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छत्तीसगढ़ी व्यंग्य - जीभ के खसल-पट्टी

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हमर देश के राजदुलरवा-राजदुलौरिन नेता मन के जीभ ले शब्द खसलना आम बात होगे हे. उन एक आँखी म रोथें, एक आँखी म हाँसथें. बानी (वाणी) के संयम रख के मान-सम्मान से बोलना नंदावत जावत हे ? बोल के स्तर गिरते जावत हे. अउ कतेक गिरही?.

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बरीलाल ह लालबुझक्कड़ ल किहिस- ये जीभ (जिव्हा) ह शब्द के खसल-पट्टी बरोबर होथे. खसल-पट्टी म लइका मन सीढ़िया-सीढ़िया उप्पर चढ़ के खाल्हे डाहर खसलथें. खसलइया ल उप्पर चढ़ेच बर परथे. हमर देश के राजदुलरवा-राजदुलौरिन नेता/नेत्री मन के जीभ ले शब्द खसलना आम बात होगे हे. उन एक आँखी म रोथें, एक आँखी म हाँसथें. बानी (वाणी) के संयम रख के मान-सम्मान से बोलना नंदावत जावत हे? बोल के स्तर गिरे उपर गिरत हे. अउ कतेक गिरही ?

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आन-तान-अम्मठ-बिच्छ्ल बोल !
लालबुझक्कड़ किहिस- झूठ-सच ल एकमइ करके उर्राय कस, टेंड़वाय कस, अम्मठ-बिच्छ्ल, मिरचा-मसाला मिंझरा करके आन-तान बोलना बड़े मन के बोल होगे हे. नेताजी मन बात ल मथना सीखगे हें. बानी ताय कभू अपने-अपन खसल जथे. अगड़म-बगड़म बोल मीडिया म छा जथें. झूठ के धुंगिया म कटकट ले बुद्धि के भीतरे-भीतर अंधियार हो जथे. एक नेता के राजनीतिक उलटबांसी (उल्टा-बोल) ल दूसर नेता मन झट झपट लेथें अउ अपन चिकारा बजाना शुरू क्र देथें. छिंकथें कोनो, नाक कोनो ल कटवाय बर परथे. झार कांवेंच-कांव ताय. उन जब सदन म अइसना कांव-कांव करथें तभो उन ल पूरा पगार मिलथे. कतको झन बकवास करेच के पगार पाथें. ढेंचू-ढेंचू के खूब गूँज होथे ? गिरे बोल ल मीडिया घलो घेरी-बेरी उठाथे. इंकर बांग देय ले फजर (सुबह) होथे. लोकतंत्र अइसन मन के आभारी हे.

न नाप, न तोल: बिगड़े बोल

खबरीलाल किहिस- भाई, नेता मन के जीभ म शब्द बांटी बरोबर ढुल जथे. कभू अड़ जथे, मौक़ा देख के अड़े शब्द ल नेताजी मन ढकेल देथें. अक्षर अविनाशी होथे. अक्षर टूट के येती-वोती छटके नहीं. देश के माथा म चटक जथे. अक्षर ले शब्द बनथे. मनखे के मुख ले शब्द भारी लापरवाही के संग जीभ से खसलथे. बोलइया ल लगथे के अरे! मेंहा का बोल डरेंव? बोल बिगड़थे तब अरथ (अर्थ) घलो बिगड़थे. हंगामा होथे.सदन के एक दिन सिरा जथे. ये सिलसिला चकरी बरोबर चलत रहिथे. मुख्य मुद्दा हल्ला म गंवा जथे.

लवछरहा बोलइ
लालबुझक्कड़ किहिस-आम मनखे के मुँह ले लवछरहा बोलइ हो जथे. कतको झन बोले के बेरा मुक्का हो जथें. बोल नइ फूटे. अगड़म-बगड़म बोल डरथे. कोनो-कोनो सोच समझ के उलटा-सीधा उछरथें. नेताजी मन त अपन आका के इशारा के सहारा पा के उलजलूल उछरथें. जे ठन डफली, ते ठन राग होथे. कतको झन के मुहूँ ले बक्का नइ फूटे. गोखरू काँटा बरोबर शब्द नरी म अलकरहा गड़े-गड़े लागथे. कभू-कभू फांस कस गड़े-गड़े जनाथे. मनखे अटक-भटक जथे. कभू जीभ के खसल-पट्टी ले अपने-अपन गलत बोल खसल जथे. कतको झन के जीभ से शब्द अइसे खसलथे के संबंध बिगड़ जथे. कभू बिगड़े बोल निशाना म लगथे अउ बुता हो जथे. शब्द सर्जरी घलो करथे. शब्द चुप रहिके विस्फोट कर देथे. मौनी बाबा मन के अवगुन सब गुनेच-गुन मान ले जथे. बड़े-बड़े मन शब्द ल मसलथें तब जबान खसलथे.

चार दिन चिंवचाँव
खबरीलाल किहिस-नेताजी मन के जीभ खसलपट्टी ले शब्द मन ल जानबूझ के ढकेले के आदत आम बात हे. नेताजी मन के जीभ खसलना आम बात होवत जात हे. चार दिन चिंवचाँव होथे तहाँ ले कांव-कांव बार दुसर विषय आ जथे.‘खेल खेलाड़ी के, पइसा अउ जोश मदारी होथे. खेल खतम, पइसा हजम. नेता मन एक दुसर के जीभ ल सुरेरथें. बाद म सब भाई-भाई होथें. जादू खतम. जनता गम्मत देखत-देखत दिन बीते ले सब भुला जथें. नेता मन खुदे ओसाथें हें, खुदे फूनथें हें. खेल देखइय्या नेता दूरिहा (दूरदर्शी) ले कलेचुप मुसुर-मुसुर लड़वा खावत रहिथें. छोटे नेता मन के लपर-झपर म जिनगी पहा जथे.उन दरी बिछावत-बिछावत उन बूढ़ा जथें.

पीढी-दर पीढी राज-काज
लालबुझक्कड़ किहिस-केहे गे हे ‘बातन हाथी पाइए, बातन हाथी पाँव’. बानी मीठ हे त हाथी मिल सकत हे, बानी करू-करू हे त हाथी ह अपन गोड़ म रउंद सकत हे. मछरी के लइका ल पानी म डूबके बर सिखोय बर नइ लागे. व्इसने नेता के संतान अपन दाई-ददा के रंग ढंग ल देख-सुन के अपने-अपन नेता हो जथें. हमर देश के राजनीति म पीढी-दर पीढी राज-काज करे के अउ सदा सुख भोगे के रीत चले आत हे. जेन टेकनी, सीढिया या पंदोली के बिना कुरसी पा लेथें तेंन ह लोकतंत्र के खानदानी-राजा मन ल कांटा बरोबर गड़थे. ओखर बानी कांड़ खिला ठोके कस बियापथे. बोल ह पोल खोले कस जनाथे.जनता के बंद आँखी अब खुलत हे. अब बोल मीठ होय के सिटठा, करू होय या गरू, उल्टा होय या सीधा, टेड़गा-बेड़गा होय के सोझ तीर मारे कस या तलवार चले कस जनता सवाल पूछना शुरू कर दे हे. अब सवाल दनदनावत निकलथे. झूठ के चीर-फाड़ होथे. झूठ के परदा हवा म उड़ा जथे. (डिस्क्लेमर: ये लेखक की निजी व्यंग्य रचना है, जिसके प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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