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छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- चार दिन के जिनगानी

छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- चार दिन के जिनगानी

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का होगे कउंवा मन आजकल कांव-कांव नइ करत हे, बिलई मन मियाउं-मियाउं नइ करत हे, कुकुर मन भुके बर भुलागे हे, कोलिहा मन हुंआ-हुंआ नइ करत हे, सुआ अउ पड़की-परेवना मन के घला बोलती बंद होगे हे. खबर तो ये घला मिलत हे के जंगल के शेर, भालू मन के दहड़ई घला सटकगे हे. गजराज मन घला चिंघाड़े ले छोड़ देहे, कइसे का होगे हे ते ओकरो मन के कांही आरो नइ मिलत हे?

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कुंआरी टूरी मन असन छेहेल्ला मारत, फुगड़ी रे फांय-फांय कस कूदत-फुदकत राहय तेनो हिरनी मन अइसे गत ला उतार देहें जइसे दस दिन के लांघन-पियास मरत हे. ये पशु-पक्षी मन ला अइसे का होगे हे ते कोनो चिटपोट नइ करत हे ? गोठियाय बताय ले छोड़ देहें. अउ तो अउ टेड़गी (बिच्छु) घला हा डंक मारे ले छोड़ देहे, अतके नहीं ढोड़िहा, पिटपिटी मन लरघियाय असन परे हे अउ घोड़ा करायत अउ डोमी सांप मन घला कोनो ला नइ डसत हे. अतेक माथा मारत हौं, जाने-समझे के कोशिश करथौं फेर मोर मगज मं थोरको कांही बात नइ बइठत हे. सोचत-सोचत मति हेरागे, पथरा परगे अक्कल ला फेर कांही पल्ला नइ परत हे?

कोन अइसे का मंतर मार देहे ये जानवर मन ला, का जादू-टोना कर देहें ओला समझ नइ सकत हौं ? कुकुर मन मेर जाथौं तब मोला आवत देख के अइसे भाग जथे जइसे पुलिस ला देख के चोर मन भागथें. पहिली उही कुकुर मन देखयं तहां ले पूछी हलावत, मुड़ी मटकावत मोर करा आके पांव में लोटय, चांटय, चुमय फेर आज अइसे का होगे ते उलटा गंगा बोहाय ले धर लेहे? पिंजरा मं बइठे सुआ देखय तहां ले सीताराम..सीताराम.. काहय, मोर हाथ मं लाली मिरचा ला झटक के कोंटा मं जातिस तहां ले खा लेवय. बदमाश कउंआ अतेक सिधवा अउ मौनी बाबा बन जाही अइसन कभू सोचे नइ रेहेंव, कई घौं मोर हाथ ले रोटी ला झटक के चोरहा मन असन भाग जतिस अउ छानही मं बइठ के मोला टुहूं देखावत खातिस तेला आज का होगे हे, कांव-कांव नइ करत हे? ओकर बर आरुग रोटी लेके आय हौं लेवना डार के फेर वाह रे चंडाल थोरको कनमटक नइ मारत हे. नइ जानौं अइसे काबर होगे फेर कोनो न कोनो अइसे बात हे जेकर सेती ये सबो झन के बोलती बंद होगे हे. गुनी, ओझा, जोतिसी अउ पंडित मन करा जब जाके देखावत, सुनावत अउ बिचरावत हौं के का अइसे बात होगे जेकर से एमन चिंव-चांव नइ करत हें, मौन साध लेहें बैरागी मन बरोबर. कुछु जबर कारन हे का, अइसन तो कभू देखे-सुने ले नइ मिलत रिहिस हे ? शनि, राहू अउ केतू के कोनो भारी नजर तो नइ लग गेहे?

कोनो बिनाश के समय तो नइ अवइया हे एकर मन उपर, दुख के पहाड़ तो नइ गिरइया हे? ओमन पंचांग ला उलट-पुलट के अतेक देखिन फेर कोनो अइसे बात ओकर मन के पकड़ में नइ अइस जइसे बइद मन बीमार मनखे के नाड़ी ला टमड़ते साठ रोग के लछन ला जान जथे अउ बीमारी ला बता देथें. उदास होगे हौं, का करौं कांही समझ नइ परत हे? एक दिन गऊ माता करा जाथौं तब देखथौं ओकर आंखी डाहर ले आंसू झरत रहिथे. गुनेंव पहिली रोटी खवाय ले जात रेहेंव तब ललक के अपन पांव ला सरकावत मोर कोती बढ़य. बछरु कभू ओकर आंखी ले ओझल हो जाय तब रंभावत सुने हौं. ओकर रंभई ला सुनके बछरु दउड़ के आ जाय. आज देखथौं, ओ बछरु नइ हे ओकर तीर मं न ये गाय रंभावत हे. कुछ समझ नइ परत हे. गऊ माता के ढरत आंसू ला देख के मोरो आंखी डबडबा जथे. सोचौं, जरूर ये माता उपर कोनो भारी बिपत आगे हे, संकट खपलागे हे. ओकर पीठ उपर अपन हाथ फेरथौं, आंसू ला पोंछथौं. अपन कान ला ओकर मुंह मेर दताथौं, तब ओहर बतइस, तौंन ला सुनके मोर जीव करलागे. किहिस-बेटा

अब ये संसार हमर मन के लइक नइ रहिगे हे, जीना अबिरथा होवत हे. ये उही भारत देश हे जिहां भगवान कृष्ण गऊ चरावय, बंशी बजा-बजा के हमर मन के मनोरंजन करय, आज उही देश मं हमर मन के खुलेआम हत्या होवत हे, गऊ मांस बिकत हे. सब ले जादा गऊ मांस तो इही देश ले निरयात होवत हे तौंन शरम के बात हे. सब गऊ मांस खाय ले धर लेहें. जीयत मारत हे हमन ला. अइसन अधरमी देश मं तो अब एको पल जीये के मन नइ होवत हे. हमर मन के जीवन संकट मं हे| न हमर रक्षा देश के जनता कर सकत हे अउ न इहां के सरकार. उही पाके मौत ला सुरता करके रोवत हौं.

देखथौं, सब कोती ककरो जीवन अब इहां सुरक्षित नइहे. हाथी, भालू, शेर, चीता अउ बेंदरा मन घला एती तेती भटके ले धर ले हें. जंगल के जंगल सफाचट होवत जात हे तब उहां के रहवइया जीवधारी अउ परानी मन कहां जाही. उकरो मन के मरे बिहान हे. बड़े-बड़े राक्षस मन काल बन के उहां मंडरावत हे. मनखे मन अपन सुख के खातिर बड़े-बड़े उद्योग अउ कल-कारखाना लगाावत हे. सरकार हा ओमन ला पंदोली देवत हे. महाकाल बन के ये धरती मं उतरे शैतान मन ला देख-देख के नदिया, नरवा, तरिया, डोंगरी, पहाड़, रुख-राई ठाढ़ सुखावत हें, ओकर मन के जीव कांपे ले धर लेहे. कभू बारहों महीना नदी-नरवा मं बहइया पानी सागर मेर जाके पांव पखारय तेन मन सुखाय ले धर लेहें, पहाड़ अउ रुख राई मन तो बड़े-बड़े थ्रेसर मशीन मन देखते साठ कांपे ले धर लेथे. कब कोन मशीन आके ओकर छाती ला दंदोर दिही, फोकला ओदार दिही. कोन जानही ओकर मन के दुख ला, आंखी के आंसू ला? अपन मरावय तब काला बतावय तइसे कस हाल होगे हे ओकर मन के. सोचेंव, ये मनखे मन हा सब के बइरी तो नइ बनगे हे, काल बन के तो नइ आगे हे? जहर उगलत हे नाग बन के, डसत हे सबो झन ला, मुरकेटत हे सब के जीवन ला.

काबर दुख देवत हे, का मिलही अइसन करे ले? का ये बात ला नइ जानत हे के जौंन जइसन करहीं तइसन पांही तौंन ला? तब काबर अइसन अजलइत करथें, काबर छानही मं चढ़ के होरा भुंजत हें? उत्तराखंड मं ओ साल का होइस, कइसे प्रकृति ओकर मन के बारा ला बजाय रिहिस हे? कोरोना हा का तमाशा खेल के नइ गिस तेला अतेक जल्दी भुला गेव? अइस कोनो ओकर मन के बाप बचाय बर ओमन ला? चेत जाव, जान जाव, कोनो ला सतावौ अउ दुख देवौ झन. चार दिन के जिनगी, जीयव अउ सब ला जीयन दौ. सब संग हांस गोठिया लौ, परेम के दू भाखा बोले मं काकर का बिगड़त हे? इही धरम हे, परेम बेवहार हे. जइसे करिहौ तइसे पाहौ, नइ मानिहौ तब जाहौ बाबाजी के ला धर के धारे धार.

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Chhattisgarhi Articles, Chhattisgarhi News

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