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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- बिहाव संस्कार मा भड़ौनी

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छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति मा सोला संस्कार माने गेहे. एमा बिहाव महत्वपूर्ण संस्कार आय. छत्तीसगढ़ के बिहाव म बहुत अकन प्रथा हे. जइसे लमसेना बिहाव, मंझली बिहाव, बड़े बिहाव अऊ ठीका बिहाव कस कतनो प्रथा हे. आजकाल तो मंझली बिहाव अऊ बड़े बिहाव के जादा चलन हे. बिहाव वंश बढ़ोत्तरी के संगे संग आदिम प्रेम परस्पर सहयोग अऊ सहज आकर्षण के सूत्र आय. तिही पाय के बिहाव सिरिफ दुए शरीर के ही नही बल्कि दु आत्मा के संगे-संग दु परिवार अऊ संस्कृति के पवित्र मिलन आय.

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बिहाव संस्कार के ज्ञाता हैबलक एलिस हा कहिथे कि भारतीय गाँव मन मा लोक परम्परा हा अनूठी अऊ चिरस्थायी हे. विमन ऑफ इंडिया के लेखक रथफील्क हा बिहाव अऊ बिहाव के सबो नेंग जोरा ला सुखी जीवन के आधार मानथे अऊ कथे कि बिहाव के नेंग जोग म नि:स्वार्थ भावना भरे रथे.

छत्तीसगढ़ म सबो समाज अऊ जात म थोर बहुत फरक के साथ बिहाव संस्कार सबो नेंग जोग करत पूरा होथे. बिहाव लोक रीति अऊ वैदिक रीति ले संपन्न होथे. बिहाव संस्कार म नेंग जोग के समय बिहाव गीत गाए के परम्परा हे. जइसे मंगनी गीत, चुलमाटी गीत, तेल चघनी गीत, नहडोरी गीत, मउर सौंपनी गीत, बरात बिदा गीत, नकटा नाच गीत, धमसा नाच गीत, बरात स्वागत गीत, परघनी गीत, भड़ौनी गीत, भांवर गीत, लगिन गीत, टिकावन गीत, सोहाग गीत, दाईज गीत, बिदा गीत, डोला परछन गीत अऊ मड़वा विसर्जन गीत के संग बिहाव संस्कार पूरा होथे. बिहाव गीत के अंतर्गत भड़ौनी गीत के विशेष महत्व हे.

भड़ौनी के उत्पत्ति के बारे मा अइसे माने जाथे कि भड़ौनी छत्तीसगढ़ी के भड़ धातु मा औनी प्रत्यय लगाय ले भड़ौनी शब्द बने हे तिही पाय के जादा बोलइया पुरूष मन ला भड़भड़हा अऊ जादा बोलइया माईलोगन मन ल निच्चट भड़भड़हीन केहे जाथे.

सियान मन के अइसे मानना हे कि रामायण काल म घलो भड़ौनी गायन के परम्परा हा जीवित रीहिसे. रामचरित मानस म उल्लेख हे कि भगवान राम हा सिरिफ पांच कौर नैवेध निकाल के भोजन शुरू करेच रिहिसे कि भगवान राम हा गारी गायन सुनके हर्ष विभोर होगे –

पांच कंवर करि जेवन लागे
गारी गायन सुनि अति अनुराग

उही समे ले भोजन के समय भड़वनी गीत गाय के परम्परा के शुरूआत होइस होही. पुराण म घलो उल्लेख हे कि शिव पार्वती बिहाव म गारी गायन प्रचलित रिहिसे. शिव जी हा बरात ले के दुवार मा अइस द्वारचार के नेंग होय लगिस. तभे नारद जी हा माता मैना ल किहिस कि शिव जइसे दूल्हा तीनो लोक म नइहे. एती मैना हा देखीस कि शिव ह शरीर भर भस्म चुपरे हे ओकर शरीर मा साँप के माला हे अऊ खोपड़ी के गहना ले लदाय हे दई. ओहा उघरा, जटाधारी हे अउ ओकर डरावना रूप ल देख के चिंता म परगे ताहन दुखी होके माता मैना हा शिवजी ला केहे बर धर लीस –

तछार ख्याल कपाल
भूषण नगिन जटिल भयंकारा
संग भूत पिशाच सब
जोगिनी विकट मुख रजनी चरा

शिव जी हा अपन सासु माँ ल चिंता फिकर म देख के अउ ओकर मन:स्थिति ल भांप के दिव्य रूप म प्रकट हो के ओकर दुख ल दूर करिस. अइसे केहे जाथे तब ले मानव समाज म बाराती मन ल गारी दे के स्वागत करे के परम्परा विकसित होइस होही. अइसने किसम ले भड़ौनी गीत प्रेमपूर्वक गारी गायन के रूप आय. गारी गायन ल ही छत्तीसगढ़ म भड़ौनी गीत केहे जाथे. इंकर लक्ष्य समधी-समधीन, वर-वधु अऊ लोकड़हीन डाहर रहिथे.

इही बात ल आघु बढ़ावत सीता राम साहू कथे-भड़ौनी हा हास परिहास, हल्का ताना अउ मीठा व्यंग्य आय. ओखी पाके ठगे के लइक नता रिश्ता मन ल भड़ौनी गीत के माध्यम से भड़ के माहोल ल आनंदमय बनाथे. जइसे कि चुलमाटी के बेरा ढेड़हा ल गीत के माध्यम से कुड़काथे –

तोला माटी कोड़े ला, तोला माटी कोड़े ला
नइ आवय मीर, धीरे-धीरे
धीरे-धीरे अपन धोती ला तीर, धीरे धीरे…

बरात स्वागत ले भड़ौनी गीत के शुरूआत होथे. बरात परघाए के बेरा बरतिया मन ला भड़थे –

नदिया तीर के पटवा भाजी
उल्हवा उल्हवा दिखथे रे
आए हे बरतिया तेमन
बुढ़वा बुढ़वा दिखथे रे

भड़ौनी एक-दुसर ल कुड़का के मजा ले के गीत आय. ठट्ठा दिल्लगी के गीत आय. भड़ौनी गीत म भड़इया मन बरतिया मन के गाँव ल आधार बना के घलो भड़थे…

नदिया तीर के पटुवा भाजी
पटपट पटपट करथे रे
मालूद बेलौदी टूरा मन हा
मटमट मटमट करथे रे

दयाशंकर शुक्ला हा भड़ौनी ल राग द्वेष ले मुक्त प्रेम के प्रतीक माने हे. तभे तो दुल्हन पक्ष वाले मन दूल्हा ल घलो भड़े बर नी छोड़य –

सुन्दर हवस कहिके दुलरूवा
हमला दिए दगा रे
बिलवा हवय मुंह हा तुंहर
नोहव हमर सगा रे

भड़ौनी गीत अधिकार अऊ कर्तव्य के बोध कराथे. समधीन मन बर माई सरी अउ दुल्हन बर जउन लुगरा लाए रथे ओहा कहूं निच्चट हल्का रथे ता ओ झलझलहा लुगरा ल देख के भड़ौनी गीत के स्वर निकलथे –

बने बने तोला जानेंव समधी
मड़वा मा डारे बांस रहे
झाला पाला लुगरा लाने
जरय तुंहर नाक रे…

ठीका बिहाव के बारे म सियान मन बताथे कि ठीका बिहाव म बिना तेल हरदी चघे बरतिया मन दुल्हिन के गाँव जाथे. दुल्हिन घर गऊर बइठथे ताहन फेर संग म दुल्हिन ल लानथे. दुल्हिन के संग म लोकड़हीन घलो जाथे. दूल्हा घर नेंग जोग निपटे के बाद चौथीया आथे.

डुमन लाल ध्रुव कथे कि चौथीया परघौनी के बखत दूल्हा अउ दुल्हिन पक्ष वाले मन एक-दुसर ल नीचा देखाए बर अपन-अपन समधीन ल हाथ देखा-देखा के भड़थे. भड़ौनी गीत के माध्यम ले दुनो पक्ष के नोक झोक हा माहोल ल आनंदमय बना देथे. दूल्हा पक्ष वाले मन चौथीया परघाए के बेर अपन समधीन ल भड़थे –

हमर समधीन
रउतइन बने हे, रउतइन बने हे
कि मही ले ले, दही ले ले कहिथे समधीन ह
मही ले ले, दही ले ले कहिथे
ओ तो मोला देखन नइ तो भाए समधीन
ओ तो मोला देखन नइ तो भाए.

एकर जवाब मा चौथीया पक्ष वाले मन अपन समधीन ल जोशे-जोश म भड़थे-

हमर समधीन
मरारिन बने हे, मरारिन बने हे
कि भाजी ले ले, भांटा ले ले कहिथे समधीन हा
भाजी ले ले भांटा ले ले कहिथे
ओ तो मोला देखन नइ भाए समधीन हा
ओ तो मोला देखन नइ तो भाए.

दूल्हा पक्ष वाले मन तो दुल्हिन के दाई ल घलो भड़े बर नइ छोड़य –

दुल्हिन के दाई ल लुगरा के साध हे
ओ लुगरा के साध हे
कि गए होही कोसरा के दुकाने
समधीन गए होही कोसरा के दुकाने
ओ तो बने-बने लुगरा निमारे समधीन हा
बने-बने लुगरा निमाये
ओला लाज सरम नइ आये
समधीन हर चढ़े हे कोसरा दुकाने

भड़ौनी गीत बिहाव समारोह के आनंद ल दुगुना कर देथे. एक-दुसर ल भड़े के बाद घलो कोनो रिस नइ करय बल्कि दुनो पक्ष एक-दुसर के पूरा मान-सम्मान के ख्याल रखथे.

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