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छत्तीसगढ़ी व्यंग्य- जइसे मदारी के बाजा वइसने बेंदरा के नाचा

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य- जइसे मदारी के बाजा वइसने बेंदरा के नाचा

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बंशी कका आव देखे न ताव झट खुदे नाचे बर धर लेथे. जस-जस बाजा घटकथे तस-तस कका मटकथे. ओखर गोड़-हाथ अउ तन बदन नाच म अटकन-मटकन होवत रहिथे. भोला बबा जुन्नेट मनखे आय लटक-मटक नइ जाने. फेर संगति म सब जायज होथे. ‘जेखर जइसे संग ओखर वइसने रंग’. बबा कई बखत अइसना संगति म दुरिहा ले आनंद लेय बर जानथे. राजसी ठाठ-बाट ल भूला के सादा जीवन जीना पसंद करथे. शांत चित्त दिखथे. बंशी कका रंगीला हे. चारों खुंट शाट मारत रहिथे.

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बंशी कका हर नाचे-कूदे म माहिर हे. नचइया मन जब बिधुन हो के नाचत रहिथें तब ओखरे मन के जोश म खुदे उमड़ जथे. कका आव देखे न ताव झट खुदे नाचे बर धर लेथे. जस-जस बाजा घटकथे तस-तस बंशी कका मटकथे. ओखर गोड़-हाथ अउ तन बदन नाच म अटकन-मटकन होवत रहिथे. भोला बबा घलो जुन्नेट मनखे आय. ओहा लटक-मटक नइ जाने. फेर संगति म सब जायज होथे. ‘जेखर जइसे संग ओखर वइसने रंग’. बबा कई बखत अइसना संगति म दुरिहा ले आनंद लेय बर जानथे. राजसी ठाठ-बाट ल भूला के सादा जीवन जीना पसंद करथे. शांत चित्त दिखथे. बंशी कका रंगीला हे. चारों खुंट शाट मारत रहिथे. मउका परे ले रो-गा के मेंन आफ दी मैच घलो हो जथे. ठेलहा बइठे बर नइ जाने. राजनीति के बड़े-बड़े गेम खेलथे.

बाजा के धुन

कका अउ बबा एक दुसर ल टक्कर मारत रहिथें. खुदे उन ताली बजाथें अउ मिटकिया देथें. जनता ल पूछ्थें ताली कोन बजइस? कभू-कभू ताली ह अपने-अपन घलो बाज जथे. बंशी कका ह नाचे-कूदे म सधे मनखे आय. लक्ष्य ल साधे बर बड़ हुशियार हे. बबा बपुरा सीधा-सादा मनखे जेने मीठ गोठियाथे ओखरे बात ल सही मान लेथे. जुबान ल गठिया के धर लेथे. बंशी कका ह सबे पार के बाजा बजाय बर जानथे. बाजा के धुन ल झट पकड़ लेथे. नचइया मन संग खुदे नाच लेथे. लक्ष्य-संधान करथे. बिरोधी मन ल निपटाना जानथे. कका ह चिरई-चुरगुन मन बर मुठा-मुठा धान नहिं त दाना-वाना छिंच देथे. चिरई-चुरगुन धान या दाना खा के उड़ा जथें. ये परोपकार जारी हे. भोला बबा अपन जुन्ना सीट म बइठे रही जथे. माया लोक के माया ल घलो जानथे फेर का कर लेथे ? बने ढंग ले हुमेले ले घलो बुता ह बन जथे. फेर का करबे सिधवा मनखे ल जे पाथें उही हुमेल देथें.

माया लोक के छाँव

भोला बबा जुन्नेट मनखे आय. बंशी कका ओकर पार नई पाए. दिल्ली-दरबार के माया लोक म बहुत अकन चंदा अउ तारा हें. उन इहाँ-उहाँ चमकत रहिथें. हर चंदा अउ तारा इही सोचत रहिथे के हमरे करा माया के अंजोर हे. बड़े-बड़े बोल-तोल हे. भोला सब जानथे गियानिक मनखे आय. हर इसारा ल झटकुन समझथे. कतको झन ल झेलथे घलो. उहें बंशी कका तिर अपन जादू हे. माया-लोक से ले के जनता के मया-लोक तक ओखर पावर के शोर हे. बंशी कका अपन घर म हुकुम चलाथे. बाहिर जलवा देखाथे हे. माया-लोक के कठिन से कठिन सवाल ल हल करके देखाथे. अंधियार म सुरूत्ती के दीया बरोबर जनाथे थे. गद्दीदार कुरसी म बइठे के लगन ओखर जनमजात सुभाव हे. बंशी कका माया लोक के छांव ल घलो नचवाय के टिरिक ल जानथे. भक्ति-भावना म कभू कमी नइ रिहिस. माया-लोक के छांव म राजनीति के अटकन-मटकन खेलना-खेलाना ओला आथे. भोला कका के सपना ल कोनो न कोनो बिच्छु डंक मार देथे. जेन ह जनाथे जरूर फेर तिलमिला के रेहे बर लागथे.

राजनीति म अनुलोम-विलोम : ज्वार-भाटा

लालबुझक्कड़ के मशीनी खोपड़ी म तरह-तरह के ज्वार-भाटा उठत रहिथे. राजनीति के मउसम के ज्ञान ओला हे. राजनीति के मउसम म बिन बादर बिजली चमकना, बिन बादर पानी-पानी होना ओखर अटकल पंचे म फिट बइठथे. लालबुझक्कड़ फक्कड़ मनखे आय. फेर राजनीति के नाड़ी टमड़े बर जानथे. बंशी कका के आसपास रंग-बिरंगी फूलवारी हे. कभू-कभू भोला बबा घलो उहाँ फूल के खुशबू लेथे. लालबुझक्कड़ बंशी कका के बारे म पलटूराम ल किहिस-‘ बंशी कका भविष्य के राजनीति के तियारी करे म बड़ चतुरा हे. ओखर हर गोटी निशाना म आ के बुड़त दिखत हे. गाय अउ गोबर बड़ पबरित (पवित्र) हे. बंशी कका चुन-चुन के चाल चले म हुशियार हे. पलटूराम किहिस-‘भोला बबा चुपेचाप गेम खेलथे. माया-लोक म ओखरो धमक हे. फेर भोला बबा सब जान-मान के अनुशासन के डोर म बंधाय हे. माया-लोक के डोर म बंधना अउ कसाना अनुभव के जीनिस आय . सत्ता के म माया-डोरी म बड़े-बड़े शूरमा मन बंधा जथें हें. लालबुझक्कड़ किहिस-‘उपर वाले के माया के आगू भोला बबा के बोलती बंद हे. बंशी कका अभी बुलंदी म हे. ओखर भाग घलो बुलंद हे. कका जरूर प्राणायाम अउ अनुलोम-विलोम रहस्य के चोक्खा परयोग करत होही. राजनीति के हर आसन ल ओहा साधे हे. पलटूराम ल किहिस-‘भोला बबा जनता के पक्का सेवक आय. दवई देय के बुता म दिन-रात लगे रहिथे. लालबुझक्कड़

किहिस-‘कुरसी ओला देख के दउड़त आथे. तभे भोला बबा ओमा बिराजमान होथे. अभी त अपरा-डिपरा समे हे. हवा देख के बबा चलत हे. वोखर सपना मुखिया के राज-मुकुट के हे. फेर राजनीति के कच्चा सड़क म फुतकी के आंधी जब-तब चलते रहिथे. अभी तो मदारी के डमरू जइसे बाजत हे, बेंदरा मन वइसने नाचत हें.

(शत्रुघन सिंह राजपूत वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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