छत्तीसगढ़ी कहिनी - सुरता के छइहाँ म एक दिन

बाबूजी के गुस्सैल सुभाव शांत होगे. खोए-खोए रहना. कोनो ल न डांटना, न फटकारना. माँ के गुजर जाना ओला सहन नइ होइस. एकांत म कभू-कभू ओखर डबडबाय आँखी ले आंसू छलकत दिख जाय.

बाबूजी के गुस्सैल सुभाव शांत होगे. खोए-खोए रहना. कोनो ल न डांटना, न फटकारना. माँ के गुजर जाना ओला सहन नइ होइस. एकांत म कभू-कभू ओखर डबडबाय आँखी ले आंसू छलकत दिख जाय.

बाबूजी के गुस्सैल सुभाव शांत होगे. खोए-खोए रहना. कोनो ल न डांटना, न फटकारना. माँ के गुजर जाना ओला सहन नइ होइस. एकांत म कभू-कभू ओखर डबडबाय आँखी ले आंसू छलकत दिख जाय.

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देवबती ल अपन बीते दिन के सुरता घेरी-बेरी आवत हे. ओ बचपन के दिन जब चारो भाई-बहिनी के बीच म अतेक परेम रहय के देखइय्या मन ल सुग्घर लगे. घर म खई-खजानी लाने जाय त बड़े भइया झट झपट लेय. खुद अकेल्ला खाय के नाटक करे तब छोटू (छोटे भाई) के संग छीना झपटी हो जाय. मैं अउ कमला अपन धीरज खोय बिना उन दुनो भाई मन के खजानी के झगरा ल देखन. माँ बाबूजी मन देख के मजा लेंय. बड़े भइया फेर सब झन ल बाँट के खजानी खाय. बचपन म बड़े भइय्या समे ले पहिली समझदार होगे रिहिस. हाईस्कूल के पढ़ई करत-करत ओहा अतेक समझदार होगे के सुख-दुःख के भाखा ल समझ जाय. अउ छोटू ल घलो पुचकार के समझा देय. छोटू ओखर आज्ञाकारी भाई बन के रो-गा के चुप हो जाय.

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बचपन के ओ दिन



आज देवबती ल रही-रही के बचपन के सुरता आवत हे. बड़े भाई के नाव परमेश्वर, ओखर ले छोटे मैं अउ देवबती मोर ले छोटे कमला हे. सबले छोटे भाई ल सब छोटू, छोटू कहें त ओखर नावे ह छोटू परगे. छोटू बड़ नटखट रहे. बड़े भाई के आज्ञाकारी त बचपन ले रिहिस. हमर घर के आगू म गंगा-अमली के बड़े जान पेड़ राहय. पेड़ म चढ़े बर बड़े-बड़े मनखे मन घबराय. एक दिन बड़े भइया मोला, कमला अउ छोटू ल किहिस-‘चलो गंगा अमली टोरे बर जाबो’ मैं केहेंव-भैय्या, गंगा-अमली के पेड़ ह अड़बड़ उंच हे. बाबूजी कहूं देख परही त तोर पिटाई हो जही. तोर संगे-संग हम तीनों के पिटाई निश्चित हे. बाबूजी भड़कही त माँ घलो नइ छोड़ा पाही. बने सोच-समझ ले. बड़े भैया किहिस-देख देवबती, जों होही तेंन देखे जही. मोला तो वोद्दे लाल पाके लाल गंगा-अमली दिखत हे. हमन तीनों झन के मुहूँ पंछागे. सब ले पहिली छोटू किहिस-चल भइया कोनो जाय चाहे झन चाहे मेंहा तोर संग चलत हंव. भइया खुश होगे. कमला डहर देखत छोटू ल किहिस चल भइया हम दुनों जाबो. अतका सुन के दुनों बहिनी मन घलो जाय बर तियार होगें. माँ ल बिना बताय कलेचुप हमन गंगा अमली टोरे बर निकल गेंन.
आनंद के खिंचाव
बड़े भइया ल पेड़ म चढना खूब पसंद आय. पेड़ म छू-छूव्वौल खेले टकरहा रिहिस. भइया पेड़ ल परनाम करिस अउ झट गंगा अमली पेड़ के तिलिंग म चढ़गे. हमर मन के जी पोट-पोट करत राहे. हमन मने मन भगवान ल प्रार्थना करत रहेंन. ‘हे! भगवान भाई के रक्षा करना’. भइया गंगा अमली गिरावत जाय अउ हमन बिन-बिन के झोला म डारत जान. देखते देखत म पक्का-पक्का गंगा अमली ले झोला भरगे. हमन तीनों झन वुही करा गंगा अमली के सुवाद ले डरेंन. बने मीठ रिहिस. दूसर जगा के गंगा अमली तोर्रठ(कसैला) लगे. अतकेच म बड़े भइय्या अकोसी ल उप्पर ले गिरा दिस अउ खुद गरगर ले उतरगे. खूब मजा अइस. सबो

झन घर पहुंचेंन
माँ बेचैन हो के रद्दा देखत रिहिस.घर पहुंचते साठ छोटू ल अपन गोदी म उठा लिस. माँ किहिस-मोला बिना बताय तुमन कहाँ गे रेहेव? छोटू बड़ प्यार से तब माँ ल किहिस-माँ हमन गंगा अमली टोरे बर गे रेहेंन. माँ बड़े भइया उपर खूब नराज होइस. फेर दुलारत हुए किहिस-अब आगू अतेक उंच पेड़ म झन चढना. हमन अपन सफाई म केहेंन-माँ हमन ल भइया ले गे रिहिस. माँ बुदबुदाइस-खुद गलती करे अउ भाई, बहिनी मन ल घलो संग म लेगे रेहेस. फेर चेतावनी दिस-तुंहर बाबूजी ल बताहूँ के परमेश्वर गंगा अमली के पेड़ म चढ़े रिहिस त तोर अउ तोर संगे संग सबके पिटाई हो जही. माँ के अतका केहे के देरी रिहिस के हमन सब भाई-बहिनी हाथ-पाँव ल जोर के माँ ल मना लेंन. बाबूजी तक बात नइ पहुंचना चाही. माँ,मुस्कुरईस अउ मानगे. हमन ल खूब मजा अइस.

मड़ई अउ नाच-गम्मत
कमला किहिस- दीदी हमर गाँव म मड़ई के खूब आनंद आय न! देवबती किहिस-हाँ, कमला हमर गाँव के बजार एतराब के सबले बड़े बजार होय. बाबूजी के हम सब बड़ा बेसब्री से रद्दा देखन. दुसर जुआर तक बजार भरा जाय. कमला किहिस-दीदी, बाबूजी हमन सब्बो झन ल एकक अठन्नी देय. ओ अठन्नी पा के हमन ल खूब खुश हो जान. दुनो बहिनी बजार जाके एक रूपिया के कुछु खई-खजानी ले के घर आ जान अउ माँ के संग मिलके खावन. परमेश्वर भइया अउ बबलू मन बजारे म चना-मुर्रा, नहिं त मुर्रा-लाडू/ करी-लाडू या अउ कोंन्हों खजानी खा के घर लहुटें. मड़ई म खूब भीड़-भाड़ राहय. आसपास के बीसों गाँव के मन हमर गाँव के मड़ई म आँय. लंबा बांस म मड़ई ल धर के राउत मन सांहड़ा देव म पूजा-पाठ करें. देखे-सुने म बड़ मजा आय. मड़ई के आकर्षण तिहार-बार ले कमती नइ होय. ससुरारी बेटी मन मड़ई देखे बर ससुरार ले मइके आंय. घर सगा सोदर ले संइमो-संइमो करे. अभी म घलो मड़ई अउ नाचा देखे बर भारी संख्या म सगा-सोदर, अउ दिगर लोगन आथें-जाथें. नाच-गम्मत के मजा लेथें. फेर पहिली कस लोगन के रुचि एमा कमती होगे हे. टी.वी, इंटरनेट, कम्प्यूटर, मोबाइल आदि मनोरंजन के साधन बाढ़े से मड़ई अउ नाचा गम्मत के परेम घटगे हे. देवबती किहिस-पहिली टिकली.फून्दरी, चूरी, बिंदिया, पाउडर, स्नो, लइका मन के खेलौना, अउ किसम-किसम के चीज गाँव-गँवई म नइ मिले. मड़ई म झूलना, रहिचुल्ली, नाच-कूद, मिठई, कपड़ा-लत्ता अउ किसम-किसम के चीज के प्रति बड़ आकर्षण रहे. अब त सबे जीनिस सहज उपलब्ध हे. मड़ई होय पूरा गाँव नाच-गम्मत देखे-सुने बर पूरा रात जागरण करें. कलाकार मन के जादू खूब चले. गाँव म मड़ई होय अउ नाच न होय ये असंभव बरोबर रिहिस हे. नाचा के मंजे कलाकार मन खूब जमें. हांसत-हांसत पेट फूल जाय. अब मड़ई के आयोजन कमती होगे हे. फेर मड़ई ह मड़ईच आय, ओखर कोनो विकल्प नइ हो सके. ठेठ छ्त्तीसगढ़ी भाखा के चमत्कार मड़ई म देखे-सुने बर मिलथे.

माँ के कोमल हिरदे
देवबती किहिस-हमर महतारी निच्चट सिधवा गउ बरोबर रिहिस. अउ बाबू आगी बरोबर. बात-बात म गुसिया जाय. एक बखत बड़े भैया तरिया म छू-छूव्वौल खेलत-खेलत चार घंटा ले घर ले गायब रिहिस. वुसने म बाबूजी अचानक घर आगे. बाबूजी माँ ल पूछिस-परमेश्वर कहाँ हे ? माँ कहि परिस-तीन-चार घंटा होगे तरिया ले नहा के नइ लहुटे हे. अतका सुनना रिहिस के बाबूजी आगबबूला होगे. ओहा तुरत परमेश्वर ल लाने बर बड़े तरिया चल दिस. बड़े तरिया म अथाह गहिर पानी रिहिस. तरिया पार ले बाबूजी ल आय देख के बड़े भैया थरथर कांपत बाबूजी के आँखी बचाके घर लहुटिस. बाबूजी ओला देख परिस अउ मारे गुस्सा वुहू घर पहुंचिस. बड़े भैया के खूब पिटई होइस. माँ ह रोइस-गइस तब जा के ओखर पिटई बंद होइस. हमन सब झन डर के मारे कोठी के पाछू म लुकागे राहन. बाबूजी हिदायत दिस-समय म सब काम करो. जीवन म अनुशासन लाव. अनुशासन के बिना जीवन व्यर्थ होथे. तरिया म डूबको फेर जादा समय म लगाव. अपन लक्ष्य हासिल करो. देवबती किहिस- हमन सब भाई-बहिनी बाबूजी के इही सीख ल जीवन म अपनाएंन अउ आगू बढ़ेंन.

गरमी के दिन
गरमी के दिन म बांटी-भंवरा खेले म बड़े भैया मगन राहे. बांटी के जीत हार खूब होय. बजार के दिन के पइसा बांटी, भंवरा लेय म खरचा होय. जीत होय त बांटी जमा हो जाय. ओखर बिक्री ले पइसा मिले. अठन्नी, चवन्नी गुल्लक म जमा हो जाय. गुल्लक छोटू के चार्ज म राहय. बड़े भइया मोला त कभू कमला ल गुल्लक बर पइसा धरा देय. हमन सबे चिल्हर पइसा ल गुल्लक म जमा करे बर छोटू के हवाले कर देन. छोटू खजांची के बुता करे. कापी, पेंन, किताब खरीदना होय तब गुल्लक केसहारा होय. बड़े भइया खुद जरूवत के हिसाब से पइसा निकाल के दे देय. गुल्लक के पइसा इमरजेंसी खजाना रिहिस..

गुल्लक के सहारा
बचपन म तरह-तरह के खेलकूद जीतत-जीतत दुनों भाई मन बड़ आनन्दित राहंय. घोर गरीबी अउ अभाव म घलो बड़े भइया अपन स्कूल, कालेज म अव्वल आय. ओ समय म ओखर पीठ ठोंक देय जाय. अइसने प्रोत्साहन होय. इही स्कूल-कालेज के पुरस्कार माने जाय. बाबूजी ल अपन सबे लइका मन उपर बड़ गरब होय. सब बने पढ़िन लिखिन. कमला किहिस- बाबूजी सरकारी दफ्तर म चपरासी रिहिस फेर अपन ईमानदारी म ओला बड़ गरब राहय. अपन ओहदा ल बताय म ओला कभू सरम नइ लागिस. ओ कहे सब ईश्वर देखत हे. मामूली तनखा म सब झन लइका मन ल पढ़ा लिखा के तियार करना बड़ कठिन काम रिहिस. बड़े भइया के गुल्लक योजना एन फीस भरे के समय म ओखरो बड़ काम अइस. अपन शिक्षा के बल म ओहा कलेक्टर होगे. ठीक दु साल बाद हम दुनो बहिनी के बिहाव होगे. पहिली हमन ल ससुरार भेजिस फेर अपन बिहाव करिस. देवबती किहिस-हमर बिहाव त खूब जोरदार होइस. दुनों दमाद बने पढ़े-लिखे, बने घर दुआर वाले मिलिन. बाबूजी के इच्छा पूरा होइस. अउ बड़े भइया हर अपन बिहाव ल एकदम सादा ढंग ले गायत्री मन्दिर म करिस. अब बिहाव के पारी छोटू के हे. छोटू घलो बड़े भइया के रद्दा म हे. प्रतियोगी परीक्षा के तैयारी म भिड़े हे. ओ कथे अपन गोड़ म खड़े होय बिना मेंहा बिहाव नइ करंव. अउ दिन-रात अपन लक्ष्य साधे म भिड़े रहिथे.

डबडबाय आँखी के भाखा
बाबूजी अपन सरकारी सेवा ले रिटायर होगे रिहिस. चार साल पहिली माँ के जुन्ना बीमारी ले अचानक मृत्यु होगे. घर सूनसान होगे. बाबूजी के जीवन म सून्नापन आ गे. गुस्सैल सुभाव शांत होगे. अपन बर एकांत चुन लिस. घर म कम से कम बोलना. खोए-खोए रहना. कोनो ल न डांटना, न फटकारना. माँ के गुजर जाना ओला सहन नइ होइस. एकांत म कभू-कभू ओखर डबडबाय आँखी ले आंसू छलकत दिख जाय. कोरोना(कोविड-19) महामारी के दौर अइस. कोरोना के प्रकोप देश दुनिया म बाढ़गे. देश म लाकडाउन शुरू होगे. महामारी से सैंकड़ों-हजारों मनखे मरे के खबर आम बात होगे. इही समय म बाबूजी के तबियत घलो अइसे बिगड़ीस के सुधर नइ पइस. अउ सरकारी कोविड सेंटर म ओहा आख़िरी साँस लिस. बड़े भइया परमेश्वर कोविड सेंटर मन फफक-फफक के रो परिस. देवबती के आँखी म जइसे जीवन के पूरा चित्र घूमगे. दुनों बहिनी दहाड़ मार के रो परिन.

जिनगी के सच
जिनगी म खुशी अउ गम कभू-कभू कम समय म संगे-संग आथे. पिता स्वर्गवासी होय ल परमेश्वर ह अपन बहिनी अउ छोटे भाई ल नियति के इच्छा बता के दुःख कमती करे के कोशिश करिस. भाभी हर घलो अपन ननंद-देवर ल समझइस. उनकर पीठ म हाथ रखिस. कोविड सेंटर के गाईड लाइन के अनुसार बाबूजी के दाह संस्कार होइस. सब सामाजिक नियम पाछू छूटगे. गिने-चुने परिजन बाबूजी के अंतिम दरसन करना चाहिंन फेर सरकारी एम्बुलेंस के कोविड बोरी सब ल निराश कर दिस. वुही बोरी म मृत देह लाने गे रिहिस. कोरोना महामारी से मरइया मन केवल आंकड़ा बनके रहिगें. देवबती अउ कमला अतीत के पीड़ा म खो गें. देवबती अपन आँसू ल पोछ्त-पोछ्त अपन बहिनी ल किहिस-इही दुनिया के सच हे के बीते समय इतिहास होगे. जोंन आज हे ओ अवइया काली नइ रही. जीवन नाशवान हे अउ भविष्य अनिश्चित. एखर सेती आत्मविश्वास के संगे-संग आशावान हो के अपन काम करते चलो.एक दिन सब ल जाना हे. अपन बहिनी अउ भाई छोटू ल दुलार देवत दुनो बहिनी घर के जरूरी बुता म भिड़गे. ( डिसक्लेमर- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं.)
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