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छत्तीसगढ़ी व्यंग्य- कका अउ बबा के लीला

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य- कका अउ बबा के लीला

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‘हे! बबा, तोर-तियाग अउ कुरसी अनुराग ल सबे झन जानत हें. ‘अभी नहीं त कभी नहीं’ ये बात ल पक्का जान. हाईकमान के साधना कर. सुते भाग ल उठा, बुता म लगा, हाईकमान के वंदना कर, भक्ति-भावना के परसाद खवा’.दरबार म देर हे फेर अंधेर नइ हे’. बबा आगासबानी सुन चकित होइस. मने-मन म सोचिस ये जुग म घलो का आगासबानी होवत होही ? बबा ह राजनीति के कूट भाषा म बोलत-सुनत हैरान होगे राहय.

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कका एक दिन अकेल्ला मंजीरा बजावत राजनीति के गीत गावत तरिया पार म मगन मन जावत राहय. दुसर डहर ले बबा राजनीति के खन्झेरी बजावत आवत राहय. तरिया(तालाब) के बीच खंभा के फुलगी म बइठे लाल मुहूँ के बेंदरा एकटक कका अउ बबा के लीला ल देखत राहँय. कका हर बड़े जान अमली के पेड़ म चढ़ के तिलिंग म पहुंचगे. उहें बइठे-बइठे बड़ उंच होगे. आगासबानी(आकाशवाणी) होइस. हे! कका तोर कद हर बाढ़गे हे. कका चारों खुंट देखिस उप्पर-नीचे अउ बीच म कोनो नइ हे. फेर कोन नरियावत हे ? कका के बेचैनी बाढीस मंजीरा ओखर हाथ ले छूटगे. फेर आगासबानी होइस ‘हे! कका अब तेंहा छोटे-मोटे राज्य के चिंता-फ़िकर छोड़ एकदम से राष्ट्रीय स्तर के नेता होगे हस. छोटे राज्य के चिल्ल-पों ल छोड़. राष्ट्र के चिंता कर’. कका ल कुछ समझ नई परिस के अतेक सार आगासबानी कोन करत हे. अउ झट पाका अमली चुसत-चुसत अमली के विशाल पेड़ ले सरसर सरसर उतरगे. कका के अमली पेड़ ले उतरते साठ राजनीतिक आत्म-बोध होइस. वईसने आत्म-बोध जइसे महात्मा गौतम बुद्ध ल होय रिहिस. कका के आत्म-बोध तियाग वाले नइ रिहिस. मोह वाले मोह-बोध रिहिस.

राष्ट्रीय स्तर के नेता

कका ल गियान होइस के दुनिया के सब जीनिस भोग बर आय. तियाग-वियाग का करना. घंटी बजाव परसाद पाव. क्षेत्रीय नहीं राष्ट्रीय बनो. हे! वीर कका, मंजीरा उठा अउ बजात चल. खुलके हाईकमान के भजन गा. कुरसी तियागे ले पता नहीं कब कुरसी मिलही, मिलही के नहीं कोन जनी ! दुबारा चांस लगही के नइ लगही. उत्तर बहुत कठिन हे. अत: हे! कका तेंहा राष्ट्रीय स्तर के बन फेर लोकल चेयर ल घलो चमचम ले धरे राह. मंजीरा बजा, हाईकमान के गुण गा’.नाच-कूद अउ डंडा पिचरंगा खेल. कका झट मंजीरा बजावत खुशी-खुशी म अपन घर लहुटगे. कका ल काकी पूछ परिस-कस हो, बिना नहाय तरिया ले आगेव कइसे चेत-बिचेत दिखत हव. कका किहिस-तोला इहाँ नहाय के बात सूझत हे ! मोर चेत ह बिचेत नइ लगत हे. सुन, मोला अमली पेड़ म चढ़े-चढ़े आत्म-गियान होगे. मेंहा राष्ट्रीय स्तर के नेता होगेंव. देख मोर डाहर, मोर कद बाढ़े कस नइ दिखत हे ?, काकी हर कका के आत्म-गियान ल चुनौती नइ देना चाहिस. अउ झटकुन किहिस- हाँ, तुंहर कद बाढ़े-बाढ़े कस दिखत हे. मोला का, बस्ती के सबो झन ल इही दिखत हे’. कका खुश होइस अउ वोला पक्का लागिस के मेंहा सपना नइ देखत हंव, मोला राजनीति के सत्य-बोध होगे हे. अउ झट घोड़ा म बइठ के राजकाज देखे बर राजधानी डाहर निकलगे.

अटकल पंचे डेढ़ सौ

ओ डाहर बबा राजनीति के खन्झेरी बजावत अचानक लाल मुहूँ के बेंदरा डाहर देख परिस. ललमुहा बेंदरा, बबा ल देख के खिखियावत राहय. मुड़ हला-हला के चिढ़ावत जनाइस. बबा तरिया अस्नान करके पीपर तिर के मंदिर म पूजा-पाठ करिस. पीपर पेड़ ल परनाम करके सबके स्वस्थ अउ सुखी जीवन के मंगल कामना करिस. बबा तियागी मनखे ताय. हाईकमान डाहर उम्मीद के तार म लटके-लटके देखत हे. घेरी-बेरी खन्झेरी बजावत हाईकमान के भजन गावत हे. अचानक तरिया के पार ले आगासबानी होइस. ‘हे! बबा, तोर-तियाग अउ कुरसी अनुराग ल सबे झन जानत हें. ‘अभी नहीं त कभी नहीं’ ये बात ल पक्का जान. हाईकमान के साधना कर. सुते भाग ल उठा, बुता म लगा, हाईकमान के वंदना कर, भक्ति-भावना के परसाद खवा’.दरबार म देर हे फेर अंधेर नइ हे’. बबा आगासबानी सुन चकित होइस. मने-मन म सोचिस ये जुग म घलो का आगासबानी होवत होही ? बबा ह राजनीति के कूट भाषा म बोलत-सुनत हैरान होगे राहय. बबा ह मने मन भुनभुनइ,. ठसलगहा परिणाम कब निकलही एला कोन बताय ? अभी त अटकल पंचे डेढ़ सौ वाले गणित चलत हे.

ठीक हे कका सरिख बबा के भाग ऊँच नइ हे. फेर भाग के खेल ल खेले बर लागही न, बबा घेरी-बेरी उड़ के मायालोक आथे-जाथे. अस्पताल के कुरसी म बइठे-बइठे झपकी घलो आ जथे. बबा ह परेम के डोर म बंधाय हे. कतको बगुला भगत मन बबा उपर नजर गड़ाय रहिथें. बबा माया-लोक डाहर देखत हे.

(शत्रुघन सिंह राजपूत वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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