन्नी, अठन्नी के बजार म ढुलना लगभग बंद होगे हे.

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खबरीलाल चिंतन चंवरा म अपन गुरू-गंभीर बानी म बोलिस-बजट के समे हे. केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा म देश के एक अरब ३५ करोड़ जनता बर साल २०२१ के बजट पेस करिस. कतेक बड़े बात हे. एक हम हन भोकवाचंद घर म गिने चुने दस मनखे. आज तक अपन घर के बजट नइ बना पाएन. हम आम मनखे आन. आम मनखे के औकात बजट बनाय के नइ होय पाय. पहिली केहे जाय ‘आमदानी चवन्नी, खरचा रूपल्ली’ अब मुहावरा ल मंहगाई के हिसाब से दुरूस्त करके लिखे अउ बोले बर परही ‘आमदानी दस रूपल्ली अउ खरचा सौ रूपल्ली होगे. चवन्नी, अठन्नी के बजार म ढुलना लगभग बंद होगे हे. मंहगाई के मार से एक रूपिया के साँस अब-तब टूटों, टूटों होवत हे. रूपिया गिरत, हपटत रहिथे. हर बखत रूपिया उपर बजार भारी परथे. कागज के रूपिया फूंकथे त मनखे उड़ा जथे. कोरोना के सेती साल म हर जिनिस के भाव बाढ़गे. बढ़े-दाम उतरथे कहाँ? चढ़ते जथे. रोवइया रोवत रहिथे, हँसइया हाँसत रहिथे. जब जब सरकार मन अपन बजट बनाथें हम ल लगथे एसो हमरो बजट बन जही फेर कतको बखत कोशिश कर के देख डरेंन कोनो साल हमर बजट बनबे नइ करे. हम हाँसन के रोवन? अब हमरो बजट बना दे दीदी. उल्टा-पुल्टा अचानक आ के बजट आमदनी के चटनी पिस देथे.

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पूर्ण आत्म-विश्वास
लालबुझक्कड़ किहिस-माननीया केन्द्रीय मंत्री निर्मला दीदी पूरा आत्म-विश्वास के साथ किसान-समस्या, बेरोजगारी, मंहगाई ,कोरोना-संकट, गरीबी, धुकुर-धुकुर करत अर्थव्यवस्था के बीच बजट बनइस. पक्ष-विपक्ष के नेता, अर्थशास्त्री, बैपारी, उद्योगपति आदि मन बजट उपर अपन महान परम्परा के अनुसार विचार परगट करिन. ज्यादातर नेता मन बजट पेस होय के पहिलीच सोच ले रहिथें के बजट उपर का बोलना हे.

कतको झन मन अपन पार्टी-सुवारथ के चश्मा म बजट ल पढ़थें. बजट समझ म आय चाहे झन आए सत्ता पक्ष शानदार बजट कहिथें. खूब बड़ई करथें. विपक्षी दल के नेता मन बजट के जम के निंदा करथें. तटस्थ समीक्षा के परम्परा खतम होगे. जनता बजट-राजनीति ल का जानें. आम मनखे टुकुर-टुकुर देखथें-पर(दुसरा) के मुहूँ के बात सुनथें? कुल मिलाके अपन हित के हिसाब से बजट पढ़े-सुने बिन बजट के आपरेशन कर डरथें. दु-चार दिन के औपचारिक हल्ला-गुल्ला करना जरूरी होथे. एखर से जनता देखथे, सुनथें के हमर नेता मन कतेक मिहनत करत हें.

चटनी-पिसावत हे
गोबरदास किहिस-आम मनखे के तो भगवान मालिक हे. बड़े-बड़े मन के बीच म ये आम मनखे कहाँ ले आ जथे? छोड़ो ओखर बात. ओखर बर त भगवान सरकार ल प्रेरना देवत रहिथें. मध्यम वर्ग गहूँ के कीरा आय. सरकार कखरो होय ओला पिसाना हे. ओखर लोकतंत्री भाग म इही लिखाय हे. ओहा चटनी बरोबर सुंदर पिसा जथे. चिंवचांव् नइ करय. अभी त सबके आँखी म किसान झूलत हे. केंद्र सरकार घेरी-बेरी बइठका बोलावत हे. हमर संग गोठियाव काहत हे. सरकार किसान-किसान के तंबूरा बजावत हें.

किसान के अलावा …
लालबुझक्कड़ किहिस-किसान के अलावा सरकार ल इन्कम टैक्स देवइया मन के चिंता बिल्कुल नइ हे. किसान अन्नदाता हे. ओखर मान तो होना ही चाही. फेर केवल किसान-किसान के धुन ले जनता मन अब उखड़त हे. जीवन भर टैक्स उपर टैक्स ले के बाद घलो सरकार के भूख नइ मरे. रिटायर वरिष्ठ नागरिक मन ल घलो निचोय बर नइ छोड़े. पछहत्तर( 75) साल के वरिष्ठ नागरिक मन के आमदनी ये बजट म टैक्स फ्री करे के घोषना करे गे हे. होना त ये चाहिए रिहिस के पेंशन आश्रित सबे वरिष्ठ नागरिक मन ल टैक्स मुक्त कर दे जाय. इहाँ मिहनत करइया मिहनत करत हें. अउ फोकट के ठलहा ल सरकार पोसत हे. अंधेर नगरी चौपट राजा कस परम्परा कई-कई दसक ले चले आवत हे.

‘फ्री’ अउ ‘माफ़ ‘कुरसी अस्त्र
गरीबदास किहिस- छूट उपर छुट पवइया मन सरकार ल हुमेंलत हें. टैक्स पटइया मन के पइसा नकली गरीब मन जादा डकारत हें. ‘करजा माफी’ अउ ‘फ्री’ के बीमारी जनता के आदत ल बिगाड़ दे हें. जनता म टैक्स पटाय के आदत डारे बर छोड़ के ‘फ्री अउ माफ़’ अस्त्र कुरसी पाय बर काम म लाय जथे. राजनीति के महापंडित मन जनता के आदत ल ‘फ्री’ करके उनकर घुटना ल कमजोर कर दे हें. उन ल अपन गोड़ म खड़े होय के लइक नइ राहन दे हें. हम त बजट के गहीर म जाना नइ चाहंन. जोंन हे तोंन हे. सस्ता अउ माँहगी के फेर म का परना, सब झेले के आदत परगे हे. हर बजट मन मोहथे. व्इसने यहू बजट मन मोहत हे. मनमोहिनी बंशी बजाय म पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन जी कुशल रिहिन.

गाँव अउ किसान
खबरीलाल किहिस-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी सार बात किहिस-बजट के दिल म गाँव अउ किसान हे. विपक्षी अब बजट के दिल ल देख के बेड फील करत हें. देश के आँखी म किसाने-किसान हे. जोंन किसान नइ हें उन ल किसान बन जाना चाही. किसान अन्नदाता हे. नेता मन किसान ल अपन अपन डाहर तिरना चाहत हें. राजनीतिक पकड़ चलत हे. बड़े-बड़े सूरमा अपन खोपड़ी चिन्तन म खपावत हें, अभी किसान राजनीति के सूत्र हे.

ज्ञानू के ज्ञान दान
ज्ञानू भाई ज्ञान दिस. किहिस-बजट हमर बर अबूझ पहेली आय. हम हाथी के गोड़ ल सूंड़ काबर कहिबोंन. अउ सूंड़ गोड़ सिद्ध करना हमर बुता नोहे. सबके भला होना हे. देश ल आत्म-निर्भर बनाना हे.

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