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छत्तीसगढ़ी व्यंग्य- बड़ उदार हे गा हमर कका

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बाक्स ............. कका ह बने ठेठरी, खुरमी , चौसेला खावत पियत हवाई जिहाज के खूब मजा लेथे. हर समे सरकारी थैला ल धर के आथे-जाथे. जिहां आँसू पोंछना हे, उहाँ कका अपन सरकारी थैला-थैली ले ओखर आँसू पोंछ देथे. उपर वाले के भजन अउ भक्ति करे ले ओला फूल पावर मिलथे. फेर कका कोनो ल नइ घेपे.

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कका मन बड़ उदार होथें. जेखर बर खुश होगें तेखर बर सब हाजिर हे. अपन का, दुसर पारा, पास-पड़ोस म दान-पुन्न करत रहिथें. कका दुर्घटना ले दुखी मन के दुःख हरथे. अउ झट दुःख हरण बन के अव्वल आ जथे.अपन घर के चिंता म नइ दुबराय. एकदम फ्री हेंड हे. घर-बाहिर सब सेट हे. जो करना हे झटपट करथे. रूपिया-पइसा के दुकाल-सुकाल के का रोना, रोना !! कका बर सब समय समान हे. झट स्वीकृत कर कर देथे. सब उपर वाले के माया हे. उपर वाले खुश तब दुसर के का परवाह करना? इही बने सोच आय. माया-लोक के लीला सब के समझ म नइ आय. बुझक्कड़ बुझत राहंय !! जेला नइ सूझे तें बाल के खाल निकालत राहे. कका रेंगथे त आँखी मूंद के रेंगथे. हम ल त अगास म दिखइया हर हवाई जिहाज म कका बइठे हे तइसे लागथे.

कका चार्ज हो जथे

कका ह बने ठेठरी, खुरमी, चौसेला, अउ अंगाकर रोटी खावत पियत हवाई जिहाज के खूब मजा लेथे. हर समे सरकारी थैला ल धर के आथे-जाथे. जिहां आँसू पोंछना हे, उहाँ कका अपन सरकारी थैला-थैली ले ओखर आँसू पोंछ देथे. उपर वाले के भजन अउ भक्ति करे ले ओला फूल पावर मिलथे. फेर कका कोनो ल नइ घेपे. बड़े- बड़े मन के खबर लेवत रहिथे. अब तो ओहा राष्ट्रीय स्तर के होगे हे. ओखर घर दुआरी म एक झन बबा हर खांसत-खोखत रहिथे. ओखर करा एक ठन जादू के बटन हे. ओ बटन ल दबाय ले झनझनाहट होथे. कका अपन बुता म लगे रहिथे खलखला के हाँसत-हाँसत अचानक अटके ल धरथे. ओला लगथे के उपर वाले मन ओखर सुरता करत हें. किरपा बरसावत हे. थोरकुन तनाव महसूस होथे. कका झट हवाई-जिहाज म सुबह उड़ के दुपहरी नहिं त संझा जुआर लहुट जथे.ओखर उपर उप्पर ले फेर किरपा बरसथे. कका चार्ज हो जथे. ओखर पावर के नवीनीकरन होथे.

माया-लोक आना-जाना

घर के बबा हर कम बोलथे. अउ बोलथे त सूत्र वाक्य म बोलथे. जे झन मनखे ते झन ओखर अपन-अपन सोच के अनुसार नवा अरथ निकालत रहिथें. लोगन सोचथें बबा काबर चुप रहिथे. अर! बबा हर जानथे चुप बरोबर सुख नहिं. कका बड़े खेलाड़ी हे. जउन खेल खेला ले ओला खेले अउ जीते बर आथे. नवा-नवा खेल के रचना करना सीख गे हे. कखरो चिंता फिकर नइ करे. खुदे मुखिया हे. उधारी-बाढ़ी करके लाने रूपिया पइसा के थैली के मुहूँ ल खोल देथे. बबा कभू-कभू दुखी जीव लागथे. राजा बरोबर उदारता साफ़ दिखथे. बबा सब ल झेलथे. कका ल घलो झेल लेथे. सब उपर नीचे झेलथें. बबा घलो अचानक हवाई-जिहाज म उड़ा के छूमंतर हो जथे. कतको झन के बइठे कान खड़े हो जथे. कका अउ कका के सब संगवारी मन खबर सुन के झकना जथें.कथें ये बबा घलो सोझ बाय नइ बइठे. वुहू ह माया लोक के दौरा मारथे. बबा उपर घलो माया-लोक के छत्र-छाया हे. फेर किरपा कका उपर बरसत हे. बबा फेर परगट हो के सूत्रात्मक भाषा म जब गोठियाथे. तब कका के कान खड़े हो जथे. कका अउ बबा ल जनइया मन फेर खिच्ररी चुरोथें. उपर वाले मन कका ल मुखिया बनाय हे. बबा के राहत ले कका मुखिया कइसे हो सकत हे? बबा खुदे कका ल मुखिया मान लिस होही. कका ल मुखिया बने के संउख जादा रिहिस.

बिना लिखा पढ़ी के अधियारा

बबा बुढापा म धीरज धरिस. उपर वाले के माया लोक म कोन जनी का होइस? कका मुखिया बनगे. बबा पछ्वागे. जब बबा रिसइस त माया लोक हालगे. उपर वाले किहिन अभी कका ल मुखिया बनन देव. अधियारा मन कस बाद म बबा मुखिया बन जही. बबा सोचिस बुढापा म किस्मत खूब खसलत हे. बबा फेर धीर धरिस. कका मुखिया बनिस. धड़ाधड़ निर्णय उपर निर्णय लिस. घर-बाहिर हरियागे, बबा के सपना छरियागे. कका अपन नवा माया-लोक के रचना करिस. उपर के माया-लोक के दूत ल खुश अउ बहुत खुश करिस. बबा ह समझ नइ पइस के कोन किसम के जड़ी उपर वाले के परमानेंट दूत ल खवाय गे हे. अधियारा ल देख के अपन मुड़ डोला देथे. कका अपन किस्मत के खूब पूजा-पाठ करथे. ओखर मीठ-मीठ परसाद अपन संगी मन ल चुन-चुन के बाँट दिस. ओ परसाद म बड़े-बड़े गुन हे. कका के हाथ के परसाद खवइया मन के भाग खुलगे. उन एक दर्जन, दु-दर्जन, तीन दर्जन के संख्या म हवाई-जिहाज म माया-लोक के सैर-सपाटा करके लहुटगें. उन कका के झंडा माया लोक म गाड़ के आ गें. कका अउ बबा आघू-पाछू होवत रहिथें. कका हर अपन सुलगत घर ल छोड़ के दुसर पारा म मया देखाथे.

गइस भंइस पानी म

बबा के मुखिया बने के सपना भांवर कस घुमत रहिगे हे. पड़ोसी मन कथें कब कका हटहि अउ कब बबा बरा खाही ? माया-लोक वाले मन अपन गियान के भभूत खवा के बबा संग मीठ-मीठ गोठिया के बबा ल बिदा कर देथें. सुने हन के बबा ह अपने चकरी म घुमत हे. अकेल्ला भन्नाटी चालत हे. कका ह बड़ चतुरा हे, अधियारा वाले बात ल मेटत जात हे. अब बबा का करे? अपन संगी मन ल खुदे धीरज धरावत नइ थकत हे. ये महीना नहिं त ओ महीना मुखिया बनी जहूँ अइसना काहत रहिथे. खलबत्ता म जड़ी-बूटी कूटत बुदबुदावत रहिगे हे. कका ह राम-वन-गमन पथ म रेंगत-रेंगत अवइया मौसम म फेर मुखिया बने के उदिम करे हे. अउ बबा ल ये जनम म मुखिया बने के नौबत अइ दिखत हे. मुखिया बने बर माया-लोक के छल से सब सपना बिछलत हे. ये बखत ल लागत हे गइस भंइस पानी म.

कका बेदम खुश हे. घर समेत बाहिर के घलो सियान बनगे. हवाई-जिहाज म उड़त-उड़त पूरा देश ल देखत हे. उपर वाले खुश हें. खाल्हे डाहर सब सेट हे. बबा बेदम दुखी हे. ओखर बुता जनकल्याण बर बस जड़ी-बूटी कूटना हे. बबा सोचत हे सब उपर वाले के माया हे. हम हुकुम बजावत हन.

(शत्रुघन सिंह राजपूत  वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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