छत्‍तीसगढ़ी में पढ़ें: "थोरको नइ ओसरय ए बात हा केहे के हरय "

छत्तीसगढ़ी विशेष
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अब जीव ले चलाहूं कहिके सोंच डारिस . थोरिक दिन के बात हरय कानी कर डरिन परलोखिया मन . कइसे कोन दारी कोन बुता के का असर होही एला एकंगु टांग के अपन दिमाग ला फंसा डारिन . कइसे ओसरगे अइसन बुता बर सोंचे के बात हे .

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 13, 2020, 11:03 PM IST
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आजकल देखले अपन लाइक कहूं काम होथे त. कइसे ओसर जथे . कहइया मन ला काहन दे , का कर लिही हमर , त ए का कर लिही कहइया के मन मा कांही पाप नइ रहय एला अइसनहे कहिके अपन बात ला राखना परथे. सरी दिन के सिधवा घर के जोगी जोगड़ा अउ कतको अइसनहे जुमला सुने बर मिलथे . ए सब समाज के मनखे पिला मन के सोंच हरय. सुनत - सुनत सोंच हा विस्तार पा जथे अउ अपन महत्व ला सिद्ध करे बरे धर लेथे . महात्मा , जोगी सन्यासी एमन कभू ठलहा नइ राहंय. सबके अपन सोंचे के ठीहा होथे . ठीहा कतका बड़का हे ए बात मा थोकिन सोंच के देखव . जनता के रुझान कोन कोती रइही एहू एक ठन बसपार हरय. चंदा , चढ़ोतरी अउ गुप्तदान के चलन सबो दिन ले आवत हे. अखमुंदा हमन अपन हिसाब ला सकेले पुण्य - परताप मा जागे - सुते के रद्दा ए पाए के कि नींद भर सुते नइ पाए अउ जगवार घलोक कर डारे. तोरेच तीर मा देखले , तोर आवक - जावक के हिसाब धरइया कतको झन हांवय . तोर घर के नेवता मा मार खइमो - खइमो करत मनखे सकला जाथें . सबो दिन बर हमन अपन नता रिस्ता ला बनाए राखे हवन . एही नता रिस्ता आगू चलके काम मा आथे .

सकलाए मया अउ सकलाए माया दुनों के तुलना करके देखलव . काखर सेती ओसरत हे अउ काखर सेती ओसरबेच नइ करय केहे ला परथे . अब एके बात हे नानपन ले हमन अपन घर परिवार के शिक्षा - दिक्षा पावत चले आवत हन . कोनो जगा जाके देख ले नानपन के गढ़ाए संस्कार ओला जिनगी भर नइ छोड़य . कोनो न कोनो मेरन भेंट - पयलगी करत अनुभव हो जथे . अपन सेती मिहनत करत - करत चार पइसा बनावत - बनावत घला ओखर चिंतन चलत रइथे . जरूर , जरूरत के हिसाब से समाजिक काम मा कुछु - न - कुछु मदद करही . सज्जन अउ दुर्जन अइसे कहिके बेवस्था जेन दिन बिगड़िस होही तेन दिन के सुरता करले अउ आजो के दिन ला घटा बढ़ा के देख ए सब अपने आप पनपने वाला जीवधारी हरंय . दूसर के देखा सिखी , बिन सिखोए पढ़ाए कइसे एमा तरक्की होवत जात हे सोचे के विषय होगे हे .





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सब कुछ अपन - अपन जगा मा हमन पाथन . भगवान के रचे संसार मा कोनो फरक आज ले नइ परे हे . अपन समय मा सबो दिन बादर आवत - जावत रइथे . अब जीव ले चलाहूं कहिके सोंच डारिस . थोरिक दिन के बात हरय कानी कर डरिन परलोखिया मन . कइसे कोन दारी कोन बुता के का असर होही एला एकंगु टांग के अपन दिमाग ला फंसा डारिन . कइसे ओसरगे अइसन बुता बर सोंचे के बात हे . सांचा मा कांही चीज ला गलो के डार देबे त सांचा हा देंह भर चटका डारथे . ओखर देंह मा चटके के बाद जुड़ा जथे , जुड़ाइस तहांने ओखर रूप हमर आगू मा आ जथे . अब रूप ला रंग घलो चाही . रंगने वाला के हाथ मा कोन रंग आही कोनो नइ जानय . अइसे करत - करत सांचा बनइया सोंच - सोंच के अपने सेती ए कहिके बारा गति कर डारिस . हवा , पानी , भूख , पियास , अंधियारी , अंजोरी सबो कोती हावय . पुरोती - पुरोती सबो ला बांट दंव अइसे नइ होवय . सब के हिस्सा बरोबर हे . बरोबरी के सेती पहली ले प्रकृति के निरमाण करइया जान डारथे के लाखों करोड़ों जीव - जंतु बर कइसे बेवस्था बनाना चाही . मशीन हमन बनाएन कइसे बनाएन ओखरे बनाए रचना ले देख के . एमा कतको झन ला घमंड होगे हे . घमंडी मन ला पानी - पूरा आगी - बुगी , अउ लहरा के कतका भोगे ला परगे सबो के आंखी मा दिखत हे . जेन आंखी मूंद के बइठे हे तेखर का होही . चंदर कठवा हो जाही , जेन पाही तेन ठेंससी अउ तें चारों मुड़ा खोजत रहिबे . कोने न कोने अइसे कतका दिन चलही .
एकरे सेती जेन तरीका से आज तक चले आवत हे तेमा रचनात्मक सुधार करत आगू बढ़ना चाही . उसर - पुसर के अपने मुड़ ला मुड़वाए के उदिम नइ करना चाही . सबो राहंय सबो पावंय . जेन सहराय के बुता करिन तेला सहराना घलो चाही . नइ ओसरय अइसे कहिके अपन आपला सुजान नइ बताना चाही . सबो जगा , सबो के सेती धरती किंदर - किंदर के मया बांटत हे . ओइसनहे मया बांटत दिन पहावय.
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