छत्तीसगढ़ी व्यंग्य - फ्री-जीवी, भरम-जीवी अउ आंदोलन-जीवी

.

.

राजनीति म परजीवी, श्रमजीवी, ‘फ्री’ जीवी, भरम-जीवी, सपना-जीवी आदि के खूब जुगाली होवत हे. प्रश्न खड़े हे ,प्रश्न दिमाग म कसरत करत हे, प्रश्न धूम मचावत, प्रश्न आतंकजीवी होगे हे, प्रश्न जोर जोर से हल्ला करत हे. हर प्रश्न हल्ला-जीवी लगत हे.

  • Share this:
खबरीलाल कुछ दिन से अपन (स्वयं) खोज म भिड़े हे. अपने-अपन म खोय-खोय अपन खोज करना बड़ कठिन हे. खबरीलाल के मुख म संझौती सवा-सात/साढ़े-सात बजे रहिथे. बर पेड़ के छंइहा म बइठे-बइठे लालबुझक्कड़ खबरीलाल के मुख मंडल ल देख के पूछिस-भाई, खबरी तोर मुख ह तुतरू बरोबर काबर दिखत हे? खबरीलाल अति-गंभीर हो के किहिस-तेंहाँ मोर बेचैनी ल नइ जानत हस गा. आजकल मोरो बहुत सोचे के आदत परगे हे. लालबुझक्कड़ किहिस-जादा सोचइया मन जल्दी रेंग देथें (मर जथें). एक त तेंहा हस ठन ठन गोपाल अउ वुहू म कोरा जन-सेवा के सोच! एमा कतको झन धारों-धार बोहा जथे. खबरीलाल अपन मुख म दार्शनिक-भाव लाके किहिस-मेंहा खबर के आपरेशन करथों. लालबुझक्कड़ किहिस-आजकल त चारों खुंट खबरेच-खबरेच हे. एक खबर चिरई बरोबर फुर्र ले आथे अउ फुर्र ले उड़ा जथे. दुसर, तीसर.. खबर सब आवत जावत रहिथे. खबर काये? आजकल ‘एक दूसर के मुड़ उपर गोबर थोपना ताय जी .’ जनता ल जादू देखाना हे. ताली बजवाना, शो खतम. न जनता गंभीर, न नेता गंभीर. अब त खबर पढ़ के मनोरंजन घलो नइ होय. काबर के वुही रोगही, दुखाही के झगरा कस ताय जान. ये बात सुन के संतराम किहिस-बुझक्कड़ भैया, बिन बादर घलो बरसात होथे. नेता मन अपने कद ल खुद बढ़ाथें-खुद घटाथे.

ये भी पढें : छत्तीसगढ़ी कहिनी - सुरता के छइहाँ म एक दिन

जनतंत्र सेवक
खबरीलाल किहिस-भैयाजी राजनीति म परजीवी, आंदोलनजीवी, श्रमजीवी, ‘फ्री’ जीवी, भरम-जीवी, सपना-जीवी आदि के खूब जुगाली होवत हे. प्रश्न खड़े हे, प्रश्न दिमाग म कसरत करत हे, प्रश्न धूम मचावत हे, प्रश्न आतंक-जीवी होगे हे, प्रश्न जोर जोर से हल्ला करत हे. हल्ला-जीवी लगत हे, प्रश्न आजाद हे, ओखर करा लोकतांत्रिक आजादी हे, प्रश्न अभिव्यक्ति के सुतंत्रता के शव परीक्षण करत दिखथे. जनतंत्र के सेवक हाई-फाई हें. उनकर जुबान कैंची ले जादा तेज चलथे. आजकल तो मर्यादा-तोड़ शब्द उगले, शब्द चबाय औ शब्द-बाण चलैय्या शूरबीर मन के जय-जय हे. बोले के मर्यादा अउ सभ्यता राजनीति के खूंटी म टंगाय हे. एहा भारतीय गणतंत्र के नवा परम्परा होगे हे. लालबुझक्कड़ किहिस-भाई,पहेली झन बुझा डायरेक्ट मुद्दा म आ. खबरीलाल किहिस-हमर देश म आजकल आतंकवादी, दंगावादी, नक्सलवादी, सम्प्रदायवादी ये शब्द खूब घिसावत हे. ये आसन मार के बइठे हें. इनकर घर्षण से आतंक के चिन्गारी निकलत हे. देशभक्ति सालों-साल ले दुखी हे. आखिर ये सब कब तक अइसने चलते रइही? एड़ी के रिस तरवा म चढ़ही? नेता मन त सब एके खेत के ढेला बरोबर हें.
आंदोलन-जीवी,


संतराम किहिस-परजीवी सदा सुखी होथें. ‘मिहनत करे मुरगी अउ अंडा खाय फकीर’ कस. ओ सदाबहार चिपकू होथें. फल खाय से मतलब, पेड़ गिन के का कर लेबे? खबरीलाल किहिस-आँदोलनजीवी शब्द किसान आन्दोलन के संदर्भ म हमर प्रधानमंत्रीजी केहे रिहिस. जिहां आन्दोलन होय उहें जम जाव. खाना-पीना, नास्ता, सत्कार, मस्त जीना, सब फ्री. हमर देश म आजकल बात-बात म आन्दोलन करे के नवा रिवाज हे. न रूपिया के चिंता न पइसा के फ़िकर. सब व्यवस्था फ्री. कब तक बइठना हे? कहाँ बइठना हे? ऋतु के अनुसार चार्ज फिक्स हो जथे. चेहरा बदलना आना चाही. नारा कतेक जोर से लगाना हे, झंडी-झंडा देखाय के चार्ज अलग. का रोकना हे? सड़क मार्ग, रेल मार्ग, जल-मार्ग, आकाश-मार्ग आँदोलन-जीवी चार्ज के अनुसार सब करतब देखा सकत हे. एखर से आँदोलन-जीवी मन के फेमस होय के चांस बाढ़ जथे. पूरा मीडिया म आन्दोलन के खतम होत ले फ़ोटू अउ खबर छपना हे ये ह का, कम बड़े उपलब्धि आय.

बुद्धूराम पूछिस-आँदोलन-जीवी होय बर का योग्यता होथे? खबरीलाल किहिस-आँदोलन-जीवी होय बर अनपढ़ अउ बहुत पढ़े-लिखे म कोनो अंतर नइ होय. समानता के महामंत्र हे. इही महामंत्र आँदोलन-जीवी मन बर घलो लागू होथे. जइसे हाथी के दांत खाय के आन अउ देखाय के आन होथे वुसने ये महामंत्र के गुण घलो होथे. आंदोलन-जीवी होय ले देख-विदेश म मितान के तार अपने अपन जुड़ जथे अइसे सुने गे हे. बुद्धूराम पूछिस-आन्दोलन-जीवी कहाँ ले जनम लेथें? खबरीलाल किहिस-हमर देश के राजनीति के भीतरे भीतर जोंन खोलखा(खोखलापन) हे, वुहें ले आन्दोलन-जीवी खोख्सी मछरी कस जनम लेथें. ये मन चिरंजीवी होथें. नेता मन के बोल जोंन मिट्ठू कस आन्दोलन-स्थल म फूटथे ओमा आन्दोलन-जीवी मन के ताकत होथे. आजकल आन्दोलन घलो हाई-प्रोफाइल होगे हे. नवा-नवा सोच आयात-निर्यात होवत रहिथे. बुद्धूराम किहिस-धन्य-धन्य हें आन्दोलन-जीवी. ये आन्दोलन-जीवी अनमोल रतन से कोनो आन्दोलन म खंबा नोचवा लेव ये मन अपन बुता म कुशल हें. आप चाहो तो ये खंबा नोचू अपन मुड़ के बाल नोंचू घलो हो जथें.

भरम के जोर
खबरीलाल किहिस-श्रमजीवी मिहनत करथें. मिहनत के रोटी, दार-भात, बासी खाथें. श्रम-जीवी मन के जय जय हे. हमर विशाल देश म भरम-जीवी भी हें. इनकर काम महान हे. जन-मन म भरम पैदा करना इन खूब जानथें . इन मशीन बरोबर काम करथें. भरम फैलाय के ठेका इनकर होथे. सच ल जानना अउ झूठ पैदा करना. इन झूठ अतेक जोरजोर से बोलथें के लोगन ल सच सुनाबे नइ करे. आजकल झूठ-बोलवा मन के बल भीमसेन के दस हजार हाथी वाले बल ले जादा हे. बुद्धूराम पूछिस- भीमसेन के बल ले घलो जादा कइसे? खबरीलाल भैय्या, अब आपो जादा झन फेंको. कहाँ भीमसेन अउ कहाँ... खबरीलाल किहिस-बुद्धू, भरम-जीवी मन बड़ चतुरा होथें. मारथें मूड़ बताथें गोड़. झूठ फैलाय म उन ल सिद्धि हासिल होथे. झूठ बोना, झूठ लूना, झूठ ओसाना, झूठ नापना, अउ झूठ देखाना उनकर बुता होथे.

‘फ्री’जीवी
‘फ्री’-जीवी, स्पेशल वोट बैंक होथें. ये मन सब सुविधा के हकदार होथें. ये लक्षण वाले सब जगा मिलथें. फोकट-जीवी या ‘फ्री’जीवी राजनीति म शंभू कका ल लेके भोकलू ममा तक होथें. ये मन मारथें चांटी अउ ओला सिद्ध करथें शेर. लालबुझक्कड़ किहिस-हाँ, अउ हमन सब का आन? खबरीलाल झट किहिस-हमन सब सपन-जीवी आन. सूतत,जागत सपना देखना, सपना म जीना, सपना म मरना हर बात ल फरिहा –फरिहा के देखना हमर आदत होगे हे. प्रश्न उठाथन, प्रश्न बइठारथन. नेताजी मन सपना देखाथें, हम सपना देखथन. लालबुझक्कड़ किहिस-राजनीति तो मायाजाल अउ मया-जाल आय. मन मोह लेथे. चकाचक चमकथें अउ अंधियार ल अंजोर कथें. हम अंजोर डाहर जाय के सपना देखत-देखत राजनीति के पतन के गवाही बन जथन.( डिसक्लेमर- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज